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वैश्विक राजनीति का परिचय(Introducing Global Politics)

🌏 वैश्विक राजनीति का परिचय(Introducing Global Politics)


विश्व मामलों(World Affairs) का अध्ययन कैसे किया जाना चाहिए? 

दुनिया को सबसे अच्छी तरह कैसे समझा जा सकता है?

पारंपरिक रूप से(Traditionally), विश्व मामलों को एक अंतरराष्ट्रीय प्रतिमान (International paradigm) के आधार पर समझा गया है। इस दृष्टिकोण में, राज्यों [जिन्हें अक्सर 'राष्ट्र(Nations)' माना जाता है, और इसीलिए 'अंतरराष्ट्रीय(Internatonal)' कहा जाता है] को विश्व राजनीति(World Politics) के मुख्य निर्माण खंड(Bulding Blocks) के रूप में देखा गया है। इसका अर्थ है कि विश्व मामलों का सार राज्यों के बीच संबंधों में निहित है।

यह दृष्टिकोण यह संकेत करता है कि यदि आप यह समझ लेते हैं कि कौन से कारक राज्यों के बीच परस्पर क्रियाओं(Interact) को प्रभावित(Influence) करते हैं, तो आप यह समझ सकते हैं कि दुनिया कैसे काम करती है।



हालांकि, 1980 के दशक से, एक वैकल्पिक प्रतिमान(Alternatve Paradgm), जिसे वैश्वीकरण (Globalization) कहा जाता है, लोकप्रिय हो गया है। यह इस विश्वास को दर्शाता है कि हाल के दशकों में वैश्विक आपसी जुड़ाव (interconnectedness) और परस्पर निर्भरता (interdependence) के विकास ने विश्व मामलों को परिवर्तित कर दिया है। इस दृष्टिकोण में, दुनिया अब अलग-अलग राज्यों या 'यूनिट्स' का संग्रह मात्र नहीं है, बल्कि एकीकृत रूप से 'एक विश्व' के रूप में कार्य करती है।


[वैश्वीकरण(Globalization):– एक जटिल परस्पर जुड़ाव के जाल का उदय, जिसका अर्थ है कि हमारे जीवन पर उन घटनाओं और निर्णयों का प्रभाव पड़ रहा है, जो हमसे बहुत दूर कहीं घटित होते हैं या लिए जाते हैं।]

यह कहना उतना ही अनुचित है कि राज्य और राष्ट्रीय सरकारें विश्व मामलों में अप्रासंगिक हैं, जितना कि यह मानना कि कई मुद्दों पर, राज्य अब एक वैश्विक परस्पर निर्भरता के संदर्भ में कार्य करते हैं।


लेकिन, राजनीति अब 'वैश्विक' किस अर्थ में है? और वैश्वीकरण ने विश्व राजनीति को कैसे और किस हद तक पुनः विन्यस्त (reconfigured) किया है?

वैश्विक राजनीति की हमारी समझ को उन विभिन्न सैद्धांतिक दृष्टिकोणों (theoretical lenses) को भी ध्यान में रखना चाहिए, जिनके माध्यम से दुनिया को देखा गया है; अर्थात, दुनिया को समझने के विभिन्न तरीके।



विशेष रूप से, वैश्विक राजनीति पर मुख्यधारा के दृष्टिकोण (mainstream perspectives) और आलोचनात्मक दृष्टिकोणों (critical perspectives) में क्या अंतर है? अंततः, दुनिया स्थिर रहने से इनकार करती है। वैश्विक राजनीति निरंतर और, कई लोगों के अनुसार, तेज़ी से परिवर्तन का क्षेत्र है। फिर भी, वैश्विक राजनीति के कुछ पहलू स्थायी प्रतीत होते हैं। वैश्विक राजनीति में स्थिरता और परिवर्तन के बीच संतुलन क्या है?


वैश्विक राजनीति क्या है(WHAT IS GLOBAL POLITICS)?


'वैश्विक राजनीति' क्यों? 

यह कैसे समझा जा सकता है कि राजनीति 'वैश्विक' हो गई है और 'वैश्विक' राजनीति 'अंतरराष्ट्रीय' राजनीति से कैसे भिन्न है? 

'वैश्विक' शब्द के दो अर्थ हैं, और इनका वैश्विक राजनीति पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। पहले अर्थ में, 'वैश्विक' का मतलब है विश्वव्यापी(Worldwide), अर्थात ग्रह-स्तरीय (केवल क्षेत्रीय या राष्ट्रीय नहीं)। इस दृष्टिकोण में, 'वैश्विक' राजनीति का तात्पर्य उस राजनीति से है जो राष्ट्रीय या क्षेत्रीय स्तर के बजाय वैश्विक स्तर पर संचालित होती है।


पिछले कुछ दशकों में राजनीति का यह वैश्विक आयाम अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। अंतरराष्ट्रीय संगठनों(International Organizations) की संख्या में वृद्धि हुई है, जिनमें से कुछ, जैसे कि संयुक्त राष्ट्र लगभग सार्वभौमिक सदस्यता के करीब पहुंचते हैं। कई राजनीतिक मुद्दे(Political Issues) भी 'वैश्विक' स्वरूप ले चुके हैं, क्योंकि वे वास्तविक या संभावित रूप से पूरी दुनिया और पृथ्वी के सभी लोगों को प्रभावित करते हैं। यह विशेष रूप से पर्यावरण के मामले में लागू होता है, जिसे अक्सर 'वैश्विक' मुद्दे का आदर्श उदाहरण माना जाता है, क्योंकि प्रकृति एक आपस में जुड़ी हुई इकाई के रूप में कार्य करती है, जहां हर चीज का प्रभाव हर दूसरी चीज पर पड़ता है।


इसी प्रकार, यह बात अर्थव्यवस्था पर भी लागू होती है, जिसे आमतौर पर 'वैश्विक अर्थव्यवस्था(global economy) या 'वैश्विक पूंजीवाद(global capitalism)' कहा जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि अब बहुत कम देश ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रणाली(international trading system) से बाहर हैं या विदेशी निवेश(external investment) और वित्तीय बाजारों के एकीकरण(integration of financial markets) से अप्रभावित हैं। वैश्वीकरण के सिद्धांतकारों के अनुसार, वैश्विक परस्पर जुड़ाव की यह प्रवृत्ति आधुनिक जीवन का परिभाषित पहलू है और यह मांग करती है कि पारंपरिक दृष्टिकोणों को नए सिरे से सोचा जाए, जैसे राजनीति में 'बिना सीमाओं' या 'पारग्रहणीय' दृष्टिकोण(borderless or transplanetary approach) अपनाना।


हालांकि, यह धारणा(Notion) कि राजनीति  और बाकी सब कुछ  एक ऐसी परस्पर जुड़ाव की प्रक्रिया में शामिल हो गया है जो इसे एक अविभाज्य वैश्विक संपूर्ण में बदल देती है, वास्तविकता से परे है। यह दावा कि हम 'सीमाहीन' दुनिया में रहते हैं, या यह कि राज्य का अस्तित्व समाप्त हो गया है और संप्रभुता अप्रासंगिक हो गई है (Ohmae 1990, 1996), अभी भी काल्पनिक विचार ही हैं। वैश्विक स्तर पर राजनीति ने किसी भी अर्थपूर्ण तरीके से राष्ट्रीय, स्थानीय या अन्य स्तरों की राजनीति को पार नहीं किया है।

 

'वैश्विक' का अर्थ व्यापक है। इस दृष्टिकोण में, 'वैश्विक' का मतलब है किसी प्रणाली के सभी तत्वों को समाहित करना, न कि केवल पूरे सिस्टम को। इस प्रकार, वैश्विक राजनीति केवल वैश्विक स्तर पर ही नहीं, बल्कि सभी स्तरों - विश्वव्यापी, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय, उप-राष्ट्रीय आदि  पर और उनके बीच होती है।


इस परिप्रेक्ष्य में, वैश्विक राजनीति के आगमन का मतलब यह नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति को इतिहास की परिधि में डाल दिया जाए। बल्कि, 'वैश्विक' और 'अंतरराष्ट्रीय' सह-अस्तित्व में हैं वे एक-दूसरे के पूरक हैं और उन्हें प्रतिद्वंद्वी या असंगत दृष्टिकोणों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।


यह उतना ही अनुचित है कि राज्यों और राष्ट्रीय सरकारों को अप्रासंगिक मान लिया जाए, जितना यह इनकार करना कि कई मुद्दों पर राज्य अब वैश्विक परस्पर निर्भरता के संदर्भ में काम कर रहे हैं।


वैश्विक राजनीति इस तथ्य को दर्शाता है कि राज्यों के भीतर क्या हो रहा है और राज्यों के बीच क्या हो रहा है, ये दोनों पहले की तुलना में एक-दूसरे को अधिक प्रभावित कर रहे हैं। साथ ही, राजनीति का बढ़ता हुआ हिस्सा अब केवल राज्य के भीतर और उसके माध्यम से नहीं होता। इस दृष्टिकोण से यह पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अध्ययन की सीमाओं से परे जाता है और एक बहु-विषयक दृष्टिकोण (interdisciplinary approach) अपनाने की अनुमति देता है, जो सामाजिक विज्ञान के विभिन्न मुद्दों और विषयों को ध्यान में रखता है।

[राज्य:– एक राजनीतिक संघ जो परिभाषित भौगोलिक सीमाओं के भीतर संप्रभु अधिकार क्षेत्र स्थापित करता है।]

फिर भी, अंतरराष्ट्रीय संबंधों को विशेष ध्यान दिया गया है, क्योंकि इस क्षेत्र में विशेष रूप से हाल के दशकों में प्रासंगिक शोध और सैद्धांतिक विकास हुआ है।


संप्रभुता(Sovereignty):–

संप्रभुता सर्वोच्च और अडिग अधिकार का सिद्धांत है, जो राज्य द्वारा अपनी सीमा के भीतर कानूनों का एकमात्र निर्माता होने के दावे में परिलक्षित होता है। बाहरी संप्रभुता (जिसे कभी-कभी 'राज्य संप्रभुता' या 'राष्ट्रीय संप्रभुता' कहा जाता है) राज्य की क्षमता को दर्शाती है कि वह विश्व मंच पर स्वतंत्र और स्वायत्त रूप से कार्य कर सकता है। इसका मतलब है कि राज्य कानूनी रूप से समान हैं और राज्य की भौतिक अखंडता और राजनीतिक स्वतंत्रता अभेद्य हैं।

आंतरिक संप्रभुता उस स्थान को संदर्भित करती है जहां सर्वोच्च शक्ति/अधिकार राज्य के भीतर स्थित है। तथापि, संप्रभुता की संस्था विकसित हो रही है और बदल रही है, क्योंकि नए संप्रभुता के सिद्धांत उभर रहे हैं ('आर्थिक संप्रभुता, 'खाद्य संप्रभुता आदि) और संप्रभुता को नए परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलित किया जा रहा है ('साझी संप्रभुता(Pooled sovereignty), 'जिम्मेदार संप्रभुता आदि)।


प्राधिकार(Authority):– दूसरों के व्यवहार को प्रभावित करने का अधिकार, जिसे पालन करने का एक स्वीकृत कर्तव्य माना जाता है; वैधता में ढकी हुई शक्ति।



अंतरराष्ट्रीय राजनीति(international politics) से वैश्विक राजनीति(global politics)


किस प्रकार 'अंतरराष्ट्रीय' राजनीति 'वैश्विक' राजनीति में परिवर्तित हो गई है, और यह प्रक्रिया कितनी प्रगति कर चुकी है? 

विश्व राजति के रूपरेखा में हाल के वर्षों में क्या बदलाव हुए हैं? 

सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन निम्नलिखित हैं:-

  • विश्व मंच पर नए अभिनेता/नए वैश्विक अभिनेताओं का उदय(New actors on the world stage/the emergence of new global actors)
  • बढ़ती परस्पर निर्भरता और आपसी जुड़ाव(Increased interdependence and interconnectedness)
  • घरेलू और अंतरराष्ट्रीय विभाजन का क्षरण(the erosion of the domestic/international divide)
  • वैश्विक शासन की प्रवृत्ति/वैश्विक शासन का उभरना(The trend towards global governance/the rise of global governance)

राज्य और नए वैश्विक अभिनेता

विश्व राजनीति को पारंपरिक रूप से अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से समझा गया है। यद्यपि ऐतिहासिक रूप से क्षेत्रीय-आधारित राजनीतिक इकाइयों के बीच संघर्ष(Conflict) और सहयोग(Co-operation) के पैटर्न मौजूद रहे हैं 'अंतरराष्ट्रीय संबंध(international relations)' शब्द का उपयोग पहली बार ब्रिटिश दार्शनिक और विधिक सुधारक जेरेमी बेंथम (1748–1832) ने अपनी पुस्तक प्रिंसिपल्स ऑफ़ मॉरल्स एंड लेजिस्लेशन/Principles of Morals and Legislation (1789) में किया 



बेंथम के इस शब्द के उपयोग ने एक महत्वपूर्ण बदलाव को मान्यता दी: कि 18वीं शताब्दी के अंत तक, क्षेत्रीय-आधारित राजनीतिक इकाइयाँ अधिक स्पष्ट रूप से राष्ट्रीय स्वरूप धारण कर रही थीं, जिससे उनके बीच के संबंध वास्तव में 'अंतर-राष्ट्रीय' प्रतीत होने लगे।


हालांकि अधिकांश आधुनिक राज्य या तो राष्ट्र-राज्य हैं या राष्ट्र-राज्य बनने की आकांक्षा रखते हैं, यह उनकी राज्य की स्थिति स्टेटहुड है, न कि उनकी राष्ट्रीयता नेशनहुड जो उन्हें विश्व मंच पर प्रभावी रूप से कार्य करने की अनुमति देती है। इस प्रकार, 'अंतरराष्ट्रीय' राजनीति को अधिक सही ढंग से 'अंतर-राज्यीय(inter-state politics)' राजनीति के रूप में वर्णित किया जाना चाहिए। 

लेकिन एक राज्य क्या है?

1933 के मॉन्टेविडियो सम्मेलन(Montevideo Convention) "राज्यों के अधिकार और कर्तव्य" के  अनुसार, एक राज्य में चार योग्यता वाली विशेषताएँ होनी चाहिए:-


1. स्थायी जनसंख्या (Permanent Population):- राज्य की एक स्थायी और परिभाषित जनसंख्या होनी चाहिए।

2. परिभाषित क्षेत्र (Defined Territory):- राज्य का एक परिभाषित और मान्यता प्राप्त भौगोलिक क्षेत्र होना चाहिए।

3. सरकार (Effective Government):- राज्य में एक प्रभावी सरकार होनी चाहिए जो अपने क्षेत्र पर नियंत्रण रख सके।

4. अन्य राज्यों के साथ संबंध स्थापित करने की क्षमता (Capacity to Enter Relations with Other States):- राज्य को अन्य राज्यों के साथ अंतरराष्ट्रीय संबंध स्थापित करने की क्षमता होनी चाहिए।

ये चार तत्व मिलकर एक संप्रभु राज्य की परिभाषा को पूरा करते हैं।


इस दृष्टिकोण में, राज्यों (या देशों, जिन्हें इस संदर्भ में समानार्थी शब्द के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है) को विश्व मंच पर प्रमुख अभिनेता माना जाता है, और शायद केवल वही जिन्हें गंभीरता से लिया जाना चाहिए। यही कारण है कि विश्व राजनीति के पारंपरिक दृष्टिकोण को राज्य-केंद्रित(state-centric) माना जाता है और अंतरराष्ट्रीय प्रणाली(state-system) को अक्सर राज्य-प्रणाली के रूप में वर्णित किया जाता है। इस दृष्टिकोण की उत्पत्ति आमतौर पर Peace of Westphalia (1648) से मानी जाती है, जिसने राज्य की विशेषता के रूप में संप्रभुता की स्थापना की। राज्य की संप्रभुता इस प्रकार अंतरराष्ट्रीय राजनीति का प्राथमिक संगठित सिद्धांत बन गई।


वेस्टफेलिया की संधि, 1648

वेस्टफेलिया की शांति सन् 1648 में हुई एक महत्वपूर्ण संधि थी, जिसने यूरोप में 30 वर्षों तक चले धार्मिक और राजनीतिक युद्धों (तीस वर्षीय युद्ध) को समाप्त किया। यह संधि जर्मनी के वेस्टफेलिया क्षेत्र में हुई और इसे दो मुख्य समझौतों - ओस्नाब्रुक और म्यूनस्टर - के माध्यम से लागू किया गया।

मुख्य बिंदु:-

1. राज्य संप्रभुता का सिद्धांत:- वेस्टफेलिया की संधि ने आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों की नींव रखी। इसने राज्यों की संप्रभुता (sovereignty) और स्वतंत्रता को मान्यता दी, जिसमें हर राज्य को अपने आंतरिक मामलों (जैसे धर्म और शासन व्यवस्था) में स्वतंत्रता दी गई।

2. धार्मिक सहिष्णुता:- यह संधि कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट गुटों के बीच हुई, जिसने धार्मिक विवादों को समाप्त किया। शासकों को यह अधिकार दिया गया कि वे अपने राज्य में धर्म का निर्धारण कर सकते हैं, लेकिन अल्पसंख्यक धर्मों को भी सहनशीलता का अधिकार मिला।

3. क्षेत्रीय पुनर्गठन:- कुछ क्षेत्रों की सीमाओं को बदला गया। फ्रांस और स्वीडन जैसे देशों को नई क्षेत्रीय संपत्तियाँ प्राप्त हुईं। जर्मनी के राज्यों को अधिक स्वायत्तता मिली।

4. अंतरराष्ट्रीय प्रणाली की शुरुआत:- संधि ने राज्यों के बीच शांति और संप्रभुता को बनाए रखने के लिए कूटनीतिक संबंधों की शुरुआत की। यह प्रणाली आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति और संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठनों की नींव मानी जाती है।


वेस्टफेलियाई राज्य-प्रणाली(The Westphalian state-system)


वेस्टफेलिया की शांति (1648) को सामान्यतः आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति की शुरुआत के रूप में माना जाता है।


यह शांति एक श्रृंखला समझौतों का हिस्सा थी, जिसने तीस साल के युद्ध (1618-48) का अंत किया, जिसमें मध्य यूरोप में एक श्रृंखला घोषित और अव्यक्त युद्ध हुए थे, जिनमें पवित्र रोमन साम्राज्य और विभिन्न विरोधी शामिल थे, जिनमें डेन, डच और सबसे ऊपर, फ्रांस और स्वीडन थे।


हालाँकि यह संक्रमण बहुत लंबे समय में हुआ, इन समझौतों ने एक मध्यकालीन यूरोप, जिसमें अधिकारों, वफादारी और पहचानों का ओवरलैप था, को एक आधुनिक राज्य-प्रणाली में बदलने में मदद की। जिसे 'वेस्टफेलियाई प्रणाली' कहा जाता है, वह दो मुख्य सिद्धांतों पर आधारित थी:


• राज्यों को संप्रभु अधिकार प्राप्त है, इस अर्थ में कि वे अपनी सीमा के भीतर होने वाली घटनाओं पर स्वतंत्र नियंत्रण रखते हैं (इसलिए सभी अन्य संस्थाएँ और समूह, आध्यात्मिक और भौतिक, राज्य के अधीन होते हैं)।


• राज्यों के बीच और उनके बीच संबंधों को सभी राज्यों की संप्रभु स्वतंत्रता की स्वीकृति द्वारा संरचित किया जाता है (इसलिए यह संकेत करता है कि राज्य कानूनी रूप से समान हैं)।


राज्य-केंद्रितता(State-centrism):- राजनीतिक विश्लेषण का एक दृष्टिकोण जो राज्य को घरेलू क्षेत्र और विश्व मंच पर मुख्य अभिनेता मानता है।

राज्य-प्रणाली(State-system):- राज्यों के बीच और उनके बीच संबंधों का एक पैटर्न जो एक निश्चित स्तर की व्यवस्था और पूर्वानुमानिता स्थापित करता है। यह प्रणाली आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति और संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठनों की नींव मानी जाती है।


हालांकि, विश्व राजनीति के राज्य-केंद्रित दृष्टिकोण को बनाए रखना अब कठिन हो गया है। इसका एक कारण यह है कि अब राज्यों को विश्व मंच पर केवल एकमात्र महत्वपूर्ण अभिनेता मानना संभव नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय निगम (TNCs), गैर-सरकारी संगठन (NGOs) और कई अन्य गैर-राज्य निकाय प्रभाव डालने लगे हैं। अलग-अलग तरीकों और डिग्री में अल-कायदा, एंटी-कैपिटलिस्ट मूवमेंट, ग्रीनपीस, गूगल, जनरल मोटर्स और पोप की संस्था, Social media जैसे समूह और संगठन विश्व राजनीति को आकार देने में योगदान करते हैं।


कुछ लोग तर्क देते हैं कि राज्य की विशेष स्थिति एक वैश्विक अभिनेता के रूप में बनी रहती है, क्योंकि यह वही है जो राजनीतिक समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने प्रसिद्ध रूप से 'एक निर्दिष्ट क्षेत्र के भीतर वैध शारीरिक बल के उपयोग के एकाधिकार('monopoly of the legitimate use of physical force within a given territory') (वेबर [1919] 1948) के रूप में वर्णित किया था।


राज्य की भूमिका, जो युद्ध छेड़ने और घरेलू कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली इकाई के रूप में इसे अद्वितीय बनाती है, मानी जाती है। लेकिन 21वीं सदी की शुरुआत में यह भी कम निश्चित लगता है, जब निजी सैन्य और सुरक्षा कंपनियों (PMSCs) का उदय हुआ है - जिसे परंपरागत रूप से 'भाड़े के सैनिकों' के रूप में जाना जाता था  और दूसरी ओर पुलिसिंग और जेलों के बढ़ते निजीकरण ने इस धारणा को चुनौती दी है।


