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उत्तरकालीन मुगल सम्राट (Later Mughal Emperors)

📑  उत्तरकालीन मुगल सम्राट (Later Mughal Emperors)

1526 ईस्वी में जब बाबर भारत आता है तब भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना होती है और 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु तक मुगल साम्राज्य लगभग पूरे भारत में फैल जाता है ।   औरंगजेब की मृत्यु के बाद जिन 11 बादशाहों ने भारत पर शासन किया उन्हें उत्तरकालीन मुगल बादशाह कहा जाता है। 

औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य बिखरना शुरू हो जाता है । इसी समय अलग-अलग क्षेत्र अपनी स्वायत्तता घोषित कर देते हैं।औरंगजेब की मृत्यु के बादऔरंगजेब के बेटों के बीच जाजाऊ का युद्ध(18 जून, 1708) होता है जिसमें औरंगजेब का सबसे बड़ा बेटा बहादुर शाह प्रथम विजय हो जाता है। आजमशाह तथा उसके दो बेटे ‘बीदर बख़्त‘ तथा ‘वलाजाह’ मारे गये।   2 वर्ष के उत्तराधिकार युद्ध के बाद 63 वर्ष की आयु में यहदिल्ली की गद्दी पर बैठता है ।

उत्तरकालीन    मुगल   सम्राटों   की    सूची (शासनकाल):-

[UPPCS RO/ARO (Pre) 2023 (Cancelled)][RAJ. College Lecturer (History) -24.09.2021]

बहादुरशाह   I

1707-1712 .

जहाँदार शाह

1712-1713 .

फर्रुखशियर

1713-1719 .

रफी उद्-दरजात

1719 ई.

रफी उद् -दौला 

1719

मुहम्मदशाह

1719-1748 .

अहमदशाह

1748-1754 .

आलमगीर-II

1754-1759 .

शाह आलम-II

1759-1806 .

अकबर-II

1806-1837 .

बहादुरशाह जफर

1837-1857 .

     बहादुरशाह   प्रथम(1707-1712 .):- बहादुर शाह प्रथम का जन्म 14 अक्टूबर, सन् 1643 ई. में बुरहानपुर, मध्यप्रदेश में हुआ था[(SSC 10+2 CHSL 16.01.17, 4.15 pm]।  

इनका  मूल    नाम मुअज्जम था[RAJ. College Lecturer (History) -24.09.2021]।   से शाहआलम प्रथम अथवा आलमशाह प्रथम के नाम से भी जाना जाता है। विजय सिंह को आमेर का शासक घोषित किया और इसने आमेर का नाम बदल कर मोमीनाबाद/इस्लामाबाद रखा[RAJ. स्कूल व्याख्याता (इतिहास)-18.10.2022]। इतिहासकार ख़फ़ी ख़ाँ ने कहा है कि, बादशाह राजकीय कार्यों में इतना अधिक लापरवाह था, कि लोग उसे  'शाहे-बेखबर'  कहने लगे थे।    उत्तराधिकार    के    युद्ध     में    गुरु   गोविन्द   सिंह   ने    बहादुरशाह   का    साथ    दिया    था।   एकमात्र मुगल सम्राट थे जिनके पास सैयद की उपाधि थी     बहादुर शाह ने  Policy Of Compromise की नीति अपनाई। राजपूत(आमेर के राजाके साथ) और जाटों(चूड़ामण) के साथ "पॉलिसी आफ सेटलमेंट " अपनाई।   मराठा राजा शाहू को छोड़ दिया। इसी समय मराठों के बीच भी दक्कन में आपसी लड़ाई चल रही थी।  जुल्फिकार ने यह मत रखा कि राज्य में शाहू की वापसी से मराठों में विभाजन हो जाएगा जिसके कारण वे शाही राज्य क्षेत्रों में लूटमार करने में विफल होंगे[EPFO/APFC 2004]।  

