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जॉन लॉक (John Locke)

लॉक (Locke)

 

जीवनी, कृतियां एवं पद्धति (Life, Works and Method)

 

लॉक ने अनुबन्धवाद पर पुनः विचार किया और उसे उदार, सन्तुलित तथा व्यावहारिक बनाने की  चेष्टा की। लॉक का सर्वाधिक महत्त्व इस बात में है कि उसने आधुनिक स्वतन्त्रता की धारणा का  सीमित और वैधानिक राजतन्त्र का तथा वर्तमान युग के प्रजातन्त्र का समर्थन किया ।

 

जॉन लॉक का जन्म इग्लैण्ड में समरसेट कैरिंगटन नामक स्थान पर 29 अगस्त, 1632 . को हुआ था। उसके पिता मध्यम वर्गीय परिवार के एक क्लर्क थे, किन्तु उन्होने पुत्र को उच्च शिक्षा दिलाने में कसर नहीं छोड़ी। इस मेधावी छात्र ने ऑक्सफोर्ड से M.A.. की उपाधि प्राप्त की और तब वही 1659 . में उसे अध्यापन कार्य मिल गया। अध्यापन काल में ही उसका सम्पर्क लॉर्ड शाफ़्ट्सबरी से हुआ जिसने उसे अपना गुप्त सचिव बना लिया। अब लॉक ने राजनीति का पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया। थोड़े समय पश्चात् वह ह्विन दल (Whig Party) मे कार्य करने लगा, किन्तु अत्यधिक परिश्रम और अध्ययन से वह क्षय रोग से ग्रस्त हो गया। क्षय रोग से निवृत्त होने के लिए उसे फ्रांस जाना पड़ा, जहाँ उसने अपने राजनीतिक विचारो का प्रकाशन किया। 1683 . में कुछ राजनीतिक कारणो की वजह से वह हॉलैण्ड गया, जहाँ सन् 1688 . तक उसे रहना पड़ा। जब इंग्लैंड मे सन् 1688 . में क्रान्ति हुई तो लॉक ने इसका समर्थन किया । क्रान्ति के इस समर्थन के कारण ही उसे क्रांति का दार्शनिक कहा जाता है। लॉक अधिक समय तक जीवित न रह सका और 72 वर्ष की प्रवस्था मे सन् 1704 . मे यह विद्वान सदा के लिए चल बसा ।

 

लॉक के जीवन पर तत्कालीन परिस्थितियो ने बड़ा प्रभाव डाला। उनने अपने जीवन के प्रथम भाग में महान् राजनीतिक उथल-पुथल को देखा, उदाहरणार्थ अपने शैशव में गृह युद्ध तथा यौवन में क्रॉमवेल का शासन और राजतन्त्र की पुनर्स्थापना के दर्शन किए । वृद्धावस्था में उसने 1688 . की गौरवपूर्ण क्रांति को देखा । लॉक को अपने प्रारम्भिक अनुभवों के कारण हिंसा तथा अतिवाद के प्रति गम्भीर अरुचि उत्पन्न हो गई। दीर्घकाल तक ह्विन विचारक शाफ़्ट्सबरी के साथ रहने के कारण उसका भी उस पर विशेष प्रभाव पड़ा। लॉक पर अन्य विशेष प्रभाव 17 वीं शताब्दी के उत्तराद्ध में यूरोप में जागृत होने वाले नवीन बौद्धिक वातावरण का पड़ा। इस नवीन युग मे धार्मिक और राजनीतिक कट्टरता के स्थान पर सहिष्णुता को विशेष छाप थी। जहाँ पुराने युग का राजनीतिक चिन्तन मानव स्वभाव को बुरा और दुष्ट मानते हुए आरम्भ होता था, वहीं इस नवीन युग में मानव-स्वभाव के प्रति आशावाद की झलक देखने को मिलती थी और मानव स्वभाव की अच्छाई में विश्वास किया जाने लगा था। मानव-स्वभाव सम्बन्धी मूल मान्यताओ में इस परिवर्तन का प्रभाव लॉक पर पड़ना स्वभाविक था और इसीलिए वह एक उदारवादी विचारक बन सका । उसने ऐसी अध्ययन पद्धति निकाली जिसके आधार पर व्यक्तिवादी, उपयोगितावादी, प्रजातन्त्रवादी, सांसदवादी अपने-अपने पक्ष मजबूत करते है ।

 

रचनाएँ :-

लॉक ने राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र, शिक्षा, दर्शन, विज्ञान आदि विभिन्न विषयो पर 30 से भी अधिक ग्रन्थ लिखे । सभी कृतियाँ उसकी 50 वर्ष की आयु हो जाने के उपरान्त ही प्रकाशित हुई। हॉलैण्ड से लौटने के बाद ही वह सर्वप्रथम एक लेखक के रूप मे प्रकट हुआ । राजनीतिशास्त्र पर लिखे गए उसके कुछ महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ निम्नलिखित हैं-