अंतरराष्ट्रीय संबंधों में, राज्यों ने सशस्त्र संघर्षों में PMSCs पर बढ़ती निर्भरता दिखाई है, जैसे कि इराक युद्ध में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा। वहीं PMSCs ने तख्तापलट के प्रयासों में अर्धसैनिक और गुप्त बलों के रूप में भी भूमिका निभाई है। इसका एक उदाहरण मई 2020 में हुआ, जब एक PMSC सिल्वरकॉर्प यूएसए के तहत काम कर रहे पूर्व अमेरिकी विशेष बलों के सैनिकों ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हटाने का असफल प्रयास किया (इन भाड़े के सैनिकों को वेनेजुएला की सेना ने पकड़ लिया और जेल में डाल दिया)।

राज्यों के भीतर, सशस्त्र और राज्य-स्वीकृत निजी सुरक्षा कंपनियों ने दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में बहुसंख्यक-श्वेत 'गेटेड कम्युनिटीज़' की सुरक्षा से लेकर अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम में जेलों और प्रवासन हिरासत केंद्रों के नियमित संचालन तक सब कुछ किया है।


हालांकि राज्य अभी भी 'वैध' हिंसा के सबसे बड़े और शायद सबसे उच्च गुणवत्ता वाले साधनों को बनाए रखते हैं लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि उनके पास अब इसका एकाधिकार नहीं है। युद्ध शक्ति और पुलिस शक्ति की अभिव्यक्तियों में उप-राज्य और निजी अभिनेताओं की विस्तारित भूमिका इस दावे को और मजबूत करती है कि हम एक 'उत्तर-वेस्टफेलियन(post-Westphalian)' वैश्विक व्यवस्था में रहते हैं जो जटिलता और परस्पर निर्भरता द्वारा विशेषता प्राप्त करती है।'

[Post-Westphalian' शब्द 1648 की वेस्टफेलिया संधि (Treaty of Westphalia) से जुड़ा है जिसने आधुनिक राष्ट्र-राज्य प्रणाली की नींव रखी थी। यह प्रणाली इस सिद्धांत पर आधारित थी कि प्रत्येक राज्य की अपनी संप्रभुता है और वह अपने क्षेत्र में सर्वोच्च अधिकार रखता है।]

1970 के दशक से, बहुलवादी सिद्धांतकारों ने विश्व राजनीति का एक मिश्रित-अभिनेता मॉडल(mixed-actor model) प्रस्तावित किया। हालांकि यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि राज्य और राष्ट्रीय सरकारें अब केवल कई प्रकार के अभिनेताओं में से एक हैं, वे अभी भी सबसे महत्वपूर्ण अभिनेता बने रह सकते हैं। उदाहरण के लिए, कोई भी TNC या NGO राज्य की जबरदस्त शक्ति की बराबरी नहीं कर सकता, चाहे वह उसकी सीमाओं के भीतर व्यवस्था लागू करने की क्षमता हो या अन्य राज्यों से सैन्य रूप से निपटने की क्षमता।

[Mixed-actor model:- यह सिद्धांत है कि, जबकि राज्यों और राष्ट्रीय सरकारों की भूमिका की उपेक्षा किए बिना, अंतरराष्ट्रीय राजनीति एक बहुत व्यापक दायरे के हितों और समूहों द्वारा आकारित होती है।]


अंतरराष्ट्रीय संबंध: 'महान बहसें(International Relations: the ‘great debates’)


अंतरराष्ट्रीय संबंधों का शैक्षिक अनुशासन (जिसे अक्सर IR कहा जाता है) प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) के बाद उभरा, जिसका एक महत्वपूर्ण प्रेरक कारण शाश्वत शांति स्थापित करने के तरीकों की खोज था। इस अनुशासन का केंद्रीय ध्यान राज्यों के बीच संबंधों के अध्ययन पर रहा है, और इन संबंधों को पारंपरिक रूप से मुख्य रूप से कूटनीतिक, सैन्य और रणनीतिक दृष्टिकोण (diplomatic, military and strategic terms) से समझा गया है। हालांकि, समय के साथ इस अनुशासन की प्रकृति और ध्यान में महत्वपूर्ण बदलाव आया है, विशेष रूप से 'महान बहसों' की श्रृंखला के माध्यम से।


पहली 'महान बहस' 1930 और 1950 के दशक के बीच हुआ, जो उदारवादी अंतरराष्ट्रीयवादियों (iberal internationalists) के बीच था, जिन्होंने शांतिपूर्ण सहयोग की संभावना (peaceful, cooperation, and realists) पर जोर दिया, और यथार्थवादियों के बीच, जो अपरिहार्य शक्ति राजनीति में विश्वास करते थे। 1950 के दशक तक, यथार्थवाद ने अनुशासन में प्रमुखता प्राप्त कर ली थी।


दूसरी 'महान बहस' 1960 के दशक के दौरान हुआ, और यह व्यवहारवादियों और पारंपरिकतावादियों (behaviouralists and traditionalists) के बीच था, यह जानने के लिए कि क्या अंतरराष्ट्रीय संबंधों के 'कानूनों' को वस्तुनिष्ठ रूप से विकसित किया जा सकता है (whether it is possible to develop objective ‘laws’ of international relations)


तीसरी 'महान बहस'(इंटर-पैरेडाइम बहस/inter-paradigm debate) 1970 और 1980 के दशक के दौरान हुई। यह यथार्थवादियों, उदारवादियों और दूसरी ओर मार्क्सवादियों (realists and liberals Vs Marxists)के बीच हुई  थी, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को आर्थिक दृष्टिकोण से समझा।


चौथी 'महान बहस' 1980 के दशक के अंत में शुरू हुआ, और यह सकारात्मकतावादियों और तथाकथित पोस्ट-पॉजिटिविस्टों(positivists and so-called postpositivists) के बीच था, जो सिद्धांत और वास्तविकता के बीच संबंध पर(the relationship between theory and reality) बहस कर रहे थे। यह IR में नई आलोचनात्मक दृष्टिकोणों(critical perspectives), जैसे सामाजिक निर्माणवाद(social constructivism), आलोचनात्मक सिद्धांत(critical theory), उत्तर संरचनावाद(poststructuralism), उत्तर उपनिवेशवाद(postcolonialism), नारीवाद(feminism)  और हरित राजनीति(green politics) की बढ़ती प्रभाव को दर्शाता था।


बढ़ती परस्पर निर्भरता और आपसी जुड़ाव(Increased interdependence and interconnectedness)


अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अध्ययन पारंपरिक रूप से इस तथ्य का अध्ययन करना था कि अंतरराष्ट्रीय प्रणाली राज्यों के एक संग्रह में विभाजित है। संप्रभुता के कारण, इन राज्यों को स्वतंत्र और स्वायत्त इकाइयों के रूप में देखा गया। इस राज्य-केंद्रित दृष्टिकोण(state-centric approach) को अक्सर तथाकथित 'बिलियर्ड बॉल मॉडल(billiard ball model)' के माध्यम से समझाया गया, जिसने 1950 के दशक और बाद में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बारे में सोच पर प्रभुत्व जमाया, और यह यथार्थवादी सिद्धांत से विशेष रूप से जुड़ा हुआ था।


इस मॉडल में यह माना गया कि राज्य, बिलियर्ड बॉल की तरह, अपारदर्शी और स्व-नियंत्रित इकाइयाँ हैं, जो बाहरी दबावों के माध्यम से एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। राज्य-प्रणाली के भीतर परस्पर क्रिया करने वाले संप्रभु राज्यों को इस प्रकार एक तालिका पर चलने और आपस में टकराने वाली बिलियर्ड बॉल के संग्रह के रूप में देखा जाता है।


इस दृष्टिकोण में, राज्यों के बीच 'टकराव' मुख्य रूप से सैन्य और सुरक्षा मामलों से जुड़े होते हैं, जो यह धारणा दर्शाते हैं कि शक्ति और अस्तित्व राज्य के प्राथमिक चिंता के विषय हैं(the assumption that power and survival are the primary concerns of the state)। अंतरराष्ट्रीय राजनीति इस प्रकार मुख्य रूप से युद्ध और शांति के मुद्दों के इर्द-गिर्द केंद्रित है, जिसमें कूटनीति और संभवतः सैन्य कार्रवाई राज्य की परस्पर क्रिया के प्रमुख रूप माने जाते हैं।

[सुरक्षा(security):- हानि से बचना, खतरे की अनुपस्थिति; सुरक्षा को 'राष्ट्रीय', 'अंतरराष्ट्रीय', 'वैश्विक' या 'मानव' दृष्टिकोण से समझा जा सकता है।

कूटनीति(Diplomacy):- राज्यों के बीच संवाद(negotiation) और वार्ता(communication)  की एक प्रक्रिया, जो युद्ध के बिना संघर्ष को हल करने का प्रयास करती है; यह विदेश नीति(foreign policy) का एक उपकरण(instrument) है।]


बिलियर्ड बॉल मॉडल के दो प्रमुख प्रभाव:–


1. घरेलू और अंतरराष्ट्रीय राजनीति का स्पष्ट विभाजन(clear distinction between domestic politics):–

यह मॉडल घरेलू राजनीति, जो राज्य की सीमाओं के भीतर(own borders) व्यवस्था बनाए रखने और विनियमन करने में राज्य की भूमिका से संबंधित है, और अंतरराष्ट्रीय राजनीति(international politics), जो राज्यों के बीच संबंधों से संबंधित है, के बीच एक स्पष्ट विभाजन का सुझाव देता है।

इस दृष्टिकोण में, संप्रभुता बिलियर्ड बॉल की कठोर परत है, जो 'बाहर' को 'अंदर' से विभाजित करती है(that divides the ‘outside’ from the ‘inside’)। सरल शब्दों में कहें तो, सीमाएँ मायने रखती हैं।


2. शक्ति के वितरण पर प्रभाव(Effect on distribution of power):–

यह मॉडल यह भी संकेत देता है कि अंतरराष्ट्रीय प्रणाली में संघर्ष और सहयोग के पैटर्न मुख्य रूप से राज्यों के बीच शक्ति के वितरण(distribution of power) से निर्धारित होते हैं।


इस प्रकार, यद्यपि राज्य-केंद्रित सिद्धांतकारों ने राज्यों की औपचारिक, कानूनी समानता को स्वीकार किया, प्रत्येक राज्य को एक संप्रभु इकाई मानते हुए, उन्होंने यह भी माना कि कुछ राज्य दूसरों की तुलना में अधिक शक्तिशाली होते हैं और वास्तव में, कभी-कभी शक्तिशाली राज्य कमजोर राज्यों के मामलों में हस्तक्षेप कर सकते हैं। प्रभावी रूप से, सभी बिलियर्ड बॉल समान आकार की नहीं होतें हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन ने परंपरागत रूप से तथाकथित 'महाशक्तियों(great powers)' के हितों और व्यवहार पर विशेष ध्यान दिया है।


हालांकि, हाल के रुझानों और विकास के कारण बिलियर्ड बॉल मॉडल दबाव में आ गया है। इनमें से दो विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहे हैं:-

1. सीमाओं का बढ़ता छिद्रण और अंतरराष्ट्रीय प्रवाह/ सीमा-पार या अंतरराष्ट्रीय प्रवाह और लेन-देन में पर्याप्त वृद्धि:-  

 राज्य की सीमाएँ 'छिद्रयुक्त' हो गई हैं, जिससे पारंपरिक घरेलू/अंतरराष्ट्रीय विभाजन को बनाए रखना कठिन हो गया है। दूसरे शब्दों में, राज्य की सीमाएँ तेजी से 'संतरणीय' (porous) हो गई हैं, और परिणामस्वरूप पारंपरिक घरेलू/अंतरराष्ट्रीय या 'भीतर/बाहर' का विभाजन बनाए रखना लगातार कठिन होता जा रहा है। इस प्रवृत्ति को विशेष रूप से वैश्वीकरण के साथ जोड़ा गया है।


2. बढ़ती परस्पर निर्भरता और आपसी जुड़ाव:-

आर्थिक विकास और समृद्धि को बढ़ावा देने, वैश्विक तापन रोकने, व्यापक विनाश के हथियारों के प्रसार को रोकने और महामारी रोगों से निपटने जैसे कार्य किसी भी राज्य के लिए अकेले करना असंभव हो गया है, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो।


[Transnational:- एक संरचना, जो घटनाओं, लोगों, समूहों या संगठनों पर लागू हो सकती है, जो राष्ट्रीय सरकार या राज्य की सीमाओं का बहुत कम या बिलकुल भी ध्यान नहीं रखती है; 'अंतरराष्ट्रीय' और 'बहुराष्ट्रीय' से अलग।]



'जटिल अन्योन्याश्रयता(complex interdependence)' का उदय

केओहान और  न्ये/ Keohane and Nye (1977) के अनुसार, इन परिस्थितियों ने 'जटिल परस्पर निर्भरता' की स्थिति उत्पन्न की है, जिसमें राज्य निकट व्यापारिक और आर्थिक संबंधों जैसी ताकतों द्वारा सहयोग और एकीकरण में खिंचते हैं। यह 'कोबवेब मॉडल' के माध्यम से समझाया गया है।


फिर भी, इस सोच को बहुत अधिक खींचा नहीं जा सकता।

दुनिया के कुछ हिस्से, विशेष रूप से मध्य पूर्व, स्पष्ट रूप से सैन्य-सामरिक संघर्ष में उलझे हुए हैं, जो यह दर्शाता है कि बिलियर्ड बॉल मॉडल पूरी तरह से गलत नहीं है और विभिन्न क्षेत्रों में परस्पर निर्भरता के स्तर में काफी भिन्नता है।

परस्पर निर्भरता हमेशा शांति, सहयोग और एकीकरण की ओर प्रवृत्ति नहीं रखती। यह असमान भी हो सकती है, और ऐसे मामलों में यह शांति और सद्भाव के बजाय प्रभुत्व और संघर्ष का कारण बन सकती है।


घरेलू/अंतर्राष्ट्रीय विभाजन से लेकर अंतर्राष्ट्रीयता तक(FROM THE DOMESTIC/INTERNATIONAL DIVIDE TO TRANSNATIONALISM)?

अंतरराष्ट्रीय' दृष्टिकोण से अध्ययन करने के प्रमुख निहितार्थों में से एक यह है कि राजनीति की एक विशिष्ट स्थानिक या क्षेत्रीय प्रकृति होती है। सीधे शब्दों में कहें तो सीमाएं और सरहदें मायने रखती हैं। यह विशेष रूप से घरेलू राजनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के बीच अंतर के संदर्भ में लागू होता है। घरेलू राजनीति राज्य की सीमाओं के भीतर व्यवस्था बनाए रखने और नियमन करने की भूमिका से संबंधित होती है, जबकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति राज्यों के बीच और उनके आपसी संबंधों से जुड़ी होती है।

इस संदर्भ में, संप्रभुता को एक 'मजबूत खोल' के रूप में देखा जाता है, जो राजनीति के 'अंदर' और 'बाहर' को विभाजित करती है। यह घरेलू/अंतरराष्ट्रीय या 'अंदर/बाहर' का विभाजन पारंपरिक रूप से राजनीतिक बातचीत के दो अलग-अलग क्षेत्रों के रूप में देखा गया है। जहां 'अंदर' की राजनीति एक व्यवस्थित और विनियमित प्रकृति की होती है, जो घरेलू क्षेत्र में राज्य की शासन लगाने की क्षमता से उत्पन्न होती है, वहीं 'बाहर' की राजनीति में इस प्रकार का आदेश अनुपस्थित होता है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में संप्रभु राज्य से ऊपर कोई प्राधिकरण नहीं होता।


जॉन एग्न्यू (1994) के अनुसार, इस प्रकार की सोच ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अध्ययन में एक 'क्षेत्रीय जाल' (territorial trap) बना दिया है, जो तीन मान्यताओं में प्रकट होता है:-

1. राज्य एक स्पष्ट रूप से सीमांकित क्षेत्रीय स्थान है।

2. घरेलू और विदेशी मामलों को पूरी तरह से अलग-अलग क्षेत्र माना गया है।

3. राज्य समाज के 'पात्र' (containers) हैं, अर्थात राज्य की सीमाएं समाज की सीमाओं के साथ मेल खाती हैं।

सीमाओं और स्पष्ट क्षेत्रीय विभाजनों पर जोर, हाल के रुझानों और घटनाओं के परिणामस्वरूप, विशेष रूप से वैश्वीकरण से जुड़े कारकों के कारण, दबाव में आ गया है। विशेष रूप से, लोगों, वस्तुओं, धन, सूचना और विचारों की सीमा पार आवाजाही और लेन-देन में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है। इसने ट्रांसनेशनलिज़्म (पारराष्ट्रीयता) की अवधारणा को जन्म दिया है।


जैसे-जैसे राज्य की सीमाएँ अधिक 'छिद्रपूर्ण' (porous) होती गई हैं जिससे पारंपरिक घरेलू/अंतरराष्ट्रीय या 'अंदर/बाहर' का विभाजन बनाए रखना कठिन हो गया है। इसका उदाहरण घरेलू अर्थव्यवस्थाओं की उन घटनाओं के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता में देखा जा सकता है जो दुनिया के अन्य हिस्सों में होती हैं (जैसा कि 2007-08 के वैश्विक वित्तीय संकट और 2020 के वैश्विक कोरोना वायरस महामारी के व्यापक प्रभाव से स्पष्ट होता है)। इसी तरह डिजिटल तकनीकों के व्यापक उपयोग से (जैसे मोबाइल फोन और इंटरनेट) लोग एक-दूसरे से उन तरीकों से संवाद कर सकते हैं जिन्हें राष्ट्रीय सरकारों के लिए नियंत्रित करना कठिन है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि पर्यावरणीय राजनीति और मानवाधिकार जैसे विश्व मामलों में प्रमुख मुद्दों की एक स्वाभाविक ट्रांसनेशनल प्रकृति होती है। हालांकि यह दावा करना कि आधुनिक दुनिया प्रभावी रूप से 'सीमाहीन' है स्पष्ट रूप से अनुचित है। बल्कि कुछ मामलों में क्षेत्रीय विभाजन कम महत्वपूर्ण होने के बजाय अधिक महत्वपूर्ण हो रहे हैं। उदाहरण के लिए, 11 सितंबर के आतंकवादी हमलों के बाद से दुनिया के कई हिस्सों में राष्ट्रीय या 'गृहभूमि' सुरक्षा पर बढ़ते जोर में अंतरराष्ट्रीय प्रवासन को सीमित करने के लिए सीमा और अन्य आव्रजन नियंत्रणों को सख्त करने के प्रयासों ने  इसे स्पष्ट कर दिया है।



अंतरराष्ट्रीय अराजकता से वैश्विक शासन तक(FROM INTERNATIONAL ANARCHY TO GLOBAL GOVERNANCE)?