 इसने पंजाब में बंदा सिंह बहादुर(सच्चा बादशाह की उपाधि धारण की) के विरुद्ध असफल अभियान किया ।   ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ को मीर बख़्शी बनाया गया। बहादुर शाह प्रथम के शासन काल में दरबार में षड्यन्त्र बढ़ने लगा। बहादु शाह प्रथम शिया था, और उस कारण दरबार में दो दल(ईरानी दल व तुरानी दल) विकसित हो गए थे। ईरानी दल ‘शिया मत’ को मानने वाले थे, जिसमें असद ख़ाँ तथा उसके बेटे जुल्फिकार ख़ाँ जैसे सरदार थे। तुरानी दल ‘सुन्नी मत’ के समर्थक थे, जिसमें ‘चिनकिलिच ख़ाँ तथा फ़िरोज़ ग़ाज़ीउद्दीन जंग जैसे लोग थे। बहादुर शाह प्रथम के दरबार में 1711 में एक डच प्रतिनिधि शिष्टमण्डल ‘जेसुआ केटेलार’ के नेतृत्व में गया। इस शिष्टमण्डल का दरबार में स्वागत किया गया। इस स्वागत में एक पुर्तग़ाली स्त्री ‘जुलियानी‘ की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। उसकी इस भूमिका के लिए उसे ‘बीबी फिदवा’ की उपाधि दी गयी।   

जनवरी 1712 में जब सम्राट लाहौर में थे, तब उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया।26 फ़रवरी, 1712 को बहादुर शाह प्रथम की मृत्यु हो गयी।    11 अप्रैल को उनके शरीर को उनकी विधवा मिहर-परवार और चिन क़िलिच खान की देखरेख में दिल्ली भेजा गया। उन्हें 15 मई को महरौली में मोती मस्जिद (पर्ल मस्जिद) के प्रांगण में दफनाया गया , जिसका निर्माण उन्होंने कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह के पास करवाया था ।    बहादुर शाह प्रथम के चार पुत्र थे-जहाँदार शाह, अजीमुश्शान, रफ़ीउश्शान और जहाँनशाह। मृत्यु के पश्चात् उसके चारों पुत्रों, जहाँदारशाह, अजीमुश्शान, रफ़ीउश्शान और जहानशाह में उत्तराधिकार का युद्ध आरंभ हो गया। फलस्वरूप बहादुरशाह का शव एक मास तक दफनाया नहीं जा सका।

     जहाँदार शाह (1712-1713 ई.):- बहादुरशाह  प्रथम के बाद जहाँदारशाह गद्दी पर बैठा [UPPCS (Pre) Opt. History 2006]

जहांदार शाह मुगल वंश का पहला कठपुतली शासक था, जिसे शक्तिशाली सरदार जुल्फिकार खान ने सिंहासन पर बिठाया था।  इन्होंने अपने शासन में 'लाल कुमारी' नाम की वेश्या को हस्तक्षेप करने का आदेश दे रखा था। इन्हें 'लम्पट मूर्ख' भी कहा जाता था। इसे लम्पट मुर्ख की उपाधि इतिहासकार ‘इरादत खां’ ने प्रदान की।  इसने इजरा नामक राजस्व  प्रणाली चलाई ।  इसने गैर मुसलमानों से जजिया कर हटा दिया।   सैयद बंधुओं की सहायता से जहांडर साह को मारकर फर्सखशियार सत्ता पर बैठता है ।   औरंगजेब के  उत्तराधिकारी के रूप में जहाँदारशाह का का शासन काल सबसे कम रहा। [UPPCS (Pre) Opt. History 1996 ]


  
 
सैयद बंधुओं ने पदच्युत कर दिया और उसके भतीजे फर्रुखसियर ने उसका स्थान लिया ।   जुल्फिकार खान ने वज़ीर का पद ग्रहण किया ।







     सैयद बन्धु (Sayyid Brothers):- उत्तरकालीन मुगल काल के अब्दुल्ला खाँ और हुसैन अली 'सैयद बन्धु' के नाम से जाने जाते थे।  


 हुसैन अली खाँ एवं अब्दुल्ला खाँ को मुगलकालीन इतिहास में 'शासक निर्माता' (King Maker) के रूप में जाना जाता है।  ये लोग हिन्दुस्तानी दल के नेता थे। 






       ●   फर्रुखशियर (1713-1719 .):- इन्हें मुगल वंश का 'घृणित कायर' कहा गया है।   Sayyid Brothers   ने फर्रुखसियर को जहाँदारशाह के विरुद्ध जीत दिलवायी और उसे बादशाह बनाया

