📑 भारत में यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियों का आगमन
पुर्तगाली (1498ई.) → डच (1602ई.)→ अंग्रेज़ (1608ई.)→ डेनिश (1616ई.) → फ्रांसीसी (1664ई.)[IAS-2007] [NDA & NA 2022 (II)]
[स्कूल व्याख्याता (इतिहास)-9.1.20] [स्कूल व्याख्याता (संस्कृत शिक्षा) इतिहास - 18.11.2024]
कंपनियों की स्थापना का वर्ष निम्नानुसार हैं:-
1. एस्तादो द इंडिया (पुर्तगीज कंपनी)→ 1498 ई.
2. वेरिंग दे ओस्ट इंडिशे कंपनी (डच ईस्ट इंडिया कंपनी)→1602 ई.
3. दि गवर्नर एंड कंपनी ऑफ मर्चेन्ट्स ऑफ ट्रेडिंग इन टू द ईस्ट इंडीज (अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी)→1600 ई. [राजस्थान पुलिस कॉन्स्टेबल-06 11.2020 (1)]
4. डेन ईस्ट इंडिया कंपनी→ 1616 ई.
5. कंपनी देस इंदसे ओरियंटलेस(फ्रांसीसी)→ 1664 ई. [Assist. Professor (History-II) (Sans. Edu)- 12.9.2024][IAS-2007]
यूरोपीय कंपनियों की प्रथम फैक्ट्री:-
- पुर्तगाली → कोचीन (1503)
- डच→ मसूलीपट्टम (1605)
- अंग्रेज→ मसूलीपट्टम (1611 )
- डैनिस→ ट्रावणकोर (1620 )
- फ्रांसीसी→ सूरत (1668) [IAS-2007]
पुर्तगाली:- पुर्तगालियों ने सबसे पहले भारत के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित किये[UPPCS (Mains) Spl. G.S. 2004][ Uttarakhand PCS (Pre) 2004-05] [UPPCS (Mains) G.S. Ist 2007 Jharkhand [PSC (Pre) G.S. 2008]।
17 मई, 1498 ई. में वास्को-डि-गामा ने 90 दिन की समुद्री यात्रा के बाद 20 मई, 1498 को भारत के पश्चिमी तट पर स्थित कालीकट बन्दरगाह पहुँचकर भारत एवं यूरोप के बीच नए समुद्री मार्ग की खोज की[Police Constable Exam-2005][राजस्थान पुलिस कॉन्स्टेबल-13.06.2024 (1)][NDA & NA 2022 (II)][CG PSC (Pre) 2022 (12.02.2023)]। इस यात्रा में वास्को-डि-गामा को गुजराती पथ प्रदर्शक अब्दुल मनीद ने सहयोग किया था। कालीकट के हिन्दू शासक जमोरिन ने वास्कोडिगामा का स्वागत किया, लेकिन कालीकट के समुद्र तटों पर पहले से ही व्यापार कर रहे अरबों ने इसका विरोध किया[जेल प्रहरी परीक्षा (Shift-II) 28.10.2018][RAJ. I Grade (History) 20 July, 2016][UP Lower (Pre) 2013] [UPPCS (Pre) Opt. History 2004]।
पुर्तगाली जब 16 वीं शताब्दी में भारत आए, तो वे अपने साथ कई विदेशी चीजें और फसलें भी लाए। जब पुर्तगाली व्यापारी और समुद्री यात्री 16 वीं शताब्दी में भारत आए (मुख्य रुप से गोवा और अन्य तटीय क्षेत्रों में), तो वे अपने साथ अमेरिका महाद्वीप की कई चीजे(पपीता,अनानास,अमरूद) लाए[IAS Pre-2025]।
कालीकट में तीन महीने रहने के बाद वास्कोडिगामा पुर्तगाल लौट गया था। वास्कोडिगामा वर्ष 1502 में पुनः भारत आया[CG PSC (Pre) 2022 (12.02.2023)]।
पेड्रो अल्वरेज काब्राल सितम्बर 1500 ई. में भारत आगमन।
पुर्तगालियों ने 1500 ई. में भारत में अपना पहला कारखाना कालीकट तथा 1501 ई. में दूसरा कारखाना कोचीन में स्थापित किया[UPPCS (Pre) Opt. History 2009]।