अंतरराष्ट्रीय राजनीति के पारंपरिक दृष्टिकोण का एक प्रमुख निष्कर्ष यह रहा है कि राज्य-प्रणाली अराजकता के संदर्भ में कार्य करती है(the state-system operates in a context of anarchy)। इसका तात्पर्य यह है कि राज्य से ऊपर कोई उच्चतर प्राधिकरण नहीं है(no higher authority than the state), जिसका अर्थ है कि बाहरी राजनीति(external politics) एक अंतरराष्ट्रीय राज्य की प्रकृति/स्वभाव (international ‘state of nature’)  एक पूर्व-राजनीतिक समाज के रूप में कार्य करती है।


[अराजकता(Anarchy):- शाब्दिक रूप से, बिना नियम के; एक केंद्रीय सरकार या उच्च प्राधिकरण की अनुपस्थिति, कभी-कभी, लेकिन जरूरी नहीं कि अस्थिरता और अराजकता से जुड़ी होती है।]


अंतरराष्ट्रीय अराजकता के परिणाम गहरे हैं। सबसे महत्वपूर्ण, किसी अन्य शक्ति की अनुपस्थिति में, जो उनके हितों का ध्यान रख सके, राज्यों को आत्मनिर्भरता(self help) पर निर्भर रहना पड़ता है। यदि अंतरराष्ट्रीय राजनीति एक 'आत्मनिर्भर प्रणाली' के रूप में कार्य करती है, तो एक राज्य की शक्ति प्राप्त(power seeking) करने की प्रवृत्ति केवल अन्य राज्यों की प्रतिस्पर्धी प्रवृत्तियों द्वारा संतुलित होती है, जिससे यह संकेत मिलता है कि संघर्ष और युद्ध(conflict and war) अंतरराष्ट्रीय प्रणाली की अपरिहार्य विशेषताएँ हैं

[आत्म-निर्भरता(Self-help):- आंतरिक या आंतरिक संसाधनों पर निर्भरता, जिसे अक्सर इस रूप में देखा जाता है कि राज्य अपनी सुरक्षा और अस्तित्व को प्राथमिकता देते हैं।]

इस दृष्टिकोण में, संघर्ष केवल शक्ति-संतुलन(balance of power) द्वारा नियंत्रित होता है, जो या तो शांति-प्रिय नेताओं(peace minded leaders) द्वारा एक कूटनीतिक रणनीति(diplomatic strategy) के रूप में विकसित किया जाता है या सौभाग्यवश(coincidence) उत्पन्न होता है। अराजकता की इस छवि को 'अंतरराष्ट्रीय समाज(nternational society)' के विचार द्वारा संशोधित किया गया है। हेडली बुल/ Hedley Bull (2002) ने पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय अराजकता के सिद्धांत के स्थान पर 'अराजक समाज' की अवधारणा प्रस्तुत की।


[शक्ति का संतुलन(Balance of power):- एक ऐसी स्थिति जिसमें कोई एक राज्य दूसरों पर हावी नहीं होता, जो सामान्य संतुलन बनाने और सभी राज्यों के साम्राज्यवादी आकांक्षाओं को रोकने की प्रवृत्ति रखती है।]


वैश्विक शासन का उदय

हालांकि, अंतरराष्ट्रीय अराजकता की अवधारणा, और यहां तक कि 'अराजक समाज' का अधिक मामूली विचार, 1945 के बाद विशेष रूप से वैश्विक शासन (और कभी-कभी क्षेत्रीय शासन) के ढांचे के उदय के कारण टिकाऊ होना कठिन हो गया है। यह संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व व्यापार संगठन (WTO), यूरोपीय संघ (EU) जैसी संस्थाओं के बढ़ते महत्व में परिलक्षित होता है।


अंतरराष्ट्रीय संगठनों का महत्व


अंतरराष्ट्रीय संगठनों की बढ़ती संख्या और महत्व शक्तिशाली और दबावपूर्ण कारणों से उत्पन्न हुआ है। विशेष रूप से, यह इस तथ्य को दर्शाता है कि राज्यों को सामूहिक दुविधाओं(Collective dilemma) का सामना करना पड़ता है, जो विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण हैं क्योंकि वे सबसे शक्तिशाली राज्यों को भी अकेले कार्य करने में असमर्थ बना देती हैं।

यह पहली बार तब स्पष्ट हुआ जब युद्ध में तकनीकीकरण और विशेष रूप से परमाणु हथियारों का आविष्कार हुआ। इसके बाद, वित्तीय संकट, जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, अपराध, प्रवासन और विकास जैसी चुनौतियों ने इसे और भी मजबूत किया।

[सामूहिक दुविधा(Collective dilemma):- एक समस्या जो राज्यों की आपसी निर्भरता से उत्पन्न होती है, अर्थात् कोई भी समाधान केवल एक राज्य द्वारा कार्यवाही करने के बजाय अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता होती है।]


अंतरराष्ट्रीय अराजकता का सीमित अंत


फिर भी, ये प्रवृत्तियाँ अंतरराष्ट्रीय अराजकता(ntranational anarchy) की अवधारणा को पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं बना सकी हैं। यद्यपि अंतरराष्ट्रीय संगठन निस्संदेह विश्व मंच पर महत्वपूर्ण अभिनेता बन गए हैं और कभी-कभी राज्यों और अन्य गैर-राज्य अभिनेताओं के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं, उनका प्रभाव अतिरंजित नहीं किया जाना चाहिए।

इसके अलावा, ये संगठन, कुछ हद तक, अपने सदस्य राज्यों की उपज(creatures of their members) हैं वे केवल उतना ही कर सकते हैं जितना उनके सदस्य राज्य, और विशेष रूप से शक्तिशाली राज्य, उन्हें करने की अनुमति देते हैं।


महाशक्ति(Great Power):–

एक ऐसा राज्य है जिसे एक श्रेणीकृत राज्य-व्यवस्था में सबसे शक्तिशाली में से माना जाता है। महाशक्ति को परिभाषित करने वाले मानदंड विवादित हो सकते हैं, लेकिन चार सामान्य मानदंड होते हैं:–

(1) महाशक्तियाँ सैन्य क्षमता में पहले स्थान पर होती हैं, जिनके पास अपनी सुरक्षा बनाए रखने की क्षमता होती है और संभावित रूप से अन्य शक्तियों को प्रभावित करने की भी क्षमता होती है।


(2) ये आर्थिक रूप से शक्तिशाली राज्य होते हैं, हालांकि (जैसा कि जापान से दिखता है) यह महाशक्ति स्थिति के लिए एक आवश्यक लेकिन पर्याप्त शर्त नहीं है।


(3) इनके पास वैश्विक, न कि केवल क्षेत्रीय, हितों के दायरे होते हैं।


(4) ये एक 'आगे बढ़ने' वाली विदेश नीति अपनाते हैं और अंतरराष्ट्रीय मामलों पर वास्तविक, न कि केवल संभावित, प्रभाव डालते हैं (अपने पृथकतावादी चरण के दौरान, अमेरिका एक महाशक्ति नहीं था)।


आपसी निर्भरता(Interdependence):–


आपसी निर्भरता एक ऐसे संबंध को दर्शाती है जिसमें दो पक्षों में से प्रत्येक उस निर्णय से प्रभावित होता है जो दूसरे द्वारा लिया जाता है। आपसी निर्भरता आपसी प्रभाव और सामान्यत: दोनों पक्षों के बीच एक प्रकार की समानता का संकेत देती है, जो आमतौर पर आपसी संवेदनशीलता के कारण उत्पन्न होती है।

इस प्रकार, आपसी निर्भरता सामान्यत: विश्व मामलों में सहयोग और एकीकरण की प्रवृत्ति से जुड़ी होती है। कीओहाने/Keohane और Nye (1977) ने 'जटिल आपसी निर्भरता' का विचार प्रस्तुत किया, जो अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के यथार्थवादी मॉडल का विकल्प था। इसने यह स्पष्ट किया कि :–

(1) राज्य अब स्वायत्त अंतर्राष्ट्रीय अभिनेता नहीं रहे; 

(2) आर्थिक और अन्य मुद्दे विश्व मामलों में अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं; और 

(3) सैन्य शक्ति अब एक कम विश्वसनीय और कम महत्वपूर्ण नीति विकल्प बन गई है।




गैर-सरकारी संगठन/NON-GOVERNMENTAL ORGANIZATIONS (NGO):-

गैर-सरकारी संगठन (NGO) एक निजी, गैर-व्यावसायिक समूह या संस्था है जो अपने उद्देश्यों को अहिंसक तरीकों से प्राप्त करने का प्रयास करती है। विश्व बैंक  ने NGOs को "निजी संगठन जो कष्टों को कम करने, गरीबों के हितों को बढ़ावा देने, पर्यावरण की रक्षा करने, बुनियादी सामाजिक सेवाएं प्रदान करने या सामुदायिक विकास कार्यों को अंजाम देने का प्रयास करते हैं(NGOs as ‘private organizations that pursue activities to relieve suffering, promote the interests of the poor, protect the environment, provide basic social services, or undertake community development)" के रूप में परिभाषित किया है। 

ऐसे संगठनों के पहले उदाहरणों में 'द स्लेव ट्रेड के उन्मूलन के लिए सोसाइटी' (1787 में विलियम विल्बरफोर्स द्वारा स्थापित) और 'इंटरनेशनल कमिटी ऑफ द रेड क्रॉस' (1863 में स्थापित) शामिल हैं।

NGOs को आधिकारिक रूप से 1948 में संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा मान्यता प्राप्त हुई थी, जब 41 NGOs को परामर्शदाता स्थिति दी गई थी, जिसके बाद 'विश्व मानवाधिकार घोषणा' (Universal Declaration of Human Rights) की स्थापना की गई थी। 

कुछ NGO कार्यकर्ताओं का मानना है कि केवल उन समूहों को 'सच्चे' NGO के रूप में माना जाना चाहिए जिन्हें UN द्वारा औपचारिक रूप से मान्यता प्राप्त हो। 

एक अंतर आमतौर पर संचालनात्मक NGOs और वकालत करने वाले NGOs के बीच किया जाता है:-

  • संचालनात्मक NGOs(Operational NGOs) वे होती हैं जिनका मुख्य उद्देश्य विकास से संबंधित परियोजनाओं को डिज़ाइन और लागू करना होता है। वे राहत-उन्मुख या विकास-उन्मुख हो सकती हैं, और ये सामुदायिक-आधारित, राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय हो सकती हैं।

  • वकालत करने वाले NGOs(Advocacy NGOs) का उद्देश्य किसी विशेष कारण को बढ़ावा देना या बचाव करना होता है। इन्हें कभी-कभी प्रचारात्मक दबाव समूह या सार्वजनिक हित समूह कहा जाता है।


महत्व:- 1990 के दशक से, गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) की संख्या में निरंतर वृद्धि एक वास्तविक विस्फोट के रूप में देखी गई है। 2021 तक, 5,593 समूहों को संयुक्त राष्ट्र द्वारा परामर्शदाता दर्जा दिया गया था, और अनुमान है कि लगभग 50 बड़े (बहु-देशीय, बहु-अधिदेशीय) अंतरराष्ट्रीय NGO और वैश्विक स्तर पर लगभग 3,00,000 छोटे, अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण वाले NGO सक्रिय हैं। यदि राष्ट्रीय और स्थानीय NGOs को भी शामिल किया जाए, तो यह संख्या बहुत अधिक बढ़ जाती है।

उदाहरण के लिए 2021 तक, संयुक्त राज्य अमेरिका में लगभग 1.5 मिलियन NGOs होने का अनुमान है; 2017 में, रूस में 2,24,500 NGOs थे; और केन्या ने, एक विकासशील देश के रूप में, 2001 से 2019 के बीच 11,262 नए NGOs को पंजीकृत किया।

प्रमुख अंतरराष्ट्रीय NGOs विशाल संगठनों के रूप में विकसित हो चुके हैं। उदाहरण के लिए:-

केयर इंटरनेशनल, जो विश्व स्तर पर गरीबी को कम करने के लिए समर्पित है, $970 मिलियन से अधिक के बजट को नियंत्रित करता है।

ग्रीनपीस के 2.8 मिलियन सदस्य और 2,400 से अधिक कर्मचारी हैं।

एमनेस्टी इंटरनेशनल के पास संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विभाग की तुलना में अधिक संसाधन हैं।

ये आँकड़े NGOs की बढ़ती भूमिका और उनके वैश्विक प्रभाव को रेखांकित करते हैं।


यह कोई संदेह की बात नहीं है कि प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय NGOs और NGO क्षेत्र अब वैश्विक मंच पर महत्वपूर्ण अभिनेता बन गए हैं। हालांकि, वे TNCs (मल्टीनेशनल कंपनियों) द्वारा exert किए गए आर्थिक प्रभाव से रहित हैं, वकालत करने वाले NGOs ने 'मुलायम' शक्ति (soft power) और सार्वजनिक दबाव जुटाने में अत्यधिक कौशल दिखाया है। इस संदर्भ में, उनके पास कई फायदे हैं। इनमें यह शामिल हैं कि प्रमुख NGOs ने उच्च सार्वजनिक प्रोफाइल बनाई है, जो अक्सर सार्वजनिक प्रदर्शनों और विरोधों से जुड़ी होती हैं, जो मीडिया का ध्यान आकर्षित करती हैं; उनके सामान्यत: परोपकारी और मानवीय उद्देश्यों के कारण वे सार्वजनिक समर्थन जुटाने और नैतिक दबाव डालने में सक्षम होते हैं, जिस तरह पारंपरिक राजनेता और राजनीतिक पार्टियाँ संघर्ष करती हैं; और यह कि, कई मुद्दों पर, NGOs के विचारों को अधिकारिक और निष्कलंक माना जाता है, जो विशेषज्ञों और अकादमिकों के उपयोग पर आधारित होते हैं। संचालनात्मक NGOs, अपनी ओर से, अंतर्राष्ट्रीय सहायता का लगभग 15 प्रतिशत प्रदान करने लगी हैं, जो अक्सर सरकारी निकायों (राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय) की तुलना में तेजी से प्रतिक्रिया और संचालनात्मक प्रभावशीलता दिखाते हैं। राहत और विकास उन्मुख NGOs भी ऐसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में काम कर सकते हैं जहां राष्ट्रीय सरकारें, या यहां तक कि UN भी, अवांछनीय होंगी।

हालाँकि, NGOs का उत्थान महत्वपूर्ण राजनीतिक विवाद का कारण बना है। NGO के समर्थक यह तर्क करते हैं कि वे वैश्विक राजनीति में लाभकारी और समृद्धि लाते हैं। वे कॉर्पोरेट शक्ति का संतुलन करते हैं, TNCs के प्रभाव को चुनौती देते हैं; वे वैश्विक राजनीति को लोकतांत्रिक बनाते हैं, उन लोगों और समूहों के हितों को व्यक्त करके जो वैश्वीकरण प्रक्रिया द्वारा असक्षम कर दिए गए हैं; और वे एक नैतिक शक्ति के रूप में कार्य करते हैं, लोगों की नागरिक जिम्मेदारी की भावना को विस्तृत करते हैं और यहां तक कि वैश्विक नागरिकता को बढ़ावा देते हैं। इस संदर्भ में, वे उभरती वैश्विक नागरिक समाज (Global Civil Society) का एक महत्वपूर्ण घटक हैं। आलोचक, हालांकि, यह तर्क करते हैं कि NGOs स्व-निर्वाचित समूह होते हैं जिनके पास कोई वास्तविक लोकतांत्रिक प्रमाणपत्र नहीं होता है, जो अक्सर वरिष्ठ पेशेवरों के छोटे समूह के विचारों को व्यक्त करते हैं। उच्च मीडिया प्रोफ़ाइल प्राप्त करने और समर्थन एवं धन जुटाने के प्रयास में, NGOs पर अतिरंजित दावे करने का आरोप लगाया गया है, जिससे सार्वजनिक धारणाओं और नीति एजेंडे को विकृत किया गया है। अंत में, अपनी 'अंदरूनी' स्थिति को बनाए रखने के लिए, NGOs अक्सर अपने सिद्धांतों से समझौता करते हैं और 'मुख्यधारा में आ जाते हैं', इस प्रकार, प्रभावी रूप से समाजिक आंदोलनों का पतन हो जाता है।

हालांकि, आलोचक तर्क देते हैं कि NGOs वास्तव में स्व-नियुक्त 'दबाव' या 'हित' समूह(self-appointed 'pressure' or 'interest' groups) हैं, जिनकी लोकतांत्रिक साख सीमित है। NGOs पर निंदात्मक धन उगाहने(cynical fund-raising) और प्रचार अभियानों(campaigning tactics) के लिए भी आलोचना की गई है। साथ ही सामाजिक आंदोलनों की क्रांतिकारी धार को कुंद करने(radical edge of social movements) का आरोप भी लगाया गया है।

[Cynical fund-raising का अर्थ है धन जुटाने के ऐसे तरीके अपनाना जो नैतिकता या ईमानदारी के मानकों का पालन न करें। इसमें भावनात्मक शोषण, जरूरतमंदों की स्थिति को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना या झूठे दावे करना शामिल हो सकता है ताकि लोगों से अधिक दान लिया जा सके।]

[Radical edge of social movements (सामाजिक आंदोलनों की क्रांतिकारी धार) का अर्थ है उन आंदोलनों की अत्यधिक परिवर्तनकारी या विद्रोही दिशा, जो स्थापित सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्थाओं को चुनौती देते हैं। यह वह हिस्सा होता है जो मुख्यधारा की राजनीति या सामाजिक विचारधाराओं से हटकर, गहरे और व्यापक बदलाव की मांग करता है।]

हाल के कुछ घोटालों के बीच कई प्रमुख पश्चिमी अंतरराष्ट्रीय NGOs को विकासशील देशों में यौन शोषण और हिंसा में लिप्त पाया गया है और अपने घरेलू देशों में संस्थागत रूप से नस्लवादी, धमकाने वाले और अपमानजनक रोजगार प्रथाओं में शामिल होने के लिए भी आलोचना झेलनी पड़ी है। इन घटनाओं ने 2019 में सोशल मीडिया पर #CharitySoWhite हैशटैग अभियान को जन्म दिया


वैश्वीकरण(GLOBALIZATION):-

वैश्वीकरण आपस में जुड़े हुए एक जटिल जाल के उभरने को संदर्भित करता है, जिसका मतलब है कि हमारे जीवन पर तेजी से उन घटनाओं और फैसलों का प्रभाव पड़ता है जो हमसे बहुत दूर होती हैं। वैश्वीकरण की मुख्य विशेषता यह है कि भौगोलिक दूरी का महत्व कम होता जा रहा है और राष्ट्रीय राज्यों के बीच की भौतिक सीमाओं का महत्व घटता जा रहा है।

हालांकि, वैश्वीकरण का मतलब यह नहीं है कि 'स्थानीय' और 'राष्ट्रीय' को 'वैश्विक' के अधीन कर दिया गया है। इसके बजाय, यह राजनीतिक प्रक्रिया की गहराई और विस्तार दोनों को रेखांकित करता है, इस अर्थ में कि स्थानीय, राष्ट्रीय और वैश्विक घटनाएं ( शायद स्थानीय, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और वैश्विक घटनाएं) लगातार परस्पर क्रिया करती रहती हैं।


वैश्वीकरण की परिभाषाएँ:-


• "वैश्वीकरण दुनिया भर में सामाजिक संबंधों की तीव्रता को संदर्भित करता है, जो दूरस्थ स्थानों को इस प्रकार जोड़ता है कि स्थानीय घटनाएं दूर स्थानों पर हो रही घटनाओं से प्रभावित होती हैं और इसके विपरीत।" (गिडेंस/Giddens, 1990)


• "व्यापार, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, अल्पकालिक पूंजी प्रवाह, श्रमिकों और मानवता के अंतरराष्ट्रीय प्रवाह, और प्रौद्योगिकी के प्रवाह के माध्यम से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं का अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में एकीकरण।" (भगवती/Bhagwati, 2004)




• "वे प्रक्रियाएँ जिनके माध्यम से संप्रभु राष्ट्रीय राज्य विभिन्न शक्ति संभावनाओं, उन्मुखताओं, पहचानों और नेटवर्क के साथ अंतरराष्ट्रीय कर्ताओं द्वारा बाधित और कमज़ोर किए जाते हैं।" (बेक/Beck, 2000)



• "एक प्रक्रिया (या प्रक्रियाओं का समूह) जो सामाजिक संबंधों और लेनदेन के स्थानिक संगठन के रूपांतरण को समाहित करता है।" (हेल्ड एट अल./Held et al., 1999)




• "सामाजिक भूगोल का पुनर्संयोजन, जो लोगों के बीच अंतरग्रहीय और अतिभौगोलिक कनेक्शन की वृद्धि से चिह्नित होता है।" (शॉल्टे/Scholte, 2005)




वैश्वीकरण दृष्टिकोण:-


यथार्थवादी दृष्टिकोण(Realist view)


यथार्थवादियों ने वैश्वीकरण के प्रति आमतौर पर संदेहपूर्ण रुख अपनाया है, वे इसे एक दूसरे से जुड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्था/global economy के निर्माण के बजाय आर्थिक अंतरनिर्भरता/economic interdependence (यानी ‘एक जैसी चीजें’) को बढ़ाने के संदर्भ में देखते हैं, न कि एक आपस में जुड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्था के निर्माण के रूप में। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्य दुनिया की राजनीति में प्रमुख इकाई के रूप में बना हुआ है। वैश्वीकरण से खतरा होने के बजाय, विनियमन और निगरानी(regulation and surveillance) के लिए राज्य की क्षमता में कमी के बजाय वृद्धि हुई है। हालांकि, यथार्थवादी केवल वैश्वीकरण का इनकार करने वाले नहीं हैं। वैश्वीकरण की प्रकृति और महत्व का आकलन करते हुए, वे इस बात पर जोर देते हैं कि वैश्वीकरण और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था(international system) अलग-अलग नहीं हैं, और न ही ये प्रतिद्वंद्वी संरचनाएँ हैं। बल्कि, पूर्व को उत्तरार्द्ध की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। वैश्वीकरण को राज्यों ने, राज्यों के लिए, विशेष रूप से प्रभुत्वशाली राज्यों द्वारा किया गया है। जैसे कि खुला व्यापारिक प्रणाली, वैश्विक वित्तीय बाजार और अंतरराष्ट्रीय उत्पादन की शुरुआत, ये सभी पश्चिमी देशों के हितों को बढ़ावा देने के लिए स्थापित किए गए थे, विशेष रूप से अमेरिका के हेतों को बढ़ाने के लिए। इसके अलावा, यथार्थवादी इस धारणा पर सवाल उठाते हैं कि वैश्वीकरण शांति और सहयोग की ओर एक बदलाव के साथ जुड़ा हुआ है। इसके बजाय, बढ़ी हुई आर्थिक आपसी निर्भरता 'आपसी असुरक्षा(mutual vulnerability’)' को जन्म दे सकती है, जो सहयोग के बजाय संघर्ष(conflict rather than cooperation) का कारण बन सकती है।


उदारवादी दृष्टिकोण(Liberal view):-


उदारवादी हमेशा वैश्वीकरण के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हैं। आर्थिक उदारवादियों के लिए, वैश्वीकरण बाजार की 'अविवेकपूर्ण' राष्ट्रीय निष्ठाओं और 'मनमानी' राज्य सीमाओं पर विजय का प्रतीक है। बाजार का चमत्कार यह है कि यह संसाधनों को उनके सबसे लाभकारी उपयोग की ओर आकर्षित करता है, जिससे व्यक्तियों, परिवारों, कंपनियों और समाजों को समृद्धि मिलती है। आर्थिक वैश्वीकरण का आकर्षण इसलिए है कि यह बाजारों को वैश्विक स्तर पर काम करने की अनुमति देता है, जो मुक्त व्यापार और बढ़ती आपसी निर्भरता की 'उथली' एकीकरण को एक एकल वैश्विक अर्थव्यवस्था के 'गहरे' एकीकरण से बदलता है। इससे जो बढ़ी हुई उत्पादकता और तेज़ प्रतिस्पर्धा उत्पन्न होती है, वह उन सभी समाजों को लाभ पहुँचाती है जो इसमें भाग लेते हैं, यह दर्शाता है कि आर्थिक वैश्वीकरण एक सकारात्मक-योग खेल(positive-sum game) है, जिसमें सभी खिलाड़ी विजेता होते हैं।


उदारवादी यह भी मानते हैं कि वैश्वीकरण सामाजिक और राजनीतिक लाभ(social and political benefits) भी लाता है। दुनिया भर में सूचनाओं और विचारों का स्वतंत्र प्रवाह न केवल व्यक्तिगत आत्मविकास के अवसरों को बढ़ाता है, बल्कि अधिक गतिशील और सक्रिय समाजों का निर्माण करता है। इसके अलावा, उदारवादी दृष्टिकोण से, बाजार पूंजीवाद(market capitalism) का प्रसार हमेशा उदार लोकतंत्र(liberal democracy) की प्रगति से जुड़ा होता है, जहां आर्थिक स्वतंत्रता राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग को जन्म देती है(economic freedom breeding a demand for political freedom)। उदारवादियों के लिए, वैश्वीकरण विश्व इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ का संकेत है, क्योंकि यह उस अवधि को समाप्त करता है जब राष्ट्र-राज्य वैश्विक अभिनेता था, और विश्व व्यवस्था का निर्धारण एक (स्वाभाविक रूप से अस्थिर) शक्ति संतुलन द्वारा किया जाता था। इसके विपरीत, वैश्विक युग शांति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की प्रवृत्ति के साथ-साथ वैश्विक शक्ति के प्रसार की विशेषता है, विशेष रूप से वैश्विक नागरिक समाज के उदय और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के बढ़ते महत्व के माध्यम से।


समीक्षात्मक दृष्टिकोण(Critical views):-


समीक्षात्मक सिद्धांतकारों ने वैश्वीकरण के प्रति नकारात्मक या विरोधात्मक दृष्टिकोण(negative or oppositional stance) अपनाया है। अक्सर एक स्थापित समाजवादी या विशेष रूप से मार्क्सवादी पूंजीवाद की आलोचना पर आधारित, यह वैश्वीकरण के सार को एक वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था(global capitalist order) की स्थापना के रूप में प्रस्तुत करता है। Marx को कहा जा सकता है कि उन्होंने 'हाइपरग्लोबलिस्ट(hyperglobalist)' साहित्य की पूर्वधारणा की थी,  क्योंकि उन्होंने पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के स्वाभाविक रूप से अंतरराष्ट्रीय चरित्र को उजागर किया था। उदारवादियों की तरह, समीक्षात्मक सिद्धांतकार आम तौर पर स्वीकार करते हैं कि वैश्वीकरण ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है, खासकर राज्यों और बाजारों के बीच संबंध में। राज्यों ने अर्थव्यवस्था पर अपनी शक्ति खो दी है, और अब उन्हें वैश्विक पूंजीवाद के हितों में राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं के पुनर्गठन के उपकरण के रूप में घटित किया गया है। इस प्रकार, वैश्वीकरण को एक असमान, पदानुक्रमिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है, जिसे संपन्न और गरीब देशों के बीच बढ़ती ध्रुवीकरण द्वारा विशेषता प्राप्त होती है, जिसे विश्व-व्यवस्था सिद्धांतकारों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में 'कोर' और 'पेरिफेरल' क्षेत्रों के बीच संरचनात्मक असंतुलन के रूप में व्याख्यायित किया है, और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व और जनता की प्रतिक्रियाशीलता में कमी, जो बढ़ती हुई कॉर्पोरेट शक्ति के कारण होती है। नारीवादी विश्लेषकों ने कभी-कभी वैश्वीकरण को बढ़ती लिंग असमानताओं से जोड़ा है उदाहरण के लिए विकासशील देशों में छोटे पैमाने पर कृषि के विघटन से, जो अधिकांशतः महिलाओं द्वारा की जाती है और उन्हें अपने परिवारों का समर्थन करने के लिए विदेशों में काम करने के लिए बढ़ते दबाव का सामना करना पड़ता है, जिससे 'प्रवासन का नारीकरण(feminization of migration)' होता है। उपनिवेशवाद विरोधी सिद्धांतकारों ने अपनी ओर से सांस्कृतिक वैश्वीकरण पर विशेष आपत्ति जताई है, जिसे पश्चिमी साम्राज्यवाद के रूप में व्याख्यायित किया गया है, जो स्वदेशी संस्कृतियों और जीवनशैली को नष्ट करता है और आत्महीन उपभोक्तावाद के प्रसार की ओर ले जाता है।


वैश्वीकरण और उसके निहितार्थ(Globalization and its implications)


दुनिया की राजनीति की पारंपरिक राज्य-केंद्रित छवि(state-centric image) को जितना चुनौती वैश्वीकरण के उभरने ने दी है, उतनी किसी अन्य विकास ने नहीं। वास्तव में, वैश्वीकरण को हमारे समय का एक चर्चित शब्द माना जा सकता है। राजनेताओं के बीच, उदाहरण के लिए, यह आम धारणा है कि इक्कीसवीं सदी 'वैश्विक सदी' होगी। 

लेकिन 'वैश्वीकरण' वास्तव में है क्या? 

क्या यह वास्तव में हो रहा है, और यदि हां, तो इसके प्रभाव क्या हैं?


वैश्वीकरण को समझना


वैश्वीकरण एक जटिल(complex), अस्पष्ट(elusive) और विवादास्पद(controversial) शब्द है। इसका उपयोग प्रक्रिया(process), नीति(policy), विपणन रणनीति(marketing strategy), संकट(predicament) या यहां तक कि एक विचारधारा(ideology) के रूप में किया गया है। कुछ विद्वानों ने वैश्वीकरण की प्रकृति(nature of globalization) पर बहस को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। 

वैश्वीकरण को एक प्रक्रिया या प्रक्रियाओं के सेट के रूप में अलग करते हुए जो परिवर्तन या बदलाव की गतिशीलता को उजागर करता है। जैसे कि अन्य शब्द जो प्रत्यय '-ization' से समाप्त होते हैं, जैसे modernization/आधुनिकीकरण और वैश्विकता (globality) को एक स्थिति के रूप में (जिससे वैश्वीकरण/globalization द्वारा लाई गई परिस्थितियों का संकेत मिलता है, जैसे आधुनिकीकरण ने आधुनिकता की स्थिति बनाई(Steger 2003)


दूसरों ने वैश्वाद (globalism) शब्द का उपयोग वैश्वीकरण की विचारधारा, सिद्धांतों, मूल्यों और धारणाओं को संदर्भित करने के लिए किया है, जिसने इस प्रक्रिया का मार्गदर्शन या इसे संचालित किया है(Ralston Saul 2005)।


वैश्वीकरण की समस्या यह है कि यह उतना एक 'यह' नहीं है जितना कि 'वे', जिसका अर्थ है कि यह एकल प्रक्रिया(यानी यह) नहीं है बल्कि कई प्रक्रियाओं(यानी वे) का एक जटिल समूह है, जो कभी-कभी ओवरलैप करते हैं और एक-दूसरे से जुड़े होते है। लेकिन कभी-कभी विरोधाभासी और विपरीत भी होते हैं। इसलिए वैश्वीकरण को एक ही विषय में सीमित करना मुश्किल है।


फिर भी, वैश्वीकरण या वैश्विकता से जुड़े विभिन्न विकास और अभिव्यक्तियां परस्पर जुड़ाव (interconnectedness) की मूलभूत घटना से जुड़ी हैं। वैश्वीकरण, चाहे इसका रूप या प्रभाव कुछ भी हो, उन लोगों, समुदायों, संस्थानों और समाजों के बीच संबंध बनाता है जो पहले असंबद्ध थे। 

Held और McGrew (1999) ने वैश्वीकरण को 'विश्वव्यापी परस्पर जुड़ाव के विस्तार, तीव्रता, तेज़ी और बढ़ते प्रभाव(the widening, intensifying, speeding up, and growing impact)' के रूप में परिभाषित किया।




वैश्वीकरण के आयाम



वैश्वीकरण द्वारा उत्पन्न परस्पर जुड़ाव बहुआयामी है और विशिष्ट आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से कार्य करता है। दूसरे शब्दों में, वैश्वीकरण के कई आयाम या 'चेहरे' हैं। हालांकि वैश्वीकरण सिद्धांतकारों ने इसके विशिष्ट व्याख्याओं का समर्थन किया है, लेकिन ये आपस में अनन्य नहीं हैं। इसके बजाय, वे एक जटिल और बहुआयामी घटना के विभिन्न पहलुओं को दर्शाते हैं। वैश्वीकरण को मुख्य रूप से तीन तरीकों से समझाया गया है:


1. आर्थिक वैश्वीकरण(Economic globalization):-

यह वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाएं, कम या ज्यादा, एक एकल वैश्विक अर्थव्यवस्था में समाहित हो गई हैं।




2. सांस्कृतिक वैश्वीकरण(Cultural globalization):-

यह वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से जानकारी, वस्तुएं और छवियां, जो दुनिया के एक हिस्से में उत्पन्न हुई हैं, एक वैश्विक प्रवाह में प्रवेश करती हैं, जो राष्ट्रों, क्षेत्रों और व्यक्तियों के बीच सांस्कृतिक अंतरों को 'समतल' करती है।




3. राजनीतिक वैश्वीकरणPolitical globalization:-

यह वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से नीति-निर्माण की जिम्मेदारियां राष्ट्रीय सरकारों से अंतरराष्ट्रीय संगठनों को स्थानांतरित कर दी गई हैं।




वैश्वीकरण को समझने में कठिनाई यह है कि यह किसी एक प्रक्रिया का नाम नहीं है, बल्कि प्रक्रियाओं के एक जटिल समूह का नाम है, जो कभी-कभी आपस में जुड़े हुए होते हैं और कभी-कभी विरोधाभासी। इसके बावजूद, वैश्वीकरण या वैश्विकता से जुड़े विभिन्न विकास और अभिव्यक्तियां अंततः आपस में जुड़ेपन के अंतर्निहित सिद्धांत से उत्पन्न होती हैं। वैश्वीकरण, चाहे उसका रूप या प्रभाव कुछ भी हो, उन लोगों, समुदायों, संस्थानों और समाजों के बीच संबंध स्थापित करता है जो पहले अप्रभावित थे। हेल्ड और मैक्ग्रू (1999) ने वैश्वीकरण को 'दुनियाभर में जुड़ेपन के विस्तार, तीव्रता, गति और बढ़ते प्रभाव' के रूप में परिभाषित किया।


अंतरराष्ट्रीय समाज (International Society):-

'अंतरराष्ट्रीय समाज' शब्द यह दर्शाता है कि राज्यों के बीच और उनके साथ संबंध उन मानदंडों(norms) और नियमों(rules) की उपस्थिति से निर्धारित होते हैं, जो बातचीत के नियमित स्वरूपों को स्थापित करते हैं और 'समाज' की विशेषता को दर्शाते हैं। यह दृष्टिकोण यथार्थवादी दृष्टिकोण द्वारा शक्ति की राजनीति(power politics) और अंतरराष्ट्रीय अराजकता(international anarchy) पर दिए गए जोर को संशोधित करता है, और 'राज्यों की प्रणाली(system of states)' के बजाय 'राज्यों के समाज(society of states)' की उपस्थिति का सुझाव देता है। यह इंगित करता है कि अंतरराष्ट्रीय संबंध नियम-आधारित(rule based international relations) हैं क्योंकि ये नियम अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बनाए रखने में सहायता करते हैं।



जो प्रमुख संस्थाएं सांस्कृतिक एकता(cultural cohesion) और सामाजिक एकीकरण(social integration) उत्पन्न करती हैं। जैसे अंतरराष्ट्रीय कानून, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की गतिविधियां। फिर भी, सामाजिक एकीकरण की सीमा काफी हद तक राज्यों के बीच और उनके बीच सांस्कृतिक और वैचारिक समानता की सीमा पर निर्भर कर सकती है।


वैश्वीकरण: मिथक या वास्तविकता(Globalization: myth or reality)?


क्या वैश्वीकरण वास्तव में हो रहा है? हालांकि वैश्वीकरण हमारे समय का एक चर्चित विषय बन गया है, इसके प्रभाव और महत्व पर तीव्र बहस हुई है। लगभग 1990 के दशक के मध्य में, जब शिक्षाविदों और अन्य सामाजिक टिप्पणीकारों ने यह मान लिया था कि वैश्वीकरण 'सब कुछ बदल रहा है', तो 2000 के दशक की शुरुआत में 'वैश्वीकरण के अंत(end of globalization)' या 'वैश्विकतावाद की मृत्यु(death of globalism)' की बातें प्रचलित हो गईं (Bisley 2007)। 


इस वैश्वीकरण बहस में विभिन्न दृष्टिकोणों को प्रस्तुत करने का सबसे प्रभावशाली प्रयास Held etal (1999) द्वारा किया गया। उन्होंने तीन दृष्टिकोणों को अलग किया:-

1. हाइपरवैश्वीकरणवादी दृष्टिकोण(The hyperglobalists)

2. संशयवादी दृष्टिकोण(The sceptics)

3. परिवर्तनीवादी दृष्टिकोण(The transformationalists)


हाइपरवैश्वीकरणवादी दृष्टिकोण:-

हाइपरवैश्वीकरणवादी वैश्वीकरण को एक क्रांतिकारी बदलाव के रूप में देखते हैं।

हाइपरवैश्वीकरणवादी वैश्वीकरण के सबसे बड़े 'विश्वासियों' में से हैं।

यह दृष्टिकोण कि नई, वैश्वीकृत आर्थिक और सांस्कृतिक संरचनाएं अनिवार्य हो गईं जब तकनीक, जैसे कंप्यूटरीकृत वित्तीय व्यापार, सैटेलाइट संचार, मोबाइल फोन और इंटरनेट, व्यापक रूप से उपलब्ध हो गए।

हाइपरवैश्वीकरणवाद वैश्वीकरण को एक गहन, यहां तक कि क्रांतिकारी आर्थिक, सांस्कृतिक, तकनीकी और राजनीतिक परिवर्तनों के समूह के रूप में प्रस्तुत करता है, जो 1980 के दशक से तेज हुए हैं। इस दृष्टिकोण में डिजिटल क्रांति, एकीकृत वैश्विक वित्तीय प्रणाली की शुरुआत और वैश्विक वस्तुओं की उपलब्धता जैसे विकासों पर विशेष जोर दिया गया है।


हाइपरवैश्वीकरणवाद अक्सर तकनीकी निर्धारणवाद (technological determinism) पर आधारित होता है, जो यह सुझाव देता है कि एक एकल वैश्विक अर्थव्यवस्था बनाने वाले बल अपरिहार्य हो गए, जब वह तकनीक उपलब्ध हो गई जिसने इसके अस्तित्व को सक्षम बनाया। इसका मुख्य प्रतीक 'सीमाहीन दुनिया' (borderless world) की अवधारणा है, जो यह सुझाव देता है कि राष्ट्रीय सीमाएं और राज्यों की प्रासंगिकता एक ऐसे वैश्विक आदेश में समाप्त हो गई है, जो तेजी से अंतरराष्ट्रीय ताकतों द्वारा संचालित है।


फिर भी, अत्यधिक वैश्वीकरण (हाइपरग्लोबलिज़्म) वैश्वीकरण का एक असंतुलित और अतिरंजित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, कम से कम दो अर्थों में।


पहला, यह इस हद तक बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है कि नीति-निर्माता 'अवश्यम्भावी' आर्थिक और तकनीकी शक्तियों के अधीन हो गए हैं, जबकि मूल्यों, धारणाओं और वैचारिक दृष्टिकोणों के महत्व को कम करके आँकता है।


दूसरा, 'संप्रभुता का अंत' और 'राष्ट्र-राज्य के अस्त होने' की छवियाँ वैश्वीकरण से जुड़ी मिथकों (जिन्हें कभी-कभी 'ग्लोबलोनी' कहा जाता है) में शामिल मानी जा सकती हैं।

हालाँकि राज्य अब अधिकतर उत्तर-सम्प्रभु परिस्थितियों में कार्य कर रहे हैं, जहाँ पारस्परिक निर्भरता और पारगम्यता का माहौल है, उनकी भूमिका और महत्व समाप्त नहीं हुए हैं बल्कि बदल गए हैं।

उदाहरण के लिए, राज्य अब 'उद्यमशील' (entrepreneurial) हो गए हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता सुधारने के लिए रणनीतियाँ विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं, विशेष रूप से शिक्षा, प्रशिक्षण और रोजगार से संबंधित कौशल को बढ़ावा देकर।

वे अधिक इच्छुक हो गए हैं कि अपनी संप्रभुता साझा (pool sovereignty) करें और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, जैसे क्षेत्रीय व्यापार गुटों और डब्ल्यूटीओ (WTO), के माध्यम से काम करें।


अंततः, वैश्विक आतंकवाद और प्रवासन के पैटर्न को लेकर बढ़ती चिंताओं ने राज्य की महत्वता को फिर से रेखांकित किया है, खासकर घरेलू सुरक्षा सुनिश्चित करने और राष्ट्रीय सीमाओं की रक्षा करने में।


संशयवादी दृष्टिकोण:-

संशयवादी वैश्वीकरण को एक कल्पना मानते हैं और इसे खारिज करते हैं।

इसके विपरीत, संशयवादियों ने वैश्वीकरण को एक कल्पना बताया और एकीकृत वैश्विक अर्थव्यवस्था के विचार को खारिज कर दिया। वे बताते हैं कि अधिकांश आर्थिक गतिविधियां अभी भी राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर होती हैं, और अंतरराष्ट्रीय व्यापार और सीमा-पार पूंजी प्रवाह का उच्च स्तर कोई नई बात नहीं है (Hirst और Thompson 1999)।


संशयवादियों का यह भी तर्क है कि वैश्वीकरण को एक वैचारिक उपकरण के रूप में उपयोग किया गया है, जिससे बाजार-उन्मुख आर्थिक(market-orientated economic) एजेंडे को आगे बढ़ाने का प्रयास किया गया।

वैश्वीकरण सिद्धांत के इस संदर्भ में दो प्रमुख लाभ हैं।

पहला, यह कुछ प्रवृत्तियों (जैसे, अधिक लचीलेपन की ओर बदलाव, कमजोर ट्रेड यूनियन, सार्वजनिक खर्चों, विशेष रूप से कल्याणकारी बजट पर नियंत्रण, और व्यावसायिक नियमन में कटौती) को अवश्यम्भावी और इसलिए अजेय (irresistible) के रूप में प्रस्तुत करता है।

दूसरा, यह सुझाव देता है कि ऐसे बदलाव एक अमानवीय प्रक्रिया (impersonal process) का हिस्सा हैं, और किसी विशिष्ट एजेंट, जैसे बड़े व्यवसाय, से जुड़े हुए नहीं हैं, जिनके हितों को वैश्वीकरण की प्रवृत्तियों से लाभ होता दिख सकता है।

हालाँकि, इस प्रकार का संशयवाद (scepticism) प्रारंभिक वैश्वीकरण सिद्धांतकारों के अत्यधिक उत्साह को नियंत्रित करने में सहायक रहा है, लेकिन "जैसे पहले था वैसा ही व्यापार" (business as normal) के विचार को बनाए रखना कठिन है।

वास्तव में, वस्तुएँ, पूँजी, जानकारी, और लोग अब पहले की तुलना में अधिक स्वतंत्र रूप से दुनिया भर में घूमते हैं, और इसका आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन पर अनिवार्य प्रभाव पड़ता है।


परिवर्तनवादी दृष्टिकोण:-

यह दृष्टिकोण वैश्वीकरण को एक मध्यम मार्ग के रूप में देखता है। यह मानता है कि कई चीजें बदली हैं, लेकिन सब कुछ नहीं।

हाइपरग्लोबलाइज़र्स और संशयवादियों के बीच, 'परिवर्तनवादी' दृष्टिकोण वैश्वीकरण का एक मध्य मार्ग प्रस्तुत करता है। यह स्वीकार करता है कि विश्व राजनीति के स्वरूपों और प्रक्रियाओं में गहरे बदलाव हुए हैं, लेकिन इसके स्थापित या पारंपरिक पहलुओं को पूरी तरह समाप्त नहीं किया गया है। संक्षेप में, बहुत कुछ बदल गया है, लेकिन सब कुछ नहीं। यह वैश्वीकरण के बारे में सबसे व्यापक रूप से स्वीकार किया जाने वाला दृष्टिकोण बन गया है, क्योंकि यह न तो प्रक्रिया को अतिरंजित करने के प्रलोभन में आता है और न ही इसे खारिज करता है।


हालांकि, विश्व राजनीति में बड़े बदलाव हुए हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं:-


परस्पर जुड़ाव की व्यापकता (breadth of interconnectedness):

यह न केवल सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को राष्ट्रीय सीमाओं के पार, बल्कि संभावित रूप से पूरे विश्व में फैलाने में सक्षम है। पहले कभी वैश्वीकरण ने एकल विश्वव्यापी प्रणाली बनने की ऐसी संभावना नहीं दिखाई।


परस्पर जुड़ाव की तीव्रता (intensity of interconnectedness):

यह सीमा-पार या यहां तक कि विश्व-स्तरीय गतिविधियों की बढ़ती मात्रा के साथ बढ़ी है, जो प्रवासन में वृद्धि और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के विकास से लेकर हॉलीवुड फिल्मों या अमेरिकी टेलीविजन कार्यक्रमों की अधिक सुलभता तक फैली हुई हैं।


परस्पर जुड़ाव की गति (speed of interconnectedness):

यह विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक धन के विशाल प्रवाह के माध्यम से तेज हो गई है, जो दुनिया भर में एक कंप्यूटर स्विच के क्लिक पर स्थानांतरित हो जाती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि मुद्रा और अन्य वित्तीय बाजार दुनिया के अन्य हिस्सों में आर्थिक घटनाओं पर लगभग तुरंत प्रतिक्रिया दें।


निष्कर्ष के तौर पर कहें तो परिवर्तनवादी दृष्टिकोण सबसे व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है, क्योंकि यह प्रक्रिया को न तो अधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करता है और न ही इसे खारिज करता है।