फर्रुखसियर ने अब्दुल्ला खाँ को वजीर और हुसैन अली को मीर बख्शी का पद दिया। इस प्रकार   प्रशासन की शक्ति का नियंत्रण इनके हाथों में  चला गया। इन्होंने   धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनायी   और कई जगहों से तीर्थ यात्रा कर हटा दिया। राजपूतों से अच्छे सम्बन्ध एवं जाट चूड़ामन से दोस्ती की। इन्होंने   राजा शाहू के साथ समझौता किया[CDS (II) 2017]। 

अजमेर के खिलाफ अभियान(1713):-मारवाड़ के महाराजा अजीत सिंह ने मारवाड़ी सरदारों के समर्थन से अजमेर पर कब्जा कर लिया और मुगल राजनयिकों को अपने राज्य से निष्कासित कर दिया। फर्रुखसियर ने हुसैन अली खान को उन्हें वश में करने के लिए भेजा। हालांकि, मुगल सम्राट के दरबार में सैयद बंधुओं के विरोधी गुट ने फर्रुखसियर को अजीत सिंह को गुप्त पत्र भेजने के लिए मजबूर किया, जिसमें हुसैन अली खान को हराने पर पुरस्कार का आश्वासन दिया गया था। [जब हुसैन अली खान जोधपुर , जैसलमेर और मेड़ता होते हुए अजमेर की ओर बढ़े , तो अजीत सिंह ने मुगल सेनापति को युद्ध से रोकने की उम्मीद में रेगिस्तान में पीछे हट गए। अजीत सिंह ने मेड़ता में आत्मसमर्पण कर दिया। परिणामस्वरूप, राजपूताना में मुगल सत्ता बहाल हो गई। अजीत सिंह ने अपनी दूसरी बेटी, कुंवारी इंदिरा कंवर का विवाह फर्रुखसियर से कर दिया । उनके बेटे कुंवर अभय सिंह  को उनके बहनोई मुगल सम्राट से मिलने के लिए उनके साथ जाने के लिए विवश किया गया था।

जिसके तहत मराठा क्षेत्र पर राजस्व का अधिकार तथा दक्कन के छः प्रांतों की चौथ और सरदेशमुखी वसूल करने का अधिकार राजा शाहू को दिया    गया।   1715 में जॉन सुरमन के नेतृत्व में एक शिष्टमंडल भारत आया जो 1717  .   में फर्रुखशियर के दरबार पहुँचा। डॉक्टर हैमिल्टन ने बादशाह के जानलेवा घाव का इलाज किया, जिससे खुश होकर उन्होंने अंग्रेजों को व्यापारिक छूट और सिक्के ढालने की अनुमति दी।   मुगल सम्राट फर्रुखसियर ने 1717 ई. के एक फरमान द्वारा अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी को तीन हजार वार्षिक शुल्क के बदले बंगाल में बिना चुंगी दिये व्यापार करने का अधिकार प्रदान कर दिया[MPPSC (Pre) Opt. History 1994][UPPCS (Pre) Opt. History 1995] साथ ही 38 गाँवों को खरीदने की अनुमति एवं बंगाल में शाही मुद्रणालय के उपयोग की अनुमति दी।   इसे 'ईस्ट इंडिया कंपनी का मैग्नाकार्टा' कहा जाता है। इस फरमान के तहत कम्पनी को माल के परिवहन हेतु दस्तक (पास) जारी करने के लिए अधिकृत किया गया था। 1715 में यह बंदा सिंह बहादुर को हरा देता है । 

इसने आसफजहाँ प्रथम को रिटायरमेंट से वापस बुला लिया। इन्हें दक्कन का वायसराय बनाया जाता है और निजाम उल मुल्क की उपाधि दी जाती है।   सैयद बंधु मराठापेशवा बालाजी विश्वनाथ की सहायता से इन्हें हटा दिया जाता है और बाद मेंस इसे अंधा करके मार दिया जाता है ।





मुगलों से स्वतंत्र होने वाले राज्य एवं संस्थापक

क्रम

राज्य

संस्थापक

1

अवध

सआदत खाँ (बुरहान-उल-मुल्क)