* 1505 ई. में फ्रांसिस्को द अल्मेडा भारत में प्रथम पुर्तगाली वायसराय बनकर आया[RPSC College Lecturer (History) 2016][I Grade (History) 18 July 2014][BPSC (Pre.) G.S. 2002][I.A.S. (Pre) G.S. 1995]।
* 1509 ई. में अल्फांसो द अल्बुकर्क भारत में पुर्तगालियों का वायसराय बना। इसने 1510 ई. में बीजापुर के यूसुफ आदिल शाह से गोवा को जीता[ PSC (Pre) 2022 (12.02.2023)]।
* पुर्तगालियों ने अपनी पहली व्यापारिक कोठी कोचीन में खोली।
* दक्षिणी-पूर्वी तट पर पुर्तगालियों की एकमात्र बस्ती सन-थोमे थी।
पुर्तगाली बंगाल की खाड़ी में समुद्री डकैती हेतु हुगली(प. बंगाल) का उपयोग करते थे[65th BPSC (Pre) G.S. 2019]। यहाँ पर उन्होंने मुगल बादशाह अकबर (1580 ई.) की अनुमति से एक कारखाने की स्थापना की, जो पुर्तगालियों का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र माना जाता था। मुगल बादशाह शाहजहाँ ने 1632 ई. में पुर्तगाली व्यापारिक केन्द्र हुगली को पूरी तरह से नष्ट कर दिया और एक हजार से अधिक पुर्तगालियों को बंदी बना लिया था।
डच (Dutch):-
* भारत के साथ व्यापार के लिए सर्वप्रथम संयुक्त पूँजी कंपनी डचों ने आरंभ की[IAS-1994]। 1602 ई. में डच (हालैंड) संसद द्वारा पारित प्रस्ताव से एक संयुक्त डच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई इसकी कुल प्रारंभिक पूँजी 6,500,000 गिल्डर थी। इस कंपनी को डच संसद द्वारा 21 वर्षों के लिए भारत और पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने, आक्रमण और विजय करने के संबंध में एकाधिकार दिया गया। इसका पूर्वी केन्द्र बटेविया (वर्तमान जकार्ता) में स्थित था।
* पुर्तगालियों के बाद भारत में डच लोग आए। पहला डच यात्री कार्नेलियन हाउटमैन (Cornelis de Houtman) 1596 ई. में भारत के पूर्व सुमात्रा पहुँचा।
* डचों ने भारत में अपनी प्रथम व्यापारिक कोठी (फैक्ट्री) 1605 ई. में मसूलीपट्टम में स्थापित की।
* डचों की दूसरी व्यापारिक कोठी पुलीकट में स्थापित हुई जहाँ उन्होंने अपने स्वर्ण सिक्के (पैगोडा) को ढाला और पुलीकट को ही समस्त गतिविधियों का केन्द्र बनाया।
* डचों ने भारत में प्रथम बार औद्योगिक वेतनभोगी रखे।
* कोलाचेल की लड़ाई:- इस लड़ाई में त्रावणकोर का राजा मार्तण्ड वर्मा ने 10 अगस्त, 1741 ई. को एडमिरल यूस्ताचियस डी लैनॉय के नेतृत्व वाली डच ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना को हरा दिया।
* डचों का भारत में अन्तिम रूप से पतन 1759 ई. को अंग्रेजों एवं डचों के मध्य हुए बेदरा युद्ध से हुआ।
* डचों ने 1605 ई. में मसूलीपट्टम् में प्रथम डच कारखानें की स्थापना की।
* भारत में डेनिश कम्पनी ने त्रैकोबार /ट्रांक्यूबर (तमिलनाडु) में बस्ती बसाई[ NDA& NA 2023 (I)]।
डचों द्वारा भारत में स्थापित कुछ अन्य कारखाने इस प्रकार है[स्कूल व्याख्याता (इतिहास)-09.01.2020]:- पुलीकट(1610)→सूरत(1616ई.)→ पीपली(1627 बंगाल में)→पटना(1632)[69th BPSC (Pre) 2023 65th BPSC (Pre) G.S. 2019]→विमलीपट्टम(1641)→ करिकाल(1645)→ चिनसुरा(1653)→ कोचीन(1663) → कासिम बाजार, बालासोर, नेगापट्टम(1658 ई.)