वैश्वीकरण विरोधी राजनीति(ANTI-GLOBALIZATION POLITICS):-

वैश्वीकरण को न केवल बौद्धिक आलोचनाओं(intellectual critiques) का सामना करना पड़ा है जो इसे अस्वीकृत करने या इसे जिस रूप में हम समझते हैं वैसा न मानने की बात करते हैं बल्कि इसके विरोध में कई वैश्विक राजनीतिक आंदोलनों और अभिनेताओं द्वारा व्यावहारिक रूप से भी विरोध किया गया है जो इसके नकारात्मक प्रभावों(ill-effects) के प्रति आशंकित हैं। इस एंटी-ग्लोबलाइजेशन राजनीति में दो व्यापक प्रवृत्तियाँ रही हैं। 

पहली प्रवृत्ति मुख्य रूप से ट्रांसनेशनल राजनीतिक वामपंथ(transnational political left) से जुड़ी है। कार्यकर्ता, राजनेता और NGOs यह तर्क करते हैं कि वैश्वीकरण वास्तव में कामकाजी वर्ग और हाशिये पर रहने वाले लोगों और पर्यावरण पर होने वाले शोषण और हिंसा को और अधिक तीव्र कर रहा है। 

दूसरी प्रवृत्ति एक व्यापक रूप से दायें पंथ(right-wing) से जुड़ी है जिसे विडंबना से 'ट्रांसनेशनल राष्ट्रवादी(transnational nationalist)' आंदोलन के रूप में वर्णित किया जा सकता है। यह दायाँ पंथी आंदोलन वैश्वीकरण द्वारा सक्षम किए गए आप्रवासन और नस्लीय मिश्रण का विरोध(opposes the immigration and racial mixing enabled by globalization) करता है और इस बात का अफसोस करता है कि वह विशेष सामाजिक समूह, जिन्हें यह 'राष्ट्र' से पहचानता है आर्थिक वैश्वीकरण के कारण नुकसान में हैं या पीछे छूट गए हैं।


वामपंथी एंटी-ग्लोबलाइजेशन(Left-Wing Anti-globalization):-


वामपंथी एंटी-ग्लोबलाइजेशन राजनीति की पहली लहर सहस्त्राब्दी के मोड़ पर 'वैश्विक शासन' के संस्थानों के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शनों के इर्द-गिर्द संगठित हुई। 1990 के दशक के मध्य में मेक्सिको में ज़ापातिस्टा विद्रोह (Zapatista uprising in Mexico) के कारण उत्पन्न हुआ। यह ट्रांसनेशनल सामाजिक आंदोलन आंशिक रूप से इंटरनेट के उदय से संभव हुआ जिसने कार्यकर्ता संगठनों के लिए नए चैनल प्रदान किए और प्रत्यक्ष क्रिया, विरोध के आयोजन और प्रचार की योजना बनाने का अवसर दिया। 

प्रमुख प्रदर्शनों में 1999 में 'सिएटल की लड़ाई(Battle of Seattle)' में विश्व व्यापार संगठन (WTO) के खिलाफ और 2001 में जिनोआ में 'G8' प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की बैठक के खिलाफ प्रदर्शन शामिल थे। इन प्रदर्शनों में विश्वभर से सैकड़ों हजारों विरोध करने वाले लोग शामिल हुए जो पारिस्थितिकी संरक्षण से लेकर पूंजीवाद को एक अधिक मानवीय आर्थिक प्रणाली से बदलने तक के मुद्दों पर अभियान चला रहे थे। इस आंदोलन को विश्व सामाजिक मंच (WSF) से जोड़ा गया जो विश्व आर्थिक मंच (WEF) का एक विकल्प था। जिसे वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक अभिजात वर्ग को हर साल स्विट्ज़रलैंड के दावोस(Davos, Switzerland) में एकत्र कर वैश्विक अर्थव्यवस्था के भविष्य पर चर्चा करने वाली एक प्रमुख वैश्विक शासन संस्था के रूप में देखा जाता था। 

WSF इसके बजाय 2001 से 'वैश्विक दक्षिण(Global South)' में हर साल मिलता है। प्रारंभ में ब्राज़ील के पोर्टो एलेग्रे में कार्यकर्ताओं को एकत्र करता है जो श्रमिकों, हाशिए पर रहने वाले, अल्पसंख्यक समूहों, स्वदेशी लोग और प्राकृतिक पर्यावरण के लिए 'वैश्विक सामाजिक न्याय' प्राप्त करने के लिए चिंतित हैं। जैसे-जैसे यह आंदोलन 2000 और 2010 के दशकों में विकसित हुआ, यह 'alter-globalizations' से अधिक जुड़ा और यह मानने लगा कि वैश्वीकरण शायद अपरिहार्य हो सकता है और यह अच्छाई के लिए एक शक्ति हो सकता है। लेकिन यह रेखांकित करते हुए कि अमेरिकी नेतृत्व वाला, कॉर्पोरेट, सांस्कृतिक रूप से समान्यकरण करने वाला और हिंसक सैन्यवादी वैश्वीकरण का मॉडल जो अलोकतांत्रिक और जवाबदेह से बाहर रहने वाले अभिजात वर्ग और उनके वैश्विक शासन संस्थानों से जुड़ा है वह 'गलत' प्रकार का वैश्वीकरण है। 

यह वामपंथी एंटी-ग्लोबलाइजेशन आंदोलन व्यापक रूप से एक अधिक खुला वैश्विक आप्रवासन व्यवस्था(immigration regime), राष्ट्रीय सीमाओं को पूरी तरह से समाप्त करने, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय गिरावट को धीमा करने या पलटने के लिए अधिक वैश्विक सहयोग, वैश्विक क्रॉस-नस्लीय और श्रमिक वर्ग की एकजुटताओं का समर्थन करता है। 

2008 के वैश्विक वित्तीय संकट की शुरुआत के बाद, एक श्रृंखला संबंधित वैश्विक आंदोलनों और प्रदर्शनों का उदय हुआ जो संकट की लागत को ' संकुचन नीतियों(austerity policies)' का विरोध कर रहे थे। यह संवेदनशील जनसंख्याओं पर लक्षित था, जो अक्सर वामपंथी एंटी/अल्टर-ग्लोबलाइजेशन(anti/alter- globalization movement) आंदोलन के साथ मेल खाते थे। इनमें स्पेन में एंटी-संकोचन इंदिग्नाडोस आंदोलन(anti-austerity Indignados movement)2011, न्यूयॉर्क में  'ऑक्युपाई आंदोलनों(Occupy movements)' की शुरुआत, और ग्रीस में वामपंथी एंटी-संकोचन पार्टियाँ जैसे कि सिरिज़ा पार्टी/Syriza party(2015 में सरकार में चुनी गई ) का उदय शामिल है। 2015 और 2020 के बीच वामपंथी दिग्गज जो एंटी/अल्टर-ग्लोबलाइजेशन और एंटी-संकोचन आंदोलनों से जुड़े थे (जैसे अमेरिकी सीनेटर बर्नी सैंडर्स और ब्रिटिश सांसद जेरेमी )  संबंधित राष्ट्रीय विधानसभाओं में मुख्यधारा के राजनीतिक नेता बन गए। हालांकि दोनों अंततः सरकार में चुने जाने की अपनी आकांक्षाओं में असफल रहे।


Note:- सिरिज़ा (Syriza) ग्रीस की एक वामपंथी राजनीतिक पार्टी है जिसका पूरा नाम "Coalition of the Radical Left" (उग्र वामपंथ का गठबंधन) है। यह पार्टी 2004 में गठित हुई थी। यह 2010 के दशक में यूरोप में लागू की गई कठोर 'ऑस्टेरिटी' (कठोरता) नीतियों का विरोध करने के लिए प्रसिद्ध हुई। 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद ग्रीस को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। यूरोपीय संघ और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा दिए गए बेलआउट पैकेज की शर्तों के तहत ग्रीस सरकार को कठोर आर्थिक सुधार और खर्च में कटौती लागू करनी पड़ी। इन नीतियों के कारण ग्रीस की जनता पर भारी आर्थिक बोझ पड़ा जिससे नाराजगी बढ़ी। 2015 में सिरिज़ा ने चुनावों में बड़ी जीत हासिल की और अलेक्सिस सिप्रास (Alexis Tsipras) ग्रीस के प्रधानमंत्री बने। सिरिज़ा ने यूरोपीय संघ के साथ बेहतर शर्तों पर बेलआउट समझौते की वकालत की और ऑस्टेरिटी नीतियों का विरोध किया। हालांकि बाद में पार्टी को कुछ नीतियों पर समझौता करना पड़ा जिससे उसकी लोकप्रियता में गिरावट आई। सिरिज़ा उन आंदोलनों और पार्टियों का हिस्सा रही है जो 2008 के वित्तीय संकट के बाद यूरोप में वामपंथी और जनवादी विचारधारा के पुनरुत्थान का प्रतीक मानी जाती हैं।


[एंटी-ग्लोबलाइजेशन आंदोलन:- उन आंदोलनों को संदर्भित करता है जो वैश्वीकरण के वर्तमान रूप को अस्वीकार करते हैं, जिसे वे हानिकारक, शोषणकारी और अन्यायपूर्ण मानते हैं। ये आंदोलन इस बात की आलोचना करते हैं कि वैश्वीकरण किस तरह बहुराष्ट्रीय कंपनियों और अभिजात वर्ग के समूहों को लाभ पहुंचाता है। एंटी-ग्लोबलाइजेशन आंदोलन आमतौर पर श्रमिक अधिकारों, पर्यावरण संरक्षण, आर्थिक असमानता और राष्ट्रीय संप्रभुता के क्षरण जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करता है।]

[ आंदोलन:- वर्तमान वैश्वीकरण के मॉडल को अधिक समान, समावेशी और न्यायपूर्ण बनाने की कोशिश करता है। अल्टर-ग्लोबलाइजेशन के समर्थक पूरी तरह से वैश्वीकरण का विरोध नहीं करते बल्कि वे एक ऐसे वैश्वीकरण का समर्थन करते हैं जो सामाजिक न्याय, पर्यावरणीय स्थिरता और मानवाधिकारों को प्राथमिकता देता है। इसमें उचित व्यापार, जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक सहयोग, अधिक खुली आप्रवासन नीतियाँ और विश्वभर में हाशिए पर रहे समुदायों को सशक्त बनाने के लिए प्रयास किए जाते हैं।]

[Occupy' movements (ऑक्युपाई आंदोलन) एक वैश्विक विरोध आंदोलन है जो आर्थिक असमानता, निगमों के अत्यधिक प्रभाव, और सामाजिक न्याय की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए शुरू हुआ। यह आंदोलन विशेष रूप से 2011 में प्रसिद्ध हुआ जब Occupy Wall Street (OWS) न्यूयॉर्क सिटी के ज़ुकोटी पार्क में शुरू हुआ। इसका मूल उद्देश्य अमेरिका में आर्थिक असमानता, वित्तीय संस्थाओं द्वारा शक्ति का दुरुपयोग और 99% आम जनता के हितों की अनदेखी करने के खिलाफ विरोध था जबकि 1% सबसे अमीर और शक्तिशाली लोगों के पास अधिक धन और सत्ता थी।]


दक्षिणपंथी वैश्वीकरण विरोधी(Right-Wing Anti-globalization):-

दायें पक्ष का एंटी-ग्लोबलाइजेशन  एक अपेक्षाकृत संगठित, हालांकि कम एकजुट और समन्वित, वैश्विक नेटवर्क के रूप में हाल ही में उभराआंदोलन है। जबकि राष्ट्रवादी समूहों द्वारा अपनी राष्ट्रीय पहचान पर गर्व और विदेशियों के प्रति उनकी शत्रुता को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय राष्ट्रवादी एकजुटता का विचार विरोधाभासी लग सकता है, लेकिन स्थिति इतनी सरल नहीं है। वास्तव में, ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो राष्ट्रीयतावादी कम से कम उतने ही ट्रांसनेशनल संगठन और एकजुटता की ओर उन्मुख होते थे जितने कि उदारवादी और बाएं पक्ष के वैश्विक अभिनेता। उदाहरण के लिए जब जर्मनी, इटली और स्पेन तीनों फासीवादी शासन के तहत थे तब इन देशों के बीच गठबंधन व सहयोग और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 'एक्सिस' शक्तियों का गठबंधन।

2010 के दशक में बाएं पक्ष के एंटी/अल्टर-ग्लोबलाइजेशन आंदोलन के एंटी-ऑस्टेरिटी आंदोलन(anti-austerity movement) के समानांतर सफल ट्रांसनेशनल दायें पक्ष का आंदोलन उभरा जो वैश्वीकरण और विशेष रूप से 'ग्लोबलिज़्म' के खिलाफ था। इनमें यूरोप और उत्तरी अमेरिका में स्थानीय, राष्ट्रीय, और क्षेत्रीय स्तर के आंदोलनों के संगठन और राजनीतिक पार्टियां शामिल थीं। जैसे कि ब्रिटेन में यूके इंडिपेंडेंस पार्टी (UKIP), जर्मनी में अल्टरनेटिव फ्यूर डॉयच्लैंड (AfD), इटली में जेनेरेज़ियोने आइडेंटिटारिया (Generation Identity), और संयुक्त राज्य अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के आस-पास का आंदोलन([UK Independence Party (UKIP) in Britain, Alternatif fur Deutshland (AfD) in Germany, Generazione Identitaria (Generation Idenity) in Italy, and the movement around the presidential candidacy of Donald Trump in the United States]। 'पश्चिम' के बहार भारत में नरेंद्र मोदी और ब्राजील में जायर बोल्सोनारो के राजनीतिक नेतृत्व के आस-पास समान आंदोलन उभरे।

जबकि बाएं पक्ष के एंटी-ग्लोबलाइजेशन आंदोलनों में शामिल लोग राजनीतिक लक्ष्यों और तरीकों के बारे में विभिन्न दृष्टिकोण रखते हैं। वे इस बात पर एकजुट हैं कि उनके लोग वैश्वीकरण और उदार ग्लोबलिस्ट नीतियों के कारण विभिन्न तरीकों से नुकसान उठा चुके हैं। वे नस्लीय या जातीय राष्ट्रीय पहचान के विचारों का समर्थन करते हैं। उनके राजनीतिक दृष्टिकोण राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर दोनों पर राजनीतिक बाएं पक्ष की, नस्लीय, लिंगीय, और यौन अल्पसंख्यकों की demonization पर केंद्रित होते हैं विशेष रूप से मास आप्रवासन(mass immigration) के खिलाफ होते हैं।

यदि वामपंथी एंटी-ग्लोबलाइजेशन राजनीति की पहली लहर इंटरनेट के आगमन से संभव हुई थी(एक तकनीक जिसे ज़ापाटिस्टास और अन्य एंटी-कैपिटलिस्ट वामपंथी समूहों ने बहुत चतुराई से उपयोग किया था) तो वैश्वीकरण के खिलाफ दक्षिणपंथी रुख सोशल मीडिया के बिना संभव नहीं हो सकता था। सोशल मीडिया के परिवर्तनकारी प्रभाव इतने नाटकीय थे (क्योंकि इंटरनेट सामग्री का निर्माण बड़े व्यवसायों की बजाय व्यक्तिगत उपयोगकर्ताओं द्वारा किया जाने लगा) कि इस नए सोशल मीडिया मॉडल को वर्णित करने के लिए 'वेब 2.0' शब्द गढ़ा गया। सोशल मीडिया राजनीतिक आयोजन और बहस का एक प्रमुख मंच बन गया जिसमें ट्विटर, फेसबुक जैसे प्लेटफ़ॉर्म विशेष रूप से राजनीतिक रूप से सक्रिय हो गए। जबकि वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों सोशल मीडिया के माध्यम से संगठित होते हैं और प्रचार करते हैं। ट्रांसनेशनल एंटी-ग्लोबलाइजेशन दक्षिणपंथ वास्तव में इन प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से ही उभरा जिसने अलग-अलग और दूरस्थ दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं को उपरोक्त साझा विचारों के इर्द-गिर्द संवाद करने और संगठित होने की अनुमति दी भले ही उनके राष्ट्रीय और स्थानीय संदर्भ एक-दूसरे से बहुत अलग हों।


ग्लोबलिज़्म, वर्ल्डिंग और वर्ल्डिज़्म: वैश्विक राजनीति की कल्पना(GLOBALISM, WORLDING AND WORLDISM: IMAGINING GLOBAL POLITICS):-


पहली लहर के एंटी-ग्लोबलाइज़ेशन आंदोलनों से जुड़ा एक लोकप्रिय नारा था "वैश्विक सोचें, स्थानीय काम करें(think global, act local)"। इसका मतलब था कि लोगों को वैश्वीकरण (और इसके आलोचकों के अनुसार, इसके माध्यम से होने वाले शोषण और असमानता) के प्रति जागरूक होना चाहिए लेकिन अपनी वैश्वीकरण विरोधी सक्रियता को को स्थानीय संदर्भों में निर्देशित/केंद्रित करना चाहिए। वैश्विक राजनीति को अध्ययन करने के लिए यह तर्क दिया जाता है कि राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रों से आगे बढ़कर राजनीति को समझने के लिए वैश्विक को एक 'डोमेन' के रूप में देखना जरूरी है।

इसके साथ ही, यह एक बड़ा प्रश्न है कि 'वैश्विक सोचने(think globally)' का अर्थ क्या है। अब यह व्यापक रूप से माना जाता है कि वैश्वीकरण और वैश्विक को एक राजनीतिक क्षेत्र के रूप में उभरने का एक प्रमुख कारण कल्पना है। इसका यह अर्थ नहीं है कि वैश्विक राजनीति वास्तविक नहीं है बल्कि यह कि वैश्विक पर ध्यान केंद्रित करना समाजों में एक कल्पनात्मक परिवर्तन का परिणाम है। यह परिवर्तन हमारे स्थानीय और राष्ट्रीय संदर्भों के स्तर से (जो हमें सूक्ष्म स्तर पर महत्वपूर्ण लगते हैं) अधिक व्यापक 'मैक्रो' स्तर की कल्पनाओं की ओर हुआ है।

इस दृष्टिकोण से, वैश्विक राजनीति का अध्ययन करने का अर्थ है 'अंतरराष्ट्रीय संबंधों को अलग ढंग से सोचना' (टिकनर और ब्लैनी/Tickner and Blaney, 2012)। 


यह पारंपरिक अंतरराज्यीय संबंधों के फोकस से आगे बढ़ने की बात करता है। इसाक कामोला/Kamola (2019) तर्क देते हैं कि 'दुनिया को वैश्विक बनाने' की प्रक्रिया, जो मुख्य रूप से एक वैश्विक कल्पना की सामाजिक रचना (social construction) है, 1980 और 1990 के दशकों में नव उदारवाद (neoliberalism) के उदय से निकटता से जुड़ी हुई है।


इस दृष्टिकोण के अनुसार वैश्विक का उदय बहुराष्ट्रीय निगमों, विश्वविद्यालय के बिज़नेस स्कूलों, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों, और बाजार-चालित राजनीति की वकालत करने वाले राजनेताओं के बढ़ते प्रभाव का परिणाम है। इन सभी ने वैश्विकवादी (globalist) दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया जो उनके वैश्विक अर्थव्यवस्था के विशेष दृष्टिकोण से जुड़ा हुआ था।

वैश्विक राजनीति के बारे में सोचते समय 'वैश्विक रूप से सोचना' का अर्थ है विश्व को केवल एक ऐसी प्रणाली के रूप में नहीं देखना जिसमें राज्य आपस में संवाद करते हैं (जैसे 'बिलियर्ड बॉल' मॉडल) बल्कि इसे एक सम्पूर्ण विश्व के रूप में देखना। लेकिन यह कल्पनात्मक परिवर्तन कोई स्वाभाविक, तटस्थ या अपरिहार्य प्रक्रिया नहीं है जो केवल वैश्विक के एक नए राजनीतिक स्थान या क्षेत्र के रूप में उभरने और उसे समझने की आवश्यकता को दर्शाता है।

वैश्विक रूप से सोचना वास्तव में एक विशेष दृष्टिकोण या 'सत्ता-मीमांसा' (ontology) अपनाने के बारे में है जो समाजिक संबंधों और राजनीति को समझने का तरीका है। यह भी अन्य किसी भी सामाजिक दृष्टिकोण की तरह हमारे स्थानीय संदर्भों में निहित है। एक बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में वैश्विक रूप से सोचना संभव है क्योंकि दुनिया में विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक संदर्भ मौजूद हैं जिनमें हम सभी जन्म लेते हैं और जो हमारी सोच को विशिष्ट (न कि सार्वभौमिक) तरीके से आकार देते हैं।


उदाहरण के लिए, यह देखा गया है कि वैश्वीकरण के प्रमुख पश्चिमी अध्ययनों और वैश्विकवादी (globalist) सिद्धांतों में अफ्रीका या तो पूरी तरह से गायब रहता है या जब इसका उल्लेख होता भी है तो इसे लगभग हमेशा एक समस्या के रूप में देखा जाता है (कामोला 2012: 183)। पश्चिमी वैश्विकवादी कल्पना इस प्रकार अफ्रीकी लोगों की सक्रियता और वैश्विक दुनिया के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को अस्वीकार करती है।


हमें यह पहचानना होगा कि वैश्विक कल्पना चीनी और अमेरिकी लोगों या यूरोपीय और अफ्रीकी लोगों के लिए बहुत अलग हो सकती है। यहां तक कि इन राष्ट्रीय और क्षेत्रीय समूहों के भीतर वैश्विक का अर्थ भी अलग-अलग हो सकता है। हाल के वर्षों में 'उपनिवेशोत्तर (postcolonial)' विचारकों ने वैश्विकवादी दृष्टि के वैकल्पिक प्रतिमान प्रस्तुत किए हैं जो स्वयं पश्चिमी और विशेष रूप से उत्तर अमेरिकी कल्पना से जुड़े हैं।


'वर्ल्डिंग' शब्द का उपयोग इस बात का वर्णन करने के लिए किया गया है कि विभिन्न समाज वैश्विक राजनीति की कल्पना कैसे करते हैं। वहीं एल.एच.एम. लिंग/L. H. M. Ling (1955-2018) ने 'वर्ल्डिज़्म' या 'मल्टीपल वर्ल्ड्स के सिद्धांत(the theory of Multiple Worlds)' का उपयोग करके विश्व के कई दृष्टिकोणों का वर्णन किया है जिनमें पश्चिमी वैश्विकवादी केवल एक दृष्टिकोण है (लिंग, 2014a)।

[Worlding:- वह प्रक्रिया जिसके द्वारा विभिन्न समाज अपनी दुनिया की कल्पनाएँ (imaginaries) बनाते हैं जिसमें वे इसकी संरचना और घटकों की परिकल्पना करते हैं। इसमें यह शामिल होता है कि कौन से वैश्विक कारक और प्रक्रियाएँ प्रमुख हैं।

Worldism:- यह एक सिद्धांत है जो अनेक दुनियाओं की बात करता है। यह उन विभिन्न वैश्विक दृष्टिकोणों का वर्णन करता है जो अलग-अलग स्थानीय, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय वर्ल्डिंग प्रक्रियाओं से उत्पन्न हुए हैं।]

विशेष समाज और लोग अक्सर अपनी स्थानीय, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय अनुभवों के आधार पर एक सार्वभौमिक वैश्विक कल्पना को दुनिया पर थोपने का प्रयास करते हैं। इसमें उनकी आंतरिक और आध्यात्मिक जीवन की कल्पनाएं भी शामिल होती हैं। लिंग ने पश्चिमी मॉडलों के विकल्प प्रस्तुत किए हैं जो चीनी दार्शनिक परंपराओं, विशेष रूप से दाओवाद(Daoism) और कन्फ्यूशियस/Confucius (551-479 ईसा पूर्व) और रणनीतिकार सन त्ज़ू/Sun Tzu (544-496 ईसा पूर्व) द्वारा दिए गए बौद्धिक विचारों पर आधारित हैं।

उनके अनुसार इन अलग-अलग दृष्टिकोणों से मनुष्य, समाज, पृथ्वी और वैश्विक को पश्चिमी दृष्टिकोण की तुलना में बहुत अलग ढंग से देखा जा सकता है। यह वैकल्पिक दृष्टिकोण अन्य बातों के साथ 'चीन के उदय' को उस खतरे के रूप में देखने की आवश्यकता नहीं समझता जैसा कि इसे पश्चिमी उदार वैश्विकवादी विचारधारा में प्रस्तुत किया गया है।


L. H. M. LING (1955-2018)

H. M. (Lily) Ling 21वीं सदी के उत्तरार्ध में उपनिवेशोत्तर अंतर्राष्ट्रीय संबंध सिद्धांत (postcolonial international relations theory) की एक अत्यधिक प्रभावशाली विद्वान बनीं। लिंग के कार्यों ने वैश्विक राजनीति की कई प्रचलित और पारंपरिक समझ को चुनौती दी विशेष रूप से उन्होंने 'वेस्टफेलिया वर्ल्ड' की आलोचना की। 'वेस्टफेलिया वर्ल्ड' उस दृष्टिकोण को दर्शाता है जिसमें दुनिया को क्षेत्रीय सीमाओं में बँटे हुए राज्यों का समूह माना गया है जो विभिन्न क्षमताओं के साथ अराजकता के बीच परस्पर क्रिया करते हैं।

महत्वपूर्ण रूप से, जहाँ इस वैश्विक राजनीति की दृष्टि विशेष रूप से पश्चिमी स्रोतों जैसे कि थ्यूसीडाइड्स, थॉमस हॉब्स, और इमैनुअल कांट पर आधारित थी लिंग के 'वर्ल्डिस्ट' विकल्प ने चीनी स्रोतों जैसे कि ताओवाद के दार्शनिक सिद्धांतों और द्वंद्वात्मक तर्कशास्त्र (dialectical reasoning) का सहारा लिया।

लिंग एक नारीवादी विद्वान भी थीं और उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर 'गैर-पश्चिमी' नारीवादी सोच में योगदान दिया। 2015 के एक साक्षात्कार में लिंग ने कहा:-

"मैं पूर्व और पश्चिम दोनों का उत्पाद हूँ। इस संकर (hybrid) स्थान में बड़े होने ने मुझे दोनों परंपराओं की संभावनाओं और सीमाओं को समझने में सक्षम बनाया है; [...] दोनों दुनियाओं की सर्वश्रेष्ठ चीज़ों को समेटने और उनकी कमियों को पीछे छोड़ने का मौका दिया है।"


उनके प्रमुख कार्यों में शामिल हैं:-

Postcolonial International Relations: Conquest and Desire between Asia and the West (2002)


Transforming World Politics: From Empire to Multiple Worlds (2009, अन्ना एम. आगाथांजेलो के साथ)


The Dao of World Politics (2014)

Imagining World Politics (2014)।



वैश्विक राजनीति पर नजर(LENSES ON GLOBAL POLITICS)


हालाँकि, वैश्विक राजनीति को समझने के लिए यह भी आवश्यक है कि हम उन सिद्धांतों, मूल्यों और धारणाओं को समझें, जिनके माध्यम से विश्व मामलों की व्याख्या की गई है। 

विभिन्न विश्लेषक और सिद्धांतकार दुनिया को कैसे देखते हैं? 

वैश्विक राजनीति पर मुख्य 'दृष्टिकोण' (lenses) क्या हैं? 

वैश्विक राजनीति का अध्ययन करने का सैद्धांतिक आयाम हाल के दशकों में एक समृद्ध और विविध क्षेत्र बन गया है, । फिर भी, यह परिचय व्यापक बहस के क्षेत्रों को रेखांकित करने का प्रयास करता है, विशेष रूप से 'मुख्यधारा' (mainstream) दृष्टिकोण और 'आलोचनात्मक' (critical) दृष्टिकोण के बीच अंतर करके।


मुख्यधारा दृष्टिकोण(Mainstream perspectives)


वैश्विक राजनीति पर दो मुख्यधारा दृष्टिकोण हैं realism (यथार्थवाद) और उदारवाद (liberalism)। इनमें क्या समानताएँ हैं, और किस अर्थ में ये 'मुख्यधारा' हैं?

रियलिज़्म और लिबरलिज़्म को मुख्यधारा दृष्टिकोण के रूप में देखा जा सकता है, क्योंकि विभिन्न रूपों में, ये दोनों सिद्धांत अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के क्षेत्र में पारंपरिक शैक्षिक दृष्टिकोणों पर शुरुआत से ही हावी रहे हैं। यथार्थवाद और उदारवाद सिद्धांतों में दो मुख्य बातें समान हैं। 

पहली, ये दोनों पोज़िटिविज़्म (सकारात्मकता) पर आधारित हैं। इसका मतलब है कि यह संभव है कि 'तथ्य' और 'मूल्य' के बीच अंतर करके वस्तुनिष्ठ ज्ञान विकसित किया जा सके

[सकारात्मकता (Positivism):- यह सिद्धांत कि सामाजिक और वास्तव में सभी प्रकार की जांच प्राकृतिक विज्ञानों की विधियों के अनुरूप होनी चाहिए।]

संक्षेप में, यह संभव है कि सिद्धांतों की तुलना 'वास्तविक दुनिया' से की जा सके, जो 'वहाँ बाहर' मौजूद है। रॉबर्ट कॉक्स (1981) इस प्रकार के सिद्धांतों को 'समस्या-समाधान सिद्धांत' के रूप में वर्णित करते हैं, क्योंकि ये दुनिया को 'जैसा है' वैसे ही लेते हैं और समस्याओं के समाधान के लिए नीति-निर्माताओं को विवेकपूर्ण सलाह देने का प्रयास करते हैं जो 'वास्तविक दुनिया' के चुनौतीपूर्ण मुद्दों का सामना कर रहे होते हैं। 



दूसरी बात, रियलिस्ट और लिबरल सिद्धांतिकारी समान चिंताओं को साझा करते हैं और समान मुद्दों को संबोधित करते हैं, अर्थात् वे एक-दूसरे से संवाद करते हैं, न कि एक-दूसरे को नज़रअंदाज करते हुए। विशेष रूप से, रियलिज़्म और लिबरलिज़्म का मुख्य ध्यान राज्य संबंधों में संघर्ष और सहयोग के बीच संतुलन पर है। हालांकि रियलिस्ट आमतौर पर संघर्ष पर अधिक बल देते हैं, जबकि लिबरल सहयोग की संभावना को प्रमुख मानते हैं, फिर भी दोनों एक-दूसरे द्वारा उठाए गए मुद्दों से अंजान नहीं होते हैं, जैसा कि यह देखा गया है कि समय के साथ रियलिज़्म और लिबरलिज़्म के बीच अंतर धुंधला हो गए हैं। फिर भी, रियलिस्ट और लिबरल दृष्टिकोणों के बीच महत्वपूर्ण अंतर पहचाने जा सकते हैं।



रियलिस्ट वैश्विक राजनीति को कैसे देखते हैं?


रियलिज़्म के विचारों की जड़ें थ्यूसिडिडीज(Thucydides) , सुंग त्ज़ू/Sun Tzu (जिन्होंने "आर्ट ऑफ़ वॉर" लिखा), मैक्यावली(Machiavelli) और थॉमस हॉब्स(Thomas Hobbes) जैसे विचारकों तक जाती हैं। 



रियलिस्ट दृष्टिकोण निराशावादी हैं।  अंतर्राष्ट्रीय राजनीति लगातार शक्ति संघर्षों और संघर्षों द्वारा चिह्नित होती है, और शांतिपूर्ण सहयोग की दिशा में कई बाधाएँ खड़ी होती हैं। रियलिज़्म, शक्ति राजनीति पर जोर देते हुए, निम्नलिखित पूर्वधारणाओं पर आधारित है:-

  • मानव स्वभाव स्वार्थ और लालच(selfishness and greed) द्वारा निर्धारित होता है।
  • राजनीति मानव गतिविधि का एक क्षेत्र है, जिसे शक्ति और बल(power and coercion) प्रयोग द्वारा संरचित किया जाता है।
  • राज्य वैश्विक अभिनेता(global actors) हैं।
  • राज्य अपने आत्महित और अस्तित्व(self-interest and survival) को प्राथमिकता देते हैं, सुरक्षा को सबसे ऊपर रखते हैं।
  • राज्य अराजकता (अराजक स्थिति) के संदर्भ में कार्य करते हैं, और इस प्रकार आत्म-सहायता पर निर्भर रहते हैं।
  • वैश्विक व्यवस्था राज्यों के बीच शक्ति/distribution of power (क्षमताओं/capabilities) के वितरण द्वारा संरचित होती है।
  • शक्ति का संतुलन स्थिरता सुनिश्चित करने और युद्ध से बचने का प्रमुख उपाय है।
  • नैतिक विचार विदेश नीति के संचालन के लिए अप्रासंगिक हैं (और होने भी चाहिए)।

इसके विपरीत, उदारवादी वैश्विक राजनीति को कैसे देखते हैं? उदारवाद वैश्विक राजनीति का एक अधिक आशावादी दृष्टिकोण(optimistic vision of global politics) प्रस्तुत करता है, जो अंततः मानव तर्कशीलता और नैतिक अच्छाई में विश्वास पर आधारित है (हालाँकि उदारवादी यह भी स्वीकार करते हैं कि लोग मूल रूप से स्वार्थी और प्रतिस्पर्धात्मक होते हैं)। उदारवादी मानते हैं कि सामाजिक संपर्क के सभी रूपों में संतुलन या सामंजस्य का सिद्धांत काम करता है। जहां तक वैश्विक राजनीति का सवाल है, यह इमैन्युअल कांट के "सार्वभौमिक और शाश्वत शांति(universal and perpetual peace)" की संभावना में विश्वास के रूप में प्रकट होता है। वैश्विक राजनीति का उदारवादी मॉडल निम्नलिखित प्रमुख धारणाओं पर आधारित है:-

  • मानव  तर्कशील और नैतिक प्राणी हैं।
  • इतिहास एक प्रगतिशील प्रक्रिया है, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और शांति की बढ़ती संभावना है।
  • वैश्विक राजनीति के मिश्रित-कार्यकर्ता मॉडल राज्य-केंद्रित मॉडलों से अधिक वास्तविक हैं।
  • व्यापार और आर्थिक पारस्परिक निर्भरता(Trade and economic interdependence) युद्ध की संभावना को कम करती है।
  • अंतर्राष्ट्रीय कानून आदेश को बढ़ावा देने में मदद करता है और राज्यों के बीच नियम-आधारित व्यवहार(rule-governed behaviour) को बढ़ावा देता है।
  • लोकतंत्र स्वाभाविक रूप से शांति प्रिय होता है, विशेष रूप से लोकतांत्रिक राज्यों के बीच युद्ध की संभावना को कम करता है।

[अंतरराष्ट्रीयतावाद(Internationalism):- राजनीति का एक सिद्धांत या अभ्यास जो देशों के बीच सहयोग या सामंजस्य पर आधारित है, राष्ट्रीय राजनीति के परे जाने के विपरीत।]


[शक्ति आधारित राजनीति (Power politics):- राजनीति का एक दृष्टिकोण जो इस धारणा पर आधारित है कि शक्ति की प्राप्ति मानव का मुख्य लक्ष्य है; इस शब्द का कभी-कभी वर्णनात्मक रूप में उपयोग किया जाता है।]




थॉमस हॉब्स (1588-1679)


एक अंग्रेज राजनीतिक दर्शनशास्त्री। हॉब्स एक मामूली पादरी के बेटे थे जिन्होंने बाद में अपने परिवार को छोड़ दिया। एक ऐसी अनिश्चितता और गृहयुद्ध के समय में लिखते हुए, जो अंग्रेजी क्रांति द्वारा उत्पन्न हुआ, हॉब्स ने अरस्तू के बाद प्रकृति और मानव व्यवहार पर पहला व्यापक सिद्धांत विकसित किया। उनका प्रसिद्ध कार्य, लेवियाथन (1651), राजनीतिक कर्तव्यों के आधारों पर चर्चा करता है और निस्संदेह गृहयुद्ध के प्रभाव को दर्शाता है। यह इस धारणा पर आधारित था कि मनुष्य 'शक्ति के बाद शक्ति(power after power)' की खोज करता है, और इसने 'प्राकृतिक राज्य(state of nature)' के अराजकता के मुकाबले एकमात्र विकल्प के रूप में पूर्णतावादी सरकार के लिए एक वास्तविकतावादी औचित्य प्रदान किया, जिसमें जीवन 'अकेला, गरीब, घिनौना, क्रूर और संक्षिप्त' होगा। हॉब्स के राज्य पर जोर, जिसे आदेश और सुरक्षा का अभ्यस्त गारंटर माना जाता है, ने 9/11 के बाद उनके विचारों में पुनः रुचि को प्रेरित किया।


इमैनुएल कांट (1724-1804)


जर्मन दार्शनिक। कांट ने अपनी पूरी ज़िंदगी Königsberg (जो तब पूर्व प्रूसिया में था) में बिताई, और 1770 में यूनिवर्सिटी ऑफ़ Königsberg में तर्कशास्त्र और मेटाफिजिक्स के प्रोफेसर बन गए। उनका 'आलोचनात्मक' दर्शन यह मानता है कि ज्ञान केवल इन्द्रिय संवेदनाओं का संग्रह नहीं है; यह मानव समझ के संकल्पनात्मक उपकरणों(conceptual apparatus) पर निर्भर करता है। कांट का राजनीतिक विचार नैतिकता के केंद्रीय महत्व से आकारित था। उनका मानना था कि तर्क का कानून श्रेणीबद्ध अनिवार्यताओं का पालन करता है, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण यह था कि दूसरों को 'अंत' के रूप में मानना चाहिए, न कि केवल 'साधन' के रूप में। कांट के सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में शामिल हैं: "Critique of Pure Reason (1781), "Idea for a Universal History with a Cosmopolitan Purpose (1784)और "Metaphysics of Morals (1785)"।





आलोचनात्मक दृष्टिकोण(Critical perspectives):-


1980 के दशक के अंत से, वैश्विक मामलों में आलोचनात्मक दृष्टिकोणों की रेंज में काफी वृद्धि हुई है। उस समय तक, मार्क्सवाद मुख्यधारा के वास्तविकतावादी और उदारवादी सिद्धांतों का प्रमुख विकल्प था। 

मार्क्सवादी दृष्टिकोण को विशिष्ट बनाने वाली बात यह थी कि इसमें राज्यों के बीच संघर्ष और सहयोग के पैटर्न पर नहीं, बल्कि आर्थिक शक्ति(economic power) की संरचनाओं और अंतर्राष्ट्रीय पूंजी(international capital) द्वारा विश्व मामलों में निभाई जाने वाली भूमिका पर जोर दिया गया था। इसने अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक अर्थशास्त्र जो कभी-कभी अंतर्राष्ट्रीय संबंधों (IR) के एक उप-क्षेत्र के रूप में देखा जाता है को ध्यान में ला दिया। 

हालांकि, शीत युद्ध की समाप्ति के बाद, विश्व राजनीति के अध्ययन को व्यापक रूप से 'नई आवाज़ों' ने प्रभावित करना शुरू कर दिया, जिनमें सामाजिक निर्माणवाद, आलोचनात्मक सिद्धांत, उत्तर-संरचनावाद, उत्तर-उपनिवेशवाद, नारीवाद और हरित राजनीति जैसे उल्लेखनीय उदाहरण शामिल हैं।

इन नई आलोचनात्मक आवाज़ों में क्या समानता है और किस अर्थ में वे 'आलोचनात्मक' हैं? उनके विविध दार्शनिक आधारों और विपरीत राजनीतिक दृष्टिकोणों को देखते हुए, यह तर्क देना आकर्षक है कि इन 'नई आवाज़ों' को एकजुट करने वाली एकमात्र चीज़ मुख्यधारा की सोच के प्रति साझा विरोध है। 

 हालाँकि, दो व्यापक समानताएँ पहचानी जा सकती हैं। 

पहली समानता यह है कि, अलग-अलग तरीकों से और अलग-अलग डिग्री पर, उन्होंने मुख्यधारा के सिद्धांत के प्रत्यक्षवाद से परे जाने की कोशिश की है, इसके बजाय सामाजिक आचरण और इसलिए, विश्व मामलों को आकार देने में चेतना की भूमिका पर ज़ोर दिया है।

ये तथाकथित उत्तर-प्रत्यक्षवादी सिद्धांत इसलिए 'आलोचनात्मक' हैं क्योंकि वे न केवल मुख्यधारा के सिद्धांत के निष्कर्षों पर सवाल उठाते हैं, बल्कि इन सिद्धांतों को भी आलोचनात्मक जांच के अधीन करते हैं, जो उनके भीतर काम करने वाली पक्षपाती प्रवृत्तियों/पूर्वाग्रहों को उजागर करते हैं और उनके परिणामों/निहितार्थों की जांच करते हैं। 


दूसरी समानता पहली से जुड़ी हुई है: आलोचनात्मक सिद्धांत 'आलोचनात्मक' हैं क्योंकि ये विभिन्न तरीकों से आधुनिक वैश्विक मामलों में प्रमुख शक्तियों और हितों का विरोध करते हैं, और इस प्रकार (आमतौर पर) हाशिए पर या उत्पीड़ित समूहों के साथ मिलकर वैश्विक स्थिति-quo को चुनौती देते हैं। इस प्रकार, इनमें से प्रत्येक असमानताओं और विषमताओं को उजागर करने का प्रयास करता है, जिन्हें मुख्यधारा के सिद्धांत नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति रखते हैं।


"क्वो" लैटिन वाक्यांश "status quo" का हिस्सा है, जिसका अर्थ है मौजूदा स्थिति या हालात। इस संदर्भ में, "status quo" का मतलब है वर्तमान स्थिति या किसी निश्चित क्षण में चीजें जिस तरह हैं। इसलिए, वाक्य "वैश्विक स्थिति को चुनौती देना" का मतलब है मौजूदा वैश्विक स्थिति या व्यवस्था का विरोध करना या उसे चुनौती देना।


हालाँकि, जिन असमानताओं और विषमताओं पर आलोचनात्मक विचारकों ने ध्यान आकर्षित किया है, वे कई और विविध हैं:-


• नियो-मार्क्सवादियों (जो परंपराओं और प्रवृत्तियों की एक श्रृंखला को शामिल करते हैं, जो वास्तव में सकारात्मकतावादी/पोस्ट-पॉज़िटिविस्ट विभाजन को पार करते हैं) वैश्विक पूंजीवादी प्रणाली में असमानताओं को उजागर करते हैं, जिसके माध्यम से विकसित देश या क्षेत्र, कभी-कभी ट्रांसनेशनल कॉर्पोरेशन्स (TNCs) के माध्यम से या 'आधिपत्य(Hegemonic)' शक्तियों जैसे कि यूएसए के साथ जुड़े होते हैं, जो विकासशील देशों या क्षेत्रों पर प्रभुत्व और शोषण करते हैं।


• सामाजिक रचनावाद(Social constructivism) एक ठोस सिद्धांत न होकर एक विश्लेषणात्मक उपकरण(analytical tool) है। यह तर्क करते हुए कि लोग वास्तव में उस दुनिया को 'निर्माण' करते हैं जिसमें वे रहते हैं, यह सुझाव देते हुए कि दुनिया एक प्रकार की 'आपसी-संवेदनशील(inter-subjective awareness)' जागरूकता के माध्यम से काम करती है। रचनवादियों(constructivists) ने मुख्यधारा के सिद्धांत की वस्तुनिष्ठता के दावे को सवालों के घेरे में डाला है।