2

हैदराबाद

चिनकिलिच खाँ या निजाम-उल-मुल्क आसफ़ जाह

3

रुहेलखंड

वीर दाऊद एवं अली मुहम्मद खाँ

4

बंगाल

मुर्शिदकुली खाँ

5

कर्नाटक

सादुतुल्ला खाँ

6

भरतपुर

चूरामन एवं बदन सिंह


रफी उद दरजात को अपना सिंहासन सैयद हसन अली खान बरहा और सैयद हुसैन अली खान बरहा नामक सैयद बंधुओं की बदौलत मिला था, जिन्होंने 1719 में मारवाड़ के अजीत सिंह और बालाजी विश्वनाथ की मदद से सम्राट फर्रुखसियर को पदच्युत कर दिया था और खुद को बादशाह (राजा निर्माता) घोषित कर दिया था। उनका छोटा सा शासनकाल इन बंधुओं के हाथों की कठपुतली शासक के रूप में ही बीता। शाहजहाँ द्वितीय ने भी सैय्यद भाइयों के नाममात्र के शासक के रूप में कार्य किया। 
 मोहम्मदशाह (मूल नाम – रोशन अख्तर):- सुंदर युवतियों के प्रति रुझान के कारण इन्हें 'रंगीला बादशाह' कहा जाता था। 
बरहा के सैयद भाइयों द्वारा चुने जाने के बाद , उन्होंने उनकी कड़ी निगरानी में 18 वर्ष की कम उम्र में सिंहासन संभाला। मुहम्मद शाह के हस्ताक्षर बाद में उन्होंने निज़ाम-उल-मुल्क, आसफ़ जाह प्रथम की मदद से उनसे छुटकारा पा लिया - सैयद हुसैन अली खान की हत्या 1720 में फतेहपुर सिकरी में कर दी गई और सैयद हसन अली खान बरहा को 1720 में युद्ध में पकड़ लिया गया और 1722 में घातक रूप से जहर देकर मार दिया गया।
ये एक संगीतकार भी थे। मोहम्मदशाह के शासनकाल में ही हैदराबाद के चिनकिलिच खाँ ने निजाम-उल-मुल्क की उपाधि धारण की और 1725 ई. में स्वतंत्र राज्य की स्थापना की।  मोहम्मदशाह ने   उर्दू को राजकीय संरक्षण प्रदान किया[UPPCS (Pre) Opt. History 2002]। उन्होंने शम्सुद्दीन वली को अपने दरबार में बुलाकर उर्दू के विकास के लिए संरक्षण प्रदान किया।

     नादिरशाह का आक्रमण (1739 .): ईरान के सम्राट नादिरशाह (ईरान का नेपोलियन) ने दिल्ली पर आक्रमण किया[SSC MTS/Havaldar–05/09/2023 (Shift-III]।   

नादिरशाह भारत के प्रति यहाँ के अपार धन के कारण आकर्षित हुआ। वह 1738 ई. के अंतिम दिनों में वर्षों से उत्तर-पश्चिम सीमा में सुरक्षा के अभाव के कारण भारत में प्रवेश कर गया। जिस समय नादिरशाह का आक्रमण हुआ उस समय भारत में कमजोर मुगल सम्राट मुहम्मद शाह का शासन था। नादिरशाह और मुहम्मद शाह के मध्य 24   फरवरी   1739 ई. में करनाल के युद्ध में मुगल सेना बुरी तरह पराजित हुई[SSC JE Mechanical - 27/09/2019 (Shift-II)][SSC MTS 19/08/2019][(Shift-I)  (SSC 10+2 CHSL 03.02.17, 1.15 pm]दिल्ली के अयोग्य मुगल शासक, दिल्ली की रक्षा के लिए विलम्ब से तैयारी, उत्तर-पश्चिम सीमांत में मजबूत रक्षा का अभाव    एवं गुटबाजी के कारण नादिरशाह ने दिल्ली में घुसकर भीषण कत्लेआम और लूटपाट की[CDS (II) 2011]। आक्रमणकारी नादिरशाह की सफलता का कारण भारतीय साम्राज्य में आपसी फूट, अयोग्य नेतृत्व और आपसी द्वेष था। 
वह तख्ते ताऊस (मयूर सिंहासन) और कोहिनूर हीरा लेकर वापस लौटा। 'तख्त-ए-ताउस' को मुगल बादशाह शाहजहाँ ने बनवाया था।

     तख्ते ताऊस पर बैठने वाला अंतिम मुगल शासक मोहम्मदशाह था।





●   अहमदशाह(1748-1754 ई.):- अहमदशाह के शासन काल में 1748 ई. में ईरान के शाहअहमदशाह अब्दाली का भातर पर प्रथम आक्रमण हुआ था।