अंग्रेज (British):-
* 31 दिसम्बर, 1600 ई. को इंग्लैंड की रानी एलिजाबेथ प्रथम ने ईस्ट इंडिया कम्पनी को अधिकार-पत्र प्रदान किया।
* प्रारंभ में ईस्ट इंडिया कम्पनी में 217 साझीदार थे और पहला गवर्नर टॉमस स्मिथ था।
* मुगल दरबार में जाने वाला प्रथम अंग्रेज कैप्टन हॉकिन्स था[1 Grade (History) 20.7.2016], जो जेम्स प्रथम के राजदूत के रूप में अप्रैल 1609 ई. में जहाँगीर के दरबार में गया था।
* नोट: भारत आने वाला पहला अंग्रेजी जहाज रेड ड्रैगन/ 'हेक्टर' कप्तान हॉकिंस के नेतृत्व में था।
* 1611 ई. में द. पू. समुद्रतट पर सर्वप्रथम अंग्रेजों ने मसूलीपट्टम में व्यापारिक कोठी की स्थापना की[ NDA& NA 2023 (I)]।
* जहाँगीर ने 1613 ई. में एक फरमान जारी कर अंग्रेजों को सूरत में थॉमस एल्डवर्थ (Thomas Aldworth) के अधीन व्यापारिक कोठी (फैक्ट्री) खोलने की इजाजत दी।
नोट: पूर्वी तट पर अंग्रेजों ने अपना प्रथम व्यापारिक कोठी मसूलीपट्टम में 1611 ई. में खोला, जबकि पश्चिमी तट पर सूरत में 1613 ई. में व्यापारिक कोठी स्थापित किया। पहली बार सूरत में 1608 ई. में व्यापारिक कोठी स्थापित करने का प्रयास किया गया था[1 Grade (Hist.) 18 July 2014][IAS-2006]।
ईस्ट इण्डिया कम्पनी का राजपूत राज्यों से सहायक सन्धि करने का मुख्य उद्देश्य अंग्रेजों की प्रभुसत्ता स्थापित करना था[RAS Pre. - 1992]।
सूरत में फैक्टरी:-
- अंग्रेजों द्वारा फैक्टरी 1613 ई. में
- डचों द्वारा फैक्टरी 1616 ई. में
- फ्रांसीसियों द्वारा 1668 ई. में
* 1615 ई. में सम्राट जेम्स-I ने 'सर टॉमस रो' को अपना राजदूत बनाकर मुगल सम्राट जहाँगीर के दरबार में भेजा। वह फरवरी 1619 ई. तक भारत में रहा।
* 1632 ई. में गोलकुण्डा के सुल्तान ने अंग्रेजों को एक सुनहला फरमान (Golden Farman) दिया जिसके अनुसार अंग्रेज सुल्तान को 500 पैगोडा वार्षिक कर देकर गोलकुण्डा राज्य के बन्दरगाह पर स्वतंत्रतापूर्वक व्यापार कर सकते थे।
* 1639 ई. में अंग्रेज फ्रांसिस डे ने चन्द्रगिरि के राजा से मद्रास पट्टे पर लिया एवं वहीं एक किलाबान्द कