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राजस्थान की सांस्कृतिक परम्परा : एक परिचय

  राजस्थान की सांस्कृतिक परम्परा : एक परिचय राजस्थानी संस्कृति एक बहता झरना है जो किसी भी निवासी अथवा पर्यटक के मन को उल्लासित एवं तरंगित कर सकता है। राजस्थान में रहने वाले निवासियों का सौभाग्य है कि वे यहाँ की मिट्टी की खुशबू को अनुभूत करते हैं जो भक्ति और शक्ति को स्वयं में समाहित किए हुए है। इस प्रदेश की संस्कृति को जीवंत बनाये रखने का श्रेय यहाँ के जन-सामान्य, राजा-राणा, सामन्त, जागीरदार, कलाविदों-साहित्यकारों, रण-बाँकुरों, शिल्पकारों एवं आश्रयदाताओं आदि सभी को है। उन सबके प्रति आभारी रहना ही रचनात्मकता एवं सांस्कृतिक रचनाधर्मिता से हमारा उऋण होना सम्भव है। राजस्थान के निवासियों ने प्राक् ऐतिहासिक काल से ही अपने मस्तिष्क की प्रतिकृति की छाप काल-खण्ड पर छोड़ी है। कालीबंगा, गणेश्वर, आहड़, नोह आदि स्थानों से प्राप्त सांस्कृतिक अवशेषों को शायद अभिव्यक्ति की जरूरत नहीं है क्योंकि वे स्वयं बोलते हैं। राजस्थान में मानव की विकास यात्रा में सांस्कृतिक वैभव एवं शैल्पिक परम्परा का ख़जाना भरा पड़ा है। यहाँ का इतिहास विविधता के रंग को अपने अंक में समेटे हुए है। राजस्थान की सांस्कृतिक परम्पर...

प्राचीन, मध्यकालीन एवं आधुनिक राजस्थान के इतिहास के प्रमुख स्रोत

 प्राचीन, मध्यकालीन एवं आधुनिक राजस्थान के इतिहास के प्रमुख स्रोत प्रारम्भ से ही भारतीय इतिहास में राजस्थान का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। जब हम स्त्रोतों को आधार बनाकर राजस्थान के इतिहास की चर्चा करते हैं तो यह ऊपरी पायदान पर दिखाई देता है। किसी भी काल का इतिहास लेखन हम प्रामाणिक स्रोतों के बिना नहीं कर सकते हैं। राजस्थान के सन्दर्भ में इतिहास लेखन हेतु पुरातात्विक, साहित्यिक और पुरालेखीय सामग्री के रूप में सभी प्रकार के स्त्रोत उपलब्ध हैं। ये स्त्रोत हमारे वर्तमान ज्ञान के आधार राजस्थान में कालीबंगा, आहड़, गिलूंड, गणेश्वर इत्यादि स्थलों पर सभ्यताएँ पल्लवित एवं पुष्पित होने का चित्र प्रस्तुत करते हैं। इससे पूर्व भी प्रस्तरयुगीन मानव ने बागौर जैसे स्थलों पर सभ्यताओं का निर्माण किया था। स्वतन्त्रता से पूर्व राजस्थान का विशाल प्रदेश अनेक छोटी-बड़ी रियासतों में विभाजित था। इन सभी रियासतों का इतिहास पृथक् पृथक् था और यह इतिहास सामान्यतः उस राज्य के संस्थापक तथा उसके वंश से ही प्रारम्भ होता था और उसमें राजनीतिक घटनाओं तथा युद्धों के विवरण का ही अधिक महत्त्व था। अन्य राज्यों का उल्लेख प्र...

मारवाड़ का राठौड़ वंश

  मारवाड़ का राठौड़ वंश एवं इस वंश के प्रतापी शासक मारवाड़ की उत्पत्ति मारवाड़ शब्द 'मरु' और 'माड' इन दो शब्दों के संयोग से बना है। मरु और माड ये दो देश भिन्न-भिन्न नाम से प्रसिद्ध हैं। जैसलमेर का देश माड और उससे पूर्व का प्रदेश मरु, जिसमें मालानी आदि प्रदेश हैं। मरु और माड इन दोनों देशों की सीमाएँ परस्पर मिली हुई होने से 'मरुमाड' शब्द बना। उसी मरुमाड शब्द का अपभ्रंश रूप 'मारवाड़' है। जैसे 'मेदपाट' शब्द का अपभ्रंश 'मेवाड़' हो गया, वैसे 'मरुपाट' का 'मारवाड़' शब्द बन गया। पाट शब्द का अर्थ विस्तार है। मरुपाट अर्थात् मरु देश का विस्तार । संस्कृत भाषा में मारवाड़ देश का नाम मरु मिलता है और इसका अर्थ यह है कि वह देश जिसमें प्राणी जल के अभाव में मर जाय। जिस प्रकार दक्षिणी-पश्चिमी राजस्थान के गुहिलों का शासन मेवाड़ और वागड़ प्रांत में स्थापित हुआ, उसी प्रकार राजस्थान के उत्तरी तथा पश्चिमी भागों में राठौड़ों के राज्य भी स्थापित हुए। मारवाड़ को 'मुरधर' देश भी कहते हैं। 'मुरधर' शब्द मरुधरा का अपभ्रंश है। मरुधरा अर्थ...

गुहिल वंश

⚔️⚔️  गुहिल वंश ⚔️⚔️ उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़ तथा इनके आस-पास का क्षेत्र मेवाड़ कहलाता था। गुहिल वंश ने मुख्यतः मेवाड़ में शासन किया। इस वंश का नामकरण इस वंश के प्रतापी शासक ' गुहिल' के नाम से हुआ। गुहिल वंश की उत्पत्ति और मूल स्थान के बारे में अनेक मत प्रचलित हैं ।  अबुल  फजल इन्हें ईरान के शासक नौशेखाँ से संबंधित करता है, तो  कर्नल टॉड इन्हें वल्लभी के शासकों से संबंधित मानता है,  डी.आर. भण्डारकर   ब्राह्मण वंश का बताते हैं क्योंकि बप्पा के लिए विप्र शब्द का प्रयोग किया गया है, जैसा कि आहड़ (Ātpur) के शिलालेख में उल्लेखित है। वहीं नैणसी आदि रूप में ब्राह्मण व जानकारी से क्षेत्रीय, जबकी गोपीनाथ शर्मा इनके ब्राह्मण होने का मत प्रतिपादित करते हैं।  गुहिल वंश की उत्पत्ति :- डॉ. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा इन्हें सूर्यवंशी मानते हैं जो पुराणों के समय से चले आ रहे हैं। उनके अनुसार राजा गुहदत्त, जो गुहिलोत वंश के आदिपुरुष थे, स्वयं ‘विप्र’ नहीं थे, बल्कि वे आनंदपुर से आए ब्राह्मणों के ‘आनंददाता’ अर्थात् “उनके लिए आनंद देने वाले” थे। आहड़ के ...