इसके शासन काल में प्रशासन का काम काज हिजड़ों और औरतों के एक गिरोह के हाथों में आ गया, जिसकी मुखिया राजमाता उधमबाई (उपाधि-किबला-ए-आलम) थी।   उसने हिजड़ों के सरदार जाबेद खाँ को ‘नवाब बहादुर’ की उपाधि प्रदान की।   उसे बुरहान-उल-मुल्क के दामाद एवं अवध के सूबेदार ‘सफदरजंग’ को अपना बजीर तथा कमरुद्दीन के लड़के मुइन-उल-मुल्क को पंजाब का सूबेदार बनाया।     अपने ढाई वर्ष के पुत्र मुहम्मद को पंजाब का गर्वनर नियुक्त किया और एक वर्ष के बेटे को उसका डिप्टी बना दिया। इसी प्रकार कश्मीर की गर्वनरी ‘सैय्यद शाह’ नामक एक बच्चे को सौंपी तथा 15 वर्ष के एक लड़के को उसका डिप्टी नियुक्त किया गया। ये नियुक्तयाँ उस समय की गयीं, जब अफ़ग़ान हमलों का ख़तरा बहुत अधिक था।

आलमगीर-II:-   जहाँदारशाह के द्वितीय पुत्र अजीजुद्दीन ने बादशाह बनने पर 'आलमगीर द्वितीय' की उपाधि धारण की[UPPCS (Pre) Spl. Opt. History 2008]। 


इसे वजीर इमाद-उल-मुल्क (गाजीउद्दीन) ने अहमदशाह के स्थान पर बादशाह की गद्दी पर बैठाया था। उसका शासन काल 1754 ई. से 1759 ई. तक था। अपने 5 वर्ष के अल्प शासन काल में यह अपने वजीर इमाद-उल-मुल्क के हाथ का खिलौना बना रहा। इसके समय की प्रमुख दो घटनाएं –

  • ब्लैक होल की घटना (20 जून, 1756 ई.) :- इस घटना का उल्लेख कार्यवाहक बंगाल के गवर्नर जेड हाॅलवेल ने किया था। हाॅलवेल के अनुसार बंगाल के नवाब सिराजुदौला ने 20 जून, 1756 ई. को मुर्शिदाबाद में 18 फीट लम्बी व 14 फीट चौड़ी कोठरी में 146 अंग्रेजों को बंद कर दिया जिसमें पुरूष, महिला व बच्चे शामिल थे।21 जून 1756 ई. को सुबह जब कोठरी को खोल गया तो मात्र 23 लोग जिन्दा बचे।
  • प्लासी का युद्ध (23 जून, 1757 ई.):- पं. बंगाल प्लासी नामक स्थान पर बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला व अंग्रेज सेनापति राबर्ट क्लाइव के बीच लड़ा गया जिसमें नवाब की हार हुई।

     शाह आलम   II(शाहज़ादा अली गौहर:-1759-1806 .):-  वजीर इमाद-उल-मुल्क द्वारा आलमगीर द्वितीय की हत्या के पश्चात् अलीगौहर 'शाहआलम द्वितीय' की उपाधि धारण कर गद्दी पर बैठा।