• उत्तर-संरचनावादियों/Poststructuralists का कहना है कि सभी विचार और अवधारणाएँ भाषा में व्यक्त की जाती हैं, जो स्वयं शक्ति के जटिल रिश्तों में फंसी होती है। विशेष रूप से मिशेल फूको के लेखन से प्रभावित उत्तर-संरचनावादियों  ने शक्ति और विचार प्रणालियों के बीच संबंध पर ध्यान आकर्षित किया है, जिसका उपयोग 'शक्ति का विमर्श(discourse of power)' के विचार से किया गया है।


• नारीवादी (Feminists) ने वैश्विक और वास्तव में सभी अन्य प्रकार की राजनीति में लिंग असमानता की व्यवस्थित और व्यापक संरचनाओं पर ध्यान आकर्षित किया है। विशेष रूप से, उन्होंने यह उजागर किया है कि मुख्यधारा और विशेष रूप से वास्तविकतावादी सिद्धांत 'पुरुषवादी' धारणाओं पर आधारित हैं, जो प्रतिद्वंद्विता, प्रतिस्पर्धा और अपरिहार्य संघर्ष के बारे में हैं।


• उत्तर उपनिवेशवादी(Postcolonialists) ने उपनिवेशी शासन के सांस्कृतिक आयाम पर जोर दिया है, यह दिखाते हुए कि पश्चिमी सांस्कृतिक और राजनीतिक वर्चस्व ने दुनिया के बाकी हिस्सों पर औपचारिक राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के बावजूद कैसे अपनी पकड़ बनाए रखी है।


• Green politics या पारिस्थितिकीवाद ने पर्यावरणीय गिरावट को लेकर बढ़ती चिंताओं पर ध्यान केंद्रित किया है, यह दिखाते हुए कि यह औद्योगिकीकरण और आर्थिक विकास के प्रति जुनून का उपोत्पाद रहा है, जिसे ऐसे विचार प्रणालियों द्वारा समर्थित किया गया है जो मनुष्यों को 'प्रकृति पर मालिक(masters over nature)' के रूप में प्रस्तुत करते हैं।


मिशेल फुको (1926-84)



फ्रांसीसी दार्शनिक और रैडिकल बौद्धिक(radical intellectual)। एक समृद्ध सर्जन के पुत्र, फुको का युवा जीवन समस्याओं से भरा था, जिसमें उन्होंने कई बार आत्महत्या का प्रयास किया और अपनी समलैंगिकता को स्वीकार करने में संघर्ष किया। उनका काम, जो पागलपन, चिकित्सा, दंड, यौनिकता और स्वयं ज्ञान के इतिहास पर आधारित था, इस धारणा पर आधारित था कि प्रत्येक काल के संस्थान, अवधारणाएँ और विश्वास 'शक्ति के संवादों(discourses of power)' द्वारा समर्थित होते हैं। इसका मतलब है कि शक्ति संबंधों को मुख्य रूप से 'ज्ञान' की संरचना की जांच करके उजागर किया जा सकता है, क्योंकि 'सत्य शासक वर्ग या प्रचलित शक्ति संरचना के हितों की सेवा करता है(truth serves the interests of a ruling class or the prevailing power-structure)।' फुको के सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में शामिल हैं: मैडनेस एंड सिविलाइजेशन (1961), द ऑर्डर ऑफ थिंग्स (1966), और द हिस्ट्री ऑफ सेक्सुएलिटी (1976)।






वैश्विक राजनीति में निरंतरता और परिवर्तन(CONTINUITY AND CHANGE IN
GLOBAL POLITICS)

अंत में, वैश्विक राजनीति एक लगातार बदलता हुआ क्षेत्र है, जिसमें समय के साथ परिवर्तन की गति यदि कुछ बढ़ी नहीं है। हाल के दशकों में महत्वपूर्ण घटनाएँ घटी हैं, जैसे शीत युद्ध का अंत, सोवियत संघ का पतन, 11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर हुए आतंकवादी हमले और 2007-09 का वैश्विक वित्तीय संकट। जबकि इन घटनाओं और अन्य घटनाओं ने वैश्विक राजनीति के परिप्रेक्ष्य को कभी-कभी मौलिक रूप से बदल दिया है। कुछ वैश्विक मामलों की विशेषताएँ अधिक स्थायी महत्व की साबित हुई हैं। इसे वैश्विक राजनीति के तीन महत्वपूर्ण पहलुओं में निरंतरता और परिवर्तन के बीच संतुलन का विश्लेषण करके समझा जा सकता है:-

• शक्ति
• सुरक्षा
• न्याय


शक्ति(Power)

राजनीति के सभी रूप शक्ति के बारे में होते हैं। वास्तव में, राजनीति को कभी-कभी शक्ति के अध्ययन के रूप में देखा जाता है, जिसका केंद्रीय विषय यह होता है: कौन, क्या, कब, और कैसे प्राप्त करता है? 

आधुनिक वैश्विक राजनीति शक्ति के बारे में दो प्रमुख सवाल उठाती है। 

पहला सवाल यह है कि शक्ति कहाँ स्थित है? यह किसके पास है? 
शीत युद्ध के युग में, यह सवाल उत्तर देने में आसान प्रतीत होता था। दो 'महाशक्तियाँ' (रूस और अमेरिका) वैश्विक राजनीति पर हावी थीं, जो वैश्विक प्रणाली को प्रतिद्वंद्वी 'प्रभाव क्षेत्रों' में विभाजित करती थीं। पूर्व-पश्चिम संघर्ष एक द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था के अस्तित्व को दर्शाता था, जो क्रमशः अमेरिका और सोवियत संघ की राजनीतिक, वैचारिक और आर्थिक प्रधानता से चिह्नित थी। 

शीत युद्ध के अंत ने वैश्विक शक्ति के स्थान के बदलने के बारे में एक प्रमुख बहस को जन्म दिया है। एक दृष्टिकोण में, साम्यवाद के पतन और सोवियत संघ के विघटन ने अमेरिका को दुनिया की एकमात्र महाशक्ति बना दिया, अर्थात् यह एक वैश्विक प्रभुत्व में बदल गया था। 

इस दृष्टिकोण में यह भी ध्यान में रखा गया कि अमेरिका वैश्वीकरण की प्रक्रिया का शिल्पकार और प्रमुख लाभार्थी था, साथ ही इसके पास विशाल 'संरचनात्मक' शक्ति थी और संयुक्त राष्ट्र, WTO, IMF और विश्व बैंक जैसे संस्थानों में इसकी केंद्रीय स्थिति ने इसे उन ढाँचों पर अनुपातहीन प्रभाव दिया, जिसके भीतर राज्य एक दूसरे से संबंधित होते हैं और यह तय करते हैं कि चीजें कैसे की जाएँगी।

[Hegemon:-एक प्रमुख या सर्वोत्तम शक्ति]

हालाँकि, वैश्विक शक्ति की बदलती संरचना के बारे में वैकल्पिक दृष्टिकोण यह सुझाते हैं कि यह अधिक विखंडित और बहुआयामी होती जा रही है। 
उदाहरण के लिए, शक्ति सामान्यतः राज्यों से दूर होकर गैर-राज्य अभिनेताओं और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की बढ़ती भूमिका के माध्यम से स्थानांतरित हो सकती है। इसके अलावा, वैश्वीकरण ने शक्ति को और अधिक फैलाया और अमूर्त बना दिया है, जिससे वैश्विक बाजारों का प्रभाव बढ़ा है और राज्यों को एक आर्थिक परस्पर निर्भरता के जाल में खींच लिया है, जो उनके कार्यों की स्वतंत्रता को महत्वपूर्ण रूप से सीमित करता है। 

इसका एक और आयाम उभरते हुए राज्यों जैसे कि चीन, भारत और ब्राजील के उदय, साथ ही एक पुनः उभरते रूस के प्रभाव को दर्शाता है, जिन्हें कभी-कभी संयुक्त रूप से BRICS के नाम से जाना जाता है। इस दृष्टिकोण में शीत युद्ध का द्विध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था अब बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था से बदलने की प्रक्रिया में है। शक्ति को नई प्रौद्योगिकी की क्षमता के माध्यम से भी बहुआयामी किया गया है, जो समाज के भीतर और समाजों के बीच शक्ति संतुलन को बदलने में सक्षम है, अक्सर पारंपरिक रूप से असहाय को सशक्त बनाते हुए। उदाहरण के लिए, संचार प्रौद्योगिकी में प्रगति, विशेष रूप से मोबाइल फोन और इंटरनेट का उपयोग, ढीले-ढाले संगठित समूहों की सामरिक प्रभावशीलता में सुधार लाया है, जिनमें आतंकवादी समूहों से लेकर विरोधी समूहों और सामाजिक आंदोलनों तक शामिल हैं। 
11 सितंबर के बाद से अल-कायदा का विश्व राजनीति पर प्रभाव इसके संगठनात्मक और आर्थिक बल से कहीं अधिक रहा है, क्योंकि आधुनिक प्रौद्योगिकी (बम और विमानों के रूप में) ने इसके आतंकवादी कार्यों को वैश्विक पहुंच दी है।

दूसरी बहस शक्ति की बदलती प्रकृति के बारे में है। यह, शायद, इसलिए हुआ है क्योंकि नई प्रौद्योगिकी और वैश्विक संचार, बढ़ती साक्षरता दरों और शैक्षिक मानकों के कारण राजनीतिक परिणामों को प्रभावित करने में 'मुलायम' शक्ति (soft power) अब 'कठोर' शक्ति (hard power) जितनी महत्वपूर्ण हो गई है।  soft power आकर्षण के रूप में शक्ति होती है, न कि बल प्रयोग के रूप में। यह दूसरों को मानकों और आकांक्षाओं का पालन करने या उन पर सहमति जताने के लिए प्रेरित करने की क्षमता है, न कि धमकियों या पुरस्कारों का उपयोग करने के मुकाबले। 

उदाहरण के लिए, यह बहस को उत्तेजित करता है कि क्या अब वैश्विक राजनीति में सैन्य शक्ति अप्रासंगिक हो गई है, विशेष रूप से जब यह 'दिल और दिमाग' की रणनीतियों से मेल नहीं खाती है। इसके अलावा, टेलीविजन का लगभग सर्वव्यापी प्रसार और उपग्रह प्रौद्योगिकी का व्यापक उपयोग इस बात को सुनिश्चित करता है कि विनाश और मानव दुःख की तस्वीरें, चाहे वह युद्ध, अकाल या प्राकृतिक आपदा द्वारा उत्पन्न हों, लगभग तुरंत वैश्विक स्तर पर साझा की जाती हैं। इसका मतलब यह है कि, अन्य बातों के अलावा, सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों का व्यवहार पहले से कहीं अधिक वैश्विक सार्वजनिक राय से प्रभावित होता है।


सुरक्षा(Security)

सुरक्षा राजनीति में सबसे गहरी और स्थायी समस्या है। इसका मूल प्रश्न है कि लोग बिना किसी खतरे, धमकी या हिंसा के एक सम्मानजनक और मूल्यवान जीवन कैसे जी सकते हैं? सुरक्षा को आमतौर पर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में एक विशेष रूप से दबावपूर्ण मुद्दा माना जाता है।  एक संप्रभु राज्य के अस्तित्व के कारण  घरेलू क्षेत्र स्थिर और व्यवस्थित होता है जबकि अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र अराजक, खतरनाक और अस्थिर होता है। यथार्थवादियों के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली में सबसे महत्वपूर्ण अभिनेता राज्य हैं, इसलिए सुरक्षा को मुख्य रूप से 'राष्ट्रीय' सुरक्षा के संदर्भ में समझा जाता है।आत्म-सहायता की दुनिया में सभी राज्य कम से कम संभावित रूप से सभी अन्य राज्यों से खतरे में होते हैं, प्रत्येक राज्य को आत्म-रक्षा की क्षमता होनी चाहिए। इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा सैन्य शक्ति पर जोर देती है, जो यह दर्शाता है कि  एक राज्य  जितना अधिक सैन्य रूप से शक्तिशाली एक राज्य होगा, उतना ही अधिक सुरक्षित होने की संभावना है। 

हालांकि, सैन्य सुरक्षा पर यह ध्यान राज्यों  को एक-दूसरे के साथ गतिशील, प्रतिस्पर्धी संबंधों में खींच लेता है जिसे सुरक्षा दुविधा (security dilemma) कहा जाता है। यह समस्या है कि एक राज्य द्वारा रक्षा उद्देश्यों के लिए किया गया सैन्य निर्माण हमेशा अन्य राज्यों द्वारा संभावित या वास्तव में आक्रामक के रूप में व्याख्यायित किया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप प्रतिशोधात्मक सैन्य निर्माण और इसी तरह यह क्रम चलता रहता है। सुरक्षा दुविधा राज्य के बीच राजनीति के मूल तक पहुँचती है जिससे यह अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की प्रमुख दुविधा बन जाती  है (Booth और Wheeler 2008)। इसलिए, राज्य के बीच और राज्य के भीतर स्थायी असुरक्षा उन लोगों के लिए अपरिहार्य भाग्य है जो अराजकता की स्थिति में रहते हैं।


हालाँकि, राष्ट्रीय सुरक्षा और एक अपरिहार्य सुरक्षा दुविधा के राज्य-केंद्रित विचारों को भी चुनौती दी गई है। उदाहरण के लिए, उदारवादी सिद्धांत में सामूहिक सुरक्षा पर एक लंबे समय से  जोर है कि  आक्रमण को सबसे अच्छे तरीके से कई राज्यों द्वारा किए गए संयुक्त प्रयासों/ एकजुट कार्यवाही(United Action) के माध्यम से प्रतिरोधित किया जा सकता है। ऐसा दृष्टिकोण 'राष्ट्रीय' सुरक्षा के विचार से ध्यान हटा कर 'अंतर्राष्ट्रीय' सुरक्षा(international’ security)' के व्यापक विचार की ओर मुड़ता है (Smith 2010)। 


इसके अलावा, आधुनिक वैश्विक राजनीति में सुरक्षा एजेंडा कई तरीकों से बदला है। इनमें से एक ओर तो  'शांति के क्षेत्रों' का विस्तार है, जहाँ सुरक्षा दुविधा द्वारा निहित तनाव और प्रारंभिक संघर्ष अनुपस्थित प्रतीत होते हैं। इस प्रकार, 'सुरक्षा व्यवस्थाएँ(security regimes)' या 'सुरक्षा समुदाय(security communities)' विकसित हुए हैं ताकि विवादों का प्रबंधन किया जा सके और युद्ध से बचने में मदद की जा सके, जो अक्सर बढ़ती आर्थिक आपसी निर्भरता (जो वैश्वीकरण से जुड़ी है) और लोकतंत्रीकरण की प्रगति से जुड़ी होती है। 
दूसरी ओर 11 सितंबर 2001 और आतंकवाद के व्यापक खतरे ने नए सुरक्षा चुनौतियों के उदय को उजागर किया है, जो विशेष रूप से समस्याग्रस्त हैं क्योंकि वे गैर-राज्य कर्ताओं से उत्पन्न होती हैं और आधुनिक दुनिया की बढ़ी हुई आपसी जुड़ाव का फायदा उठाती हैं। इसलिए, अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा ने 'वैश्विक' सुरक्षा को स्थान ले लिया है। एक और विकास 'सुरक्षा' की अवधारणा को एक गहरे स्तर पर फिर से सोचने की प्रवृत्ति रही है, जो आमतौर पर 'मानवीय सुरक्षा(human security)' के विचार से जुड़ी है। मानव सुरक्षा में रुचि इसलिए बढ़ी है क्योंकि शीत युद्ध के बाद अंतर-राज्य युद्ध(inter-state war) में कमी आई है। इसका मतलब है कि अब हिंसक संघर्ष से उत्पन्न खतरे अक्सर राज्यों के भीतर होते हैं, जो गृह युद्ध(civil war), विद्रोह और नागरिक संघर्ष से आते हैं। इस कारण  यह स्वीकार जाने लगा है कि आधुनिक दुनिया में लोगों की सुरक्षा और जीवित रहने का जोखिम अक्सर गैर-सैन्य खतरे (जैसे पर्यावरणीय विनाश, बीमारी, शरणार्थी संकट और संसाधन की कमी) से अधिक होता है, न कि सैन्य खतरों से।

सुरक्षा दुविधा(Security dilemma):–

सुरक्षा दुविधा एक ऐसी स्थिति का वर्णन करती है, जिसमें एक अभिनेता द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा को बेहतर बनाने के लिए उठाए गए कदमों को अन्य अभिनेता आक्रामक रूप से समझते हैं, जिससे सैन्य प्रतिक्रिया की आवश्यकता उत्पन्न होती है। इसमें दो घटक दुविधाएँ होती हैं (Booth और Wheeler 2008)। 
पहली, व्याख्या की दुविधा - अन्य लोगों के सैन्य शक्ति बढ़ाने के इरादे, उद्देश्य और क्षमताएँ क्या हैं? चूंकि हथियार स्वाभाविक रूप से अस्पष्ट प्रतीक होते हैं (वे रक्षा या आक्रामक दोनों हो सकते हैं), इसलिए इन मुद्दों को लेकर अनिर्णय रहता है। 
दूसरी, प्रतिक्रिया की दुविधा - क्या उन्हें उसी प्रकार प्रतिक्रिया करनी चाहिए, सैन्य रूप से टकरावपूर्ण तरीके से, या उन्हें आश्वासन देने के संकेत देने और तनाव को कम करने का प्रयास करना चाहिए? यहाँ पर गलत धारणाएँ या तो अनचाहे शस्त्रों की दौड़  कारण बन सकती हैं या राष्ट्रीय आपदा का।

अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा:-

वह स्थितियाँ जिनमें राज्यों की आपसी अस्तित्व और सुरक्षा को आक्रमण को रोकने या दंडित करने के उपायों को एक नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के भीतर के माध्यम से सुनिश्चित करते हैं।

सुरक्षा शासन:-

राज्यों और अन्य अभिनेताें के बीच सहयोग का एक ढांचा, जो संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान को सुनिश्चित करने के लिए होता है।


11 सितंबर और वैश्विक सुरक्षा

घटनाएँ: 11 सितंबर 2001 की सुबह, अमेरिका के खिलाफ एक समन्वित आतंकवादी हमलों की श्रृंखला की शुरुआत की गई थी, जिसमें चार हाईजैक किए गए यात्री विमान उपयोग किए गए थे (इन घटनाओं को बाद में 11 सितंबर, या 9/11 के नाम से जाना गया)। दो विमान न्यू यॉर्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के ट्विन टावर्स में दुर्घटनाग्रस्त हो गए, जिसके परिणामस्वरूप पहले नॉर्थ टावर और फिर साउथ टावर गिर गए। तीसरा विमान पेंटागन में दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जो कि वाशिंगटन डीसी के बाहर वर्जीनिया में रक्षा विभाग का मुख्यालय है। चौथा विमान, जिसे माना जाता है कि वह व्हाइट हाउस या यूएस कैपिटल की ओर जा रहा था, वाशिंगटन डीसी में, शैंक्सविल, पेंसिल्वेनिया के पास एक खेत में दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जब विमान में सवार यात्रियों ने विमान पर नियंत्रण लेने की कोशिश की। इन हमलों में किसी भी विमान से कोई भी जीवित नहीं बचा। इन हमलों में कुल 2,995 लोग मारे गए, जिनमें से अधिकांश न्यू यॉर्क सिटी में थे। अक्टूबर 2001 में जारी एक वीडियो टेप में, इन हमलों की जिम्मेदारी अल-कायदा संगठन के प्रमुख ओसामा बिन लादेन ने ली, जिन्होंने अपने अनुयायियों को 'इस्लाम के अग्रदूत' के रूप में सराहा।

11 सितंबर को कभी-कभी 'वह दिन जिसे दुनिया ने बदला(the day the world changed)' कहा जाता है। यह निश्चित रूप से इसके परिणामों के संदर्भ में लागू होता है, विशेष रूप से 'आतंकवाद के खिलाफ युद्ध(war on terror’)' के उद्घाटन और अफगानिस्तान और इराक पर आक्रमणों और उनके परिणामों के संदर्भ में। इसने वैश्विक सुरक्षा में भी एक नाटकीय बदलाव को चिह्नित किया, जिससे यह संकेत मिला कि एक ऐसे समय का अंत हो गया था, जब वैश्वीकरण और महाशक्ति प्रतिस्पर्धा का समापन अंतरराष्ट्रीय संघर्ष की संभावना को घटित करता था। 

वास्तव में, वैश्वीकरण ने नई सुरक्षा धमकियों और संघर्षों के नए रूपों को जन्म दिया। उदाहरण के लिए, 9/11 ने यह दिखा दिया कि एक तकनीकी युग में राष्ट्रीय सीमाएँ कितनी नाजुक हो गई थीं। अगर दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति को उसकी सबसे बड़ी शहर और राष्ट्रीय राजधानी में ऐसा विनाशकारी आघात दिया जा सकता है, तो अन्य राज्यों के पास क्या संभावना हो सकती थी? इसके अलावा, इस मामले में 'बाहरी' खतरा किसी अन्य राज्य से नहीं था, बल्कि एक आतंकवादी संगठन से था, और वह भी एक ऐसा संगठन जो एक राष्ट्रीय-आधारित संगठन की बजाय एक वैश्विक नेटवर्क के रूप में काम करता था। 