1. Letter on Toleration, 1689

2. Two Treatises on Government, 1690

3. Essay Concerning Human Understanding, 1690

4. Second Letter on Toleration, 1690

5. Third Letter on Toleration, 1692

6. Fourth Letter on Toleration, 1692

7. The Fundamentals of Constitution of Caroline, 1692 

इन सभी ग्रन्थो मे लॉक का सबसे प्रमुख ग्रन्थ Two Treatises on Government  है। इसके प्रथम खण्ड मे लॉक ने राजा के दैवी अधिकारों और पदाधिकारी का खण्डन किया है। दूसरे खण्ड में उसने सरकार की उत्पत्ति, स्वभाव और कार्य-क्षेत्र का विशद् विवेचन किया है। प्रच्छन्न रूप से उसका उद्देश्य हॉब्स का खण्डन करना था, किन्तु स्पष्टतः लॉक ने लेवियाथन के तर्कों का जान-बूझ कर उत्तर नहीं दिया। स्मरणीय है कि लॉक अपने बहुत से विचारो के लिए The Laws of Ecclesiastical Polity    के लेखक रिचार्ड हूकर (Richard Hooker) का ऋणी था और वह इसे स्वीकार भी करता था। लॉक हॉब्स के व्यक्तिवादी दृष्टिकोण और सामाजिक संविदा के सिद्धान्त से सहमत था, लेकिन हॉब्स के दर्शन के लगभग प्रत्येक आधार सिद्धान्त का विरोधी था। प्रो. वॉहन (Vaughan) के अनुसार लॉक की ट्रीटाइज एक दोनाली बन्दूक है जिसमे से एक फिल्मर (Filmer) तथा दूसरी हॉब्स के विरुद्ध तनी हुई है।  लॉक ने इस ग्रन्थ को राजा के दैवी अधिकारों का प्रबल समर्थन करने वाले सर रॉबर्ट फिल्मर के ग्रन्थ  Patriarcha   का खण्डन करने के लिए लिखा था। फिल्मर ने अपने ठोस तर्क अधिकतर हॉब्स से ग्रहण किए थे। लेकिन जहां लॉक ने प्रथम ट्रीटाइज    में    फिल्मर की खुलकर आलोचना की, वहीं दूसरी ट्रोटाइज   में   उसने हॉब्स की वैसी आलोचना नही की। इस पर टिप्पणी करते हुए सेबाइन ने कहा है कि  यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है कि लॉक ने अपने उत्तरदायित्व को पूरी तरह से नहीं समझा।    यद्यपि अपने तर्कों का विकास करते समय लॉक सदैव हॉब्स पर दृष्टि जमाए रहा, लेकिन उसने हॉब्स का नाम लेकर खुल्लम-खुल्ला उसके मत का खण्डन कभी नहीं किया। सेबाइन के ही शब्दो में, यदि यह अपने उत्तरदायित्व को पूरी तरह से समझ लेता तो वह समाज और शासन के सिद्धान्तों में गहराई से प्रवेश करता । इससे उसके दर्शन का बहुत सा भ्रम दूर हो जाता ।    पर   तत्कालीन प्रभाव की दृष्टि से यह अधिक हितकर था कि वह गरीब फिल्मर का खण्डन करता ।

 

लॉक की इस पुस्तक का प्रकाशन यद्यपि 1690 . में हुआ, लेकिन कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रो. पीटर लॉस्लेट के नवीन अनुसन्धानों से यह सिद्ध हो चुका है कि यह सम्पूर्ण रचना 1683 . से पहले ही तैयार हो गई थी। लॉक ने इसे 7 वर्ष पश्चात् ग्रन्थ लेखक का नाम न देते हुए इसलिए प्रकाशित किया कि उसे यह भय था कि यदि स्टुअर्ट शासक पुनः सिहासनारूढ़ हुए तो लेखक को दण्ड भोगना पड़ेगा । लॉक के जीवन काल मे ही 1690, 1694 और 1698 . में इस ग्रन्थ के तीन संस्करण प्रकाशित हुए, यद्यपि तीनों ही में अशुद्धियाँ थी। उसकी मृत्यु के बाद ही उसके द्वारा संशोधित प्रति के आधार पर इस ग्रन्थ का शुद्ध संस्करण प्रकाशित हुआ। लॉक के ग्रन्थ ने (जो काफी पहले तैयार हो चुका था) 1688 . की गौरवपूर्ण कान्ति के लिए संद्धान्तिक आधार प्रस्तुत किया था। इस पुस्तक की भूमिका में ही उसने लिख दिया था कि यह पुस्तक विलियम ग्रॉफ प्रोरेंज के सिंहासनारूढ़ होने का औचित्य सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। इस पुस्तक ने अमेरिका के क्रांन्तिकारियो के लिए भी औचित्य प्रस्तुत किया । पुस्तक की भूमिका मे लिखे गए शब्दों से यद्यपि यह आभास होता है कि इसकी रचना 1688 . के बाद हुई और ये शब्द बाद ही में लिखे गए, लेकिन आधुनिक अन्वेषणों ने यह सिद्ध कर दिया है कि पुस्तक का लेखन 1683 . में ही पूरा हो चुका था। लॉस्लेट के अनुसार इसमें भावी शान्ति की मांग की गई है, न कि घटित क्रान्ति को उचित सिद्ध करने का प्रयास है


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