 बादशाह शाहआलम II के समय एक कहावत प्रचलित हुई कि- "सल्तनत-द-शाहआलम, अज दिल्ली ता पालम” जिसका मतलब था कि शाहआलम का साम्राज्य दिल्ली से पालम तक विस्तृत है[64th BPSC(Pre)-2018-2019]।  परंतु मुगल सम्राट इतना शक्तिहीन हो गया था कि वह 12 वर्षों बाद मराठों की सहायता से ही 1772 ई. में दिल्ली में प्रवेश कर सका[IAS (Pre) G.S. 2003]। शाह आलम द्वितीय के दिल्ली से दूर रहने का कारण रुहेला सरदार नजीबुद्दौला उसके पुत्र जबीता खाँ और पोता गुलाम कादिर का खौफ था, गुलाम कादिर ने 1788 ई. में मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय को अन्धा कर दिया था। साथ ही उत्तरवर्ती मुगल काल में उत्तर-पश्चिम सीमांत में विदेशी आक्रमण का भय सदा बना रहा जो नादिरशाह व अहमदशाह अब्दाली के रूप में समय-समय पर प्रकट भी हुआIAS (Pre) G.S. 2003   इनके शासनकाल में 1803 . में अंग्रेजों ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया।  1806 .   में गुलाम कादिर खाँ ने इनकी हत्या करवा दी।   1764 ई. में उसने अपनी शक्ति बढ़ाने का दूसरा प्रयास किया और बंगाल से अंग्रेज़ों को निकाल बाहर करने के लिए अवध के नवाब शुजाउद्दौला और बंगाल के भगोड़े नवाब मीर क़ासिम से सन्धि कर ली, परन्तु अंग्रेज़ों ने बक्सर की लड़ाई (1764 ई.) में शाही सेना को हरा दिया और बादशाह शाहआलम द्वितीय ने ईस्ट इंडिया कम्पनी से  इलाहाबाद की सन्धि कर ली।     
इलाहाबाद की दूसरी संधि (अगस्त, 1765 ई.) के  अनुसार सम्राट शाह आलम द्वितीय को अंग्रेजी संरक्षण में ले लिया गया तथा उसे इलाहाबाद में रखा गया। इलाहाबाद तथा कड़ा-मानिकपुर के जो जिले अवध के नवाब से लिए गए थे, शाह आलम को मिले। शाह आलम ने अपने 12 अगस्त, 1765 के फरमान द्वारा कंपनी को बंगाल, बिहार व उड़ीसा की दीवानी स्थायी रूप से दे दी[UPPCS (Pre) G.S. 2004][SSC GD 02/12/2021 (Shift-II], जिसके बदले कंपनी सम्राट को 26 लाख रुपये देगी क्लाइव ने सम्राट को पेन्शनर बना लिया तथा वह कम्पनी की रबड़ की मोहर बन गया[UPPSC GIC Lecturer 2021]। सम्राट के फरमान से कम्पनी के राजनैतिक लाभों को कानूनी रूप मिल गया।

अहमदशाह अब्दाली:- इसका वास्तविक नाम अहमद खाँ था। इसने भारत पर 8 बार आक्रमण किया।

     पानीपत का तृतीय युद्ध (1761 .):- 14 जनवरी, 1761   .को अहमद शाह अब्दाली (अफ़ग़ान) और मराठा साम्राज्य (सदाशिव राव भाऊ के नेतृत्व में) के बीच हुआ थाजिसमें मराठों की हार हुई।






      मुगल सम्राट अकबर II (1806-1837 ई.):- शाह आलम द्वितीय के दूसरे पुत्र और बहादुर शाह ज़फ़र के पिता थे। 

  मुगल सम्राट अकबर II   ने 1830 ई. में राजा राममोहन राय को अपने दूत के रुप में ब्रिटिश सम्राट विलियम चतुर्थ के दरबार में लन्दन भेजा था[BPSC(Pre) 2000-01][MPPSC (Pre) G.S. 2009] यह शाह आलम II का पुत्र एवं अंग्रेजों का पेंशनर था। राजा राममोहन राय ने 1803-1814 ई. तक ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन कार्य भी किया था। इंग्लैण्ड में राजा राममोहन राय ब्रिटिश सरकार के समक्ष मुगल बादशाह को दी जाने वाली पेंशन की अपर्याप्त राशि के संदर्भ में अपना पक्ष प्रस्तुत करने गये थे। 27 सितम्बर, 1833 ई. में ब्रिस्टल (इंग्लैण्ड) में ही उनकी मृत्यु हो गई। अकबर II ने ही राम मोहन राय को 'राजा' की उपाधि प्रदान की थी[MPPSC (Pre) G.S. Ist 2017]


     बहादुरशाह-II (जफर):- ये अंतिम मुगल सम्राट थे [राजस्थान पुलिस कॉन्स्टेबल-07.11.2020(II)[SSC GD 25/11/2021 (Shift-I)]  [(SSC 10+2 CHSL 16.01.17, 1.15 pm]।  