हमलों के पीछे की प्रेरणाएँ भी पारंपरिक नहीं थीं। भौगोलिक क्षेत्र को जीतने या संसाधनों पर नियंत्रण प्राप्त करने के बजाय, 9/11 के हमले एक धार्मिक रूप से प्रेरित विचारधारा, मिलिटेंट इस्लामिज़्म के नाम पर किए गए थे, और पश्चिम की सांस्कृतिक, राजनीतिक और वैचारिक प्रभुत्व के खिलाफ एक प्रतीकात्मक, यहां तक कि मानसिक, आघात पहुंचाने का लक्ष्य था। इससे कुछ लोगों ने इसे 'सभ्यता का संघर्ष' के रूप में देखा। यहां तक कि इस्लाम और पश्चिम के बीच संघर्ष के रूप में।


हालांकि, 9/11 को वैश्विक सुरक्षा में एक नए युग की शुरुआत के रूप में देखने के बजाय, यह शायद 'सामान्य व्यापार(business as normal)' की ओर लौटने का संकेत था। विशेष रूप से, एक वैश्विक दुनिया का आगमन इस बात को रेखांकित करता हुआ प्रतीत होता था कि 'राष्ट्रीय' सुरक्षा की तुलना में 'अंतर्राष्ट्रीय' या 'वैश्विक' सुरक्षा अधिक महत्वपूर्ण है। 

नए सुरक्षा चुनौतियों का उदय, और विशेष रूप से ट्रांसनेशनल आतंकवाद(transnational terrorism), ने राज्य के महत्वपूर्ण भूमिका को फिर से मजबूती से रेखांकित किया। इसके बजाय कि यह धीरे-धीरे कम महत्वपूर्ण हो, 9/11 ने राज्य को एक नई महत्ता दी। उदाहरण के लिए, अमेरिका ने 9/11 का जवाब घर में (मजबूत 'होमलैंड सुरक्षा' के माध्यम से) और विदेश में (अफगानिस्तान और इराक पर आक्रमण और सैन्य खर्च में वृद्धि के माध्यम से) राज्य शक्ति का एक महत्वपूर्ण निर्माण किया।
 
एकतरफा नीति की प्रवृत्ति भी इसके विदेश नीति में अधिक स्पष्ट हो गई, क्योंकि अमेरिका, कम से कम एक समय के लिए, विभिन्न प्रकार के अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ या उनके माध्यम से काम करने की चिंता कम कर दी  और आंतकवाद की और ध्यान देने लगा। आतंकवाद से प्रभावित अन्य देशों ने भी समान प्रवृत्तियाँ प्रदर्शित की हैं, जो कभी-कभी नागरिक स्वतंत्रताओं और राजनीतिक स्वतंत्रता जैसे विचारों की कीमत पर राष्ट्रीय सुरक्षा पर फिर से जोर देती हैं। भारत ने भी अंतकवाद के अच्छे और बुरे के रूप में न देखने की बजाय केवल आंतकवाद के रूप में देखने का समर्थन किया। दूसरे शब्दों में, 9/11 यह दिखा सकता है कि राज्य-आधारित शक्ति राजनीति अभी भी जीवित और प्रासंगिक है।



न्याय(Justice):-

यथार्थवादी सिद्धांतकारों ने पारंपरिक रूप से न्याय को अंतरराष्ट्रीय या वैश्विक राजनीति में एक हद तक अप्रासंगिक मुद्दा माना है। राज्यों के बीच संबंधों को राष्ट्रीय हित(national interest) से संबंधित कठोर निर्णयों द्वारा निर्धारित किया जाना चाहिए, न कि नैतिक विचारों द्वारा। 

इसके विपरीत, उदारवादी यह जोर देते हैं कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति और नैतिकता को साथ-साथ चलना चाहिए, क्योंकि नैतिकता से रहित शक्ति राजनीति आत्मकेंद्रितता, संघर्ष और हिंसा का कारण बनती है। 

हालांकि, पारंपरिक रूप से उन्होंने 'अंतरराष्ट्रीय' न्याय के विचार का समर्थन किया है, जो उन सिद्धांतों पर आधारित है जो बताते हैं कि राष्ट्र-राज्यों को एक-दूसरे के प्रति किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए। राज्य की संप्रभुता का सम्मान और अन्य राज्यों के मामलों में हस्तक्षेप न करने का सिद्धांत, जिसे राष्ट्रीय स्वतंत्रता के रूप में जाना जाता है।  इसलिए इसे राजनीतिक स्वतंत्रता की गारंटी के रूप में देखा जाता है। इस प्रकार की सोच 'न्यायपूर्ण युद्ध सिद्धांत(just war’ theory)' में भी परिलक्षित होती है। इस सिद्धांत के अनुसार  युद्ध के माध्यम से हिंसा का उपयोग केवल तब ही सही ठहराया जा सकता है यदि युद्ध के कारण और युद्ध का संचालन दोनों न्याय के सिद्धांतों के अनुसार हों।


हालाँकि, आपसी संबंध और परस्पर निर्भरता की वृद्धि ने वैश्विक मामलों में नैतिकता के बारे में सोच को विस्तार दिया है, विशेष रूप से 'वैश्विक' या 'महानगरीय/cosmopolitan ' न्याय की अवधारणा पर बढ़ते जोर के माध्यम से। 

वैश्विक न्याय का विचार सार्वभौमिक नैतिक मूल्यों(universal moral values) में विश्वास पर आधारित है, जो दुनिया के सभी लोगों पर लागू होते हैं, चाहे उनकी राष्ट्रीयता और नागरिकता कुछ भी हो। सार्वभौमिक मूल्यों का सबसे प्रभावशाली उदाहरण अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों का सिद्धांत है। 

इस प्रकार का cosmopolitanism वैश्विक वितरण न्याय के मुद्दे पर सोच को आकार देता है, जो उदाहरण स्वरूप यह सुझाता है कि समृद्ध देशों को अधिक विदेशी सहायता देनी चाहिए तथा  दुनिया के समृद्ध और गरीब देशों के बीच संपत्ति का संभवतः महत्वपूर्ण पुनर्वितरण होना चाहिए।

उपयोगितावादी दार्शनिक पीटर सिंगर (1993) ने तर्क किया कि समृद्ध देशों के नागरिकों और सरकारों का यह बुनियादी कर्तव्य है कि वे अन्य देशों में निरंकुश गरीबी को समाप्त करें, क्योंकि (1) यदि हम तुलनीय महत्व की किसी चीज का त्याग किए बिना कुछ बुरा होने से रोक सकते हैं, तो हमें ऐसा करना चाहिए और  (2) पूर्ण गरीबी(absolute poverty) बुरी है क्योंकि यह पीड़ा और मृत्यु का कारण बनती है। 



पोग्गे/Pogge (2008) के अनुसार, समृद्ध देशों का गरीब देशों की मदद करने का कर्तव्य केवल गरीबी के अस्तित्व और उसे कम करने की हमारी क्षमता से नहीं, बल्कि समृद्धों की संपत्ति और गरीबों की गरीबी के बीच के कारणात्मक संबंध से उत्पन्न होता है। 
समृद्धों का गरीबों की मदद करने का कर्तव्य इसलिए है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था इस प्रकार संरचित है कि यह कुछ लोगों और क्षेत्रों को दूसरों की कीमत पर लाभ पहुँचाती है। इसी प्रकार के विचार वैश्विक गरीबी पर उपनिवेशवाद और विश्व-प्रणाली सिद्धांतों में निहित हैं। इसी तरह, वैश्विक पर्यावरणीय न्याय पर विचार किए गए हैं। ये उदाहरण स्वरूप, भविष्य पीढ़ियों के लाभ के लिए प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए समृद्ध देशों की अनुपातहीन जिम्मेदारी (क्योंकि उन्होंने पहले स्थान पर इस समस्या को उत्पन्न किया था), और यह विचार कि किसी भी कानूनी रूप से बाध्यकारी उत्सर्जन लक्ष्यों को देश के बजाय प्रति व्यक्ति आधार पर संरचित किया जाना चाहिए, ताकि बड़ी जनसंख्या वाले राज्यों (और इसलिए विकासशील देशों) को नुकसान न हो।






कॉस्मोपॉलिटनिज़म(Cosmopolitanism):-

कॉस्मोपॉलिटनिज़म का शाब्दिक अर्थ है 'कॉसमोपोलिस' या 'विश्व राज्य' में विश्वास। नैतिक कॉस्मोपॉलिटनिज़म वह विश्वास है कि दुनिया एकल नैतिक समुदाय बनाती है, जिसमें लोगों के पास (संभावित रूप से) दुनिया के सभी अन्य लोगों के प्रति दायित्व होते हैं, चाहे वह राष्ट्रीयता, धर्म, जातीयता आदि कुछ भी हो। सभी प्रकार के नैतिक कॉस्मोपॉलिटनिज़म इस विश्वास पर आधारित होते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति समान नैतिक मूल्य का है, जो आमतौर पर मानवाधिकारों के सिद्धांत से जुड़ा होता है। राजनीतिक कॉस्मोपॉलिटनिज़म (जिसे कभी-कभी 'कानूनी' या 'संस्थागत' कॉस्मोपॉलिटनिज़म कहा जाता है) वह विश्वास है कि वैश्विक राजनीतिक संस्थाएँ होनी चाहिए, और शायद एक विश्व सरकार। हालांकि, अधिकांश आधुनिक राजनीतिक कॉस्मोपॉलिटन यह पसंद करते हैं कि सत्ता वैश्विक, राष्ट्रीय और स्थानीय स्तरों के बीच विभाजित हो (ब्राउन और हेल्ड 2010)।



सारांश:-

वैश्विक राजनीति एक व्यापक दृष्टिकोण पर आधारित है जो विश्व मामलों को केवल वैश्विक स्तर पर ही नहीं, बल्कि सभी स्तरों - वैश्विक, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय, उप-राष्ट्रीय आदि - पर ध्यान में रखते हुए देखता है। इस अर्थ में, 'वैश्विक' और 'अंतरराष्ट्रीय' एक-दूसरे को पूरक बनाते हैं और इन्हें प्रतिद्वंद्वी या असंगत समझने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

'अंतरराष्ट्रीय' राजनीति को 'वैश्विक' राजनीति में विभिन्न विकासों के माध्यम से रूपांतरित किया गया है। राज्य और राष्ट्रीय सरकारों के साथ-साथ विश्व मंच पर नए अभिनेता उभरे हैं। विश्व राजनीति में आपसी संबंध और परस्पर निर्भरता का स्तर बढ़ा है, हालांकि यह असमान रूप से हुआ है। और अंतरराष्ट्रीय अराजकता को क्षेत्रीय और वैश्विक शासन के ढांचे के उदय के द्वारा संशोधित किया गया है।

वैश्वीकरण वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से आपसी संबंधों का एक जटिल जाल बनता है, जिसका अर्थ है कि हमारी ज़िंदगियाँ उन घटनाओं और निर्णयों से प्रभावित हो रही हैं जो हमसे बहुत दूर होती हैं। आर्थिक वैश्वीकरण, सांस्कृतिक वैश्वीकरण और राजनीतिक वैश्वीकरण के बीच सामान्यत: अंतर किए जाते हैं। हालांकि, इस बारे में महत्वपूर्ण बहसें हैं कि क्या वास्तव में वैश्वीकरण हो रहा है और इसने वैश्विक राजनीति को कितना बदला है।

• वैश्विक राजनीति पर दो मुख्यधारा दृष्टिकोण रियलिज़्म और लिबरलिज़्म हैं; ये दोनों पॉजिटिविज़्म पर आधारित हैं और राज्य संबंधों में संघर्ष और सहयोग के बीच संतुलन पर ध्यान केंद्रित करते हैं, हालांकि ये इस संतुलन का वर्णन करने में काफी भिन्न दृष्टिकोण पेश करते हैं। इसके विपरीत, आलोचनात्मक सिद्धांत आमतौर पर पोस्ट-पॉजिटिविस्ट दृष्टिकोण अपनाते हैं और हाशिए पर या शोषित समूहों के हितों के साथ जुड़कर वैश्विक status quo को चुनौती देते हैं।

वैश्विक राजनीति एक हमेशा बदलती हुई क्षेत्र है, जिसमें समय के साथ परिवर्तन की गति तेज़ होती जा रही है। शक्ति की बदलती प्रकृति और वैश्विक शक्ति के बदलते स्वरूप, क्या राष्ट्रीय सुरक्षा को अंतरराष्ट्रीय, वैश्विक या यहां तक कि मानव सुरक्षा ने विस्थापित कर दिया है, और अब न्याय को कॉस्मोपॉलिटन या वैश्विक दृष्टिकोण से कैसे देखा जाना चाहिए, इस पर बहसें उठी हैं।


महत्वपूर्ण चर्चा के विषय:-

1. 'वैश्विक' राजनीति 'अंतरराष्ट्रीय' राजनीति से किस प्रकार अलग है? 


वैश्विक राजनीति में विश्व स्तर पर होने वाली घटनाएँ और निर्णय शामिल होते हैं, जो देशों के भीतर और उनके बीच प्रभाव डालते हैं। इसमें न केवल राष्ट्र-राज्य शामिल होते हैं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय संगठन, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और अन्य गैर-राज्य अभिनेता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जबकि, 'अंतरराष्ट्रीय' राजनीति में मुख्य रूप से देशों के बीच संबंधों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।

2. राजनीति के अंतरराष्ट्रीय आयाम का महत्व अब भी किस हद तक है? 


अंतरराष्ट्रीय राजनीति का महत्व इसलिए बना हुआ है क्योंकि वैश्विक मुद्दों पर देशों के बीच सहयोग और प्रतिस्पर्धा की आवश्यकता है, जैसे युद्ध, आतंकवाद, मानवाधिकार, जलवायु परिवर्तन आदि। राज्यों के बीच संवाद, समझौते और कूटनीतिक रिश्ते अब भी महत्वपूर्ण हैं।

3. गैर-राज्य अभिनेता (non-state actors) कितनी हद तक राज्य और राष्ट्रीय सरकारों को वैश्विक मंच पर चुनौती देने लगे हैं? 

गैर-राज्य अभिनेता जैसे कि अंतर्राष्ट्रीय संगठन, एनजीओ, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, और आतंकवादी संगठन राज्य और राष्ट्रीय सरकारों के प्रभाव को चुनौती देते हैं। ये संगठन वैश्विक राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जैसे कि वैश्विक आर्थिक निर्णय, मानवाधिकार मुद्दे, और सैन्य संघर्ष में हस्तक्षेप।

4. क्या परस्पर निर्भरता हमेशा सहयोग और शांति की ओर ले जाती है, या यह संघर्ष उत्पन्न कर सकती है? 

परस्पर निर्भरता आम तौर पर सहयोग को बढ़ावा देती है, क्योंकि देशों को एक-दूसरे के साथ मिलकर समस्याओं को हल करने की आवश्यकता होती है। लेकिन यह संघर्ष भी उत्पन्न कर सकती है, जैसे आर्थिक असमानताओं और वैश्विक व्यापार में गड़बड़ी के कारण।

5. वैश्वीकरण की कौन सी परिभाषा सबसे अधिक प्रासंगिक है, और क्यों? 

वैश्वीकरण को एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसमें दुनिया के विभिन्न हिस्सों के बीच अधिक आपसी संबंध और निर्भरता बढ़ती है। यह परिभाषा सबसे अधिक प्रासंगिक है क्योंकि यह केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, राजनीतिक और तकनीकी संदर्भों को भी शामिल करती है।

6. क्या वैश्वीकरण का प्रभाव और महत्व बढ़ा-चढ़ा कर बताया गया है? 

कुछ आलोचक मानते हैं कि वैश्वीकरण का प्रभाव बढ़ा-चढ़ा कर बताया गया है, क्योंकि इसका प्रभाव विशेष रूप से विकासशील देशों में उतना स्पष्ट नहीं होता जितना विकसित देशों में। हालांकि, वैश्वीकरण के कई पहलू हैं जो विकासशील देशों में भी महत्वपूर्ण हैं, जैसे व्यापार और सूचना प्रौद्योगिकी का विस्तार।

7. वैश्विक राजनीति के मुख्यधारा और आलोचनात्मक दृष्टिकोणों में क्या मुख्य अंतर हैं? 

मुख्यधारा दृष्टिकोण, जैसे रियलिज़म और लिबरलिज़म, राज्य और राष्ट्रीय हितों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जबकि आलोचनात्मक दृष्टिकोण, जैसे मार्जिनलिज़्ड ग्रुप्स के पक्ष में, वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देते हैं और इसका उद्देश्य समाज में असमानताओं को खत्म करना होता है।

8. रियलिस्ट और लिबरल सिद्धांतिकों के बीच किस विषय पर असहमति है? 

रियलिस्ट सिद्धांतिकों का मानना है कि राज्य अपने राष्ट्रीय हितों के लिए संघर्ष करते हैं और वैश्विक राजनीति में शक्ति का संघर्ष होता है, जबकि लिबरल सिद्धांतिकों का मानना है कि सहयोग, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और नियम वैश्विक शांति और सहयोग में मदद कर सकते हैं।

9. हाल के वर्षों में वैश्विक शक्ति किस हद तक अधिक विभाजित और अमूर्त (diffuse and intangible) हो गई है? 

वैश्विक शक्ति अब अधिक विभाजित हो चुकी है, क्योंकि पारंपरिक सुपरपावर जैसे अमेरिका के प्रभाव के अलावा, चीन, भारत और रूस जैसे उभरते देशों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी शुरू कर दी है। साथ ही, वैश्विक बाजारों, प्रौद्योगिकी, और सूचनाओं के फैलाव ने शक्ति को अधिक अमूर्त बना दिया है।

10. 'मानव' सुरक्षा की धारणा में बढ़ती रुचि क्यों है? 

मानव सुरक्षा का मतलब केवल सैन्य सुरक्षा नहीं है, बल्कि इसमें नागरिकों की व्यक्तिगत सुरक्षा, आर्थिक अवसर, और जीवन की गुणवत्ता शामिल है। वैश्विक मुद्दों जैसे गरीबी, असमानता, जलवायु परिवर्तन, और मानवीय संकटों के कारण यह अवधारणा महत्वपूर्ण हो गई है।

11. क्या 'वैश्विक' न्याय का विचार समझ में आता है? 

वैश्विक न्याय का विचार उस समय समझ में आता है जब हम मानते हैं कि सभी लोगों को समान अधिकार मिलना चाहिए, चाहे वे किसी भी देश, जाति, या धर्म से हों। इसके अनुसार, अमीर देशों को गरीब देशों की मदद करनी चाहिए और जलवायु परिवर्तन, गरीबी, और युद्ध से प्रभावित देशों को न्याय मिलना चाहिए।

12. 'वैश्विक राजनीति' से क्या तात्पर्य है?

वैश्विक राजनीति का अर्थ है विश्व के विभिन्न देशों और उनके बीच की राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संबंधों का अध्ययन। यह न केवल वैश्विक स्तर पर होने वाली घटनाओं को, बल्कि विभिन्न स्तरों - जैसे राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और उप-राष्ट्रीय - को भी ध्यान में रखता है।


13. अंतरराष्ट्रीय राजनीति किस प्रकार वैश्विक राजनीति में परिवर्तित हो गई है?

अंतरराष्ट्रीय राजनीति को वैश्विक राजनीति में परिवर्तित करने वाले कई कारक हैं, जिनमें वैश्वीकरण, नए गैर-राज्य अभिनेताओं का उदय, और देशों के बीच बढ़ती आपसी निर्भरता शामिल हैं। इसके अलावा, क्षेत्रीय और वैश्विक शासन की प्रणालियों का विकास भी इस परिवर्तन का हिस्सा रहा है।


14. विश्व राजनीति के लिए वैश्वीकरण के क्या प्रभाव रहे हैं?

वैश्वीकरण ने विश्व राजनीति को जटिल और अधिक आपस में जुड़ा हुआ बना दिया है। इसने आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्तर पर देशों को एक-दूसरे से अधिक जोड़ा है, जिससे घटनाएं और निर्णय जो दूर-दराज के देशों में होते हैं, उनका प्रभाव पूरे विश्व पर पड़ता है। हालांकि, इससे कुछ सकारात्मक परिणाम भी हुए हैं, जैसे व्यापार और संवाद में वृद्धि, लेकिन वैश्वीकरण ने कुछ चुनौतियाँ भी उत्पन्न की हैं, जैसे आर्थिक असमानताएँ और सांस्कृतिक संघर्ष।


15. वैश्विक राजनीति के मुख्यधारा दृष्टिकोण और आलोचनात्मक दृष्टिकोण में क्या अंतर है?

मुख्यधारा दृष्टिकोण (जैसे रियलिज्म और लिबरलिज़म) सामान्यत: राज्य और राष्ट्रीय हितों पर केंद्रित होते हैं, जबकि आलोचनात्मक दृष्टिकोण (जैसे समालोचनात्मक सिद्धांत) वैश्विक व्यवस्था के असमानताओं और उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाते हैं। आलोचनात्मक दृष्टिकोण समाज के हाशिये पर पड़े वर्गों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ते हैं और सामान्यत: वैधानिक और शक्ति के वितरण के मुद्दों पर जोर देते हैं।


16. हाल के वर्षों में शक्ति, सुरक्षा और न्याय के संदर्भ में वैश्विक राजनीति कैसे बदली है?

हाल के वर्षों में, वैश्विक राजनीति में शक्ति का संतुलन अधिक वितरित और अमूर्त (diffuse) हुआ है, और कई नए अभिनेता जैसे चीन, भारत, और ब्राजील ने महत्वपूर्ण भूमिका निभानी शुरू की है। सुरक्षा के मुद्दे में 9/11 के बाद आतंकवाद और गैर-राज्य अभिनेताओं से उत्पन्न नए खतरे उभरे हैं। न्याय के संदर्भ में, वैश्विक और मानवाधिकार आधारित न्याय की अवधारणाएँ अधिक महत्वपूर्ण हो गई हैं, जिससे "वैश्विक न्याय" की सोच का उदय हुआ है।



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