उनके पिता का नाम अकबर शाह द्वितीय और मां का नाम लालबाई था।   मुगल बादशाह बहादुरशाह द्वितीय को बहादुरशाह जफर के नाम से भी जाना जाता है।  शासन काल 1837 ई. से 1857 ई. तक था। वह बिना साम्राज्य का बादशाह था। उसके दरबार में उर्दू शायर मिर्जा गालिब एवं इब्राहिम जौक रहते थे। हसन अस्करी उसके आध्यात्मिक निर्देशक थे। उसे ईस्ट इंडिया कंपनी से 1  लाख रूपये पेंशन, 15 लाख रूपये अन्य परिसंपत्तियों के लिए किराया तथा एक हजार रूपये पारिवारिक खर्च हेतु मिलता था[UPPCS (Main) G.S.,Ist 2006]। वर्ष 1857 का विद्रोह बहादुरशाह जफर के नेतृत्व में लड़ा गया था।  जहाँ      1857   .की   क्रांति   के    बाद      बहादुर शाह जफर ने हुमायूं के मकबरे में शरण ली, लेकिन मेजर हडस ने उन्हें उनके बेटे मिर्जा मुगल और खिजर सुल्तान व पोते  अबू बकर   के साथ पकड़ लिया। 
अंग्रेजों ने जुल्म की सभी हदें पार कर दीं। जब बहादुर शाह जफर को भूख लगी तो अंग्रेज उनके सामने थाली में परोसकर उनके बेटों के सिर ले आए। उन्होंने अंग्रेजों को जवाब दिया कि हिंदुस्तान के बेटे देश के लिए सिर कुर्बान कर अपने बाप के पास इसी अंदाज में आया करते हैं।    1857   .की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने इन्हें बंदी बनाकर रंगून भेज दिया[Delhi Police Constable Exam-24.05.2014]।   1 नवंबर 1858 ई. को महारानी विक्टोरिया के घोषणा पत्र समाप्त होने के पश्चात अंग्रेजों द्वारा रंगून जेल में भेज दिया गया[SSC GD 17/11/2021 (Shift-III]।   7 नवम्बर 1862 ई. में एक बंदी के रूप में दम तोड़ा।उन्हें रंगून में श्वेडागोन पैगोडा के नजदीक दफनाया गया। उनके दफन स्थल को अब बहादुर शाह जफर दरगाह के नाम से जाना जाता है। बहादुर शाह-II ‘ जफ़र ’ के नाम से शेरो शायरी करता था। दिल्ली में अंग्रेजों द्वारा जब इसे कैद किया गया तो उस समय उसने लिखा कि–

‘न तो मै किसी की आंख का नूर हूं

न तो किसी के दिल का करार हूं

मैं किसी के काम आ न सका

वो बुझता हुआ चिराग हूं।’

     लाल किला स्थित हीरा महल इन्होंने ही बनवाया था।

     मशहूर शायर मिर्जा गालिब इन्हीं के समय दिल्ली में रहते थे।


'जागीर संकट' के सिद्धान्त:- मुगल साम्राज्य के पतन के लिए 'जागीर संकट' के सिद्धान्त को प्रतिपादित करने वाले प्रथम इतिहासकार सतीश चन्द्र थे[UP UDA/LDA Spl. - 2006]। इतिहासकार सतीश चन्द्र के अनुसार, मुगल साम्राज्य के विघटन का कारण मनसब और जागीरदारी प्रणालियों की असफलता रही है, क्योंकि उनकी दृष्टि में मुगल साम्राज्य की स्थिरता के लिए इन दोनों प्रणालियों का स्पष्ट ढंग से कार्य करते रहना आवश्यक था
         
         तालुकदार:-  कुलीन वर्ग थे जो मुगल शासन तथा ब्रिटिश शासन के दौरान बड़े भूमि के मालिक होते थे[Himachal Pradesh PCS Pre 2018]। ये वंशानुगत होते थे। तालुकदारों को करों को इकट्ठा करने की जिम्मेदारी प्रदान की गई थी। ये बड़े जमींदार होते थे

         
       बेगम समरू (1753-1836):- का वास्तविक नाम फरजाना जेबुन्निसा था। जिन्होंने नृत्यांगना के रूप में अपने जीवन का प्रारम्भ किया। बाद में सरधना (मेरठ के निकट) की प्रशासिका बनी। उनके पति वाल्टर रेनहार्ट सोम्ब्रे थे। उनके द्वारा सरधना में निर्मित चर्च को 'बेसिलिका ऑफ आवर लेडी ऑफ ग्रेस' के नाम से जाना जाता है[UPPCS (Main) G.S. Ist 2012]। उनका देहावसान 1836 में हुआ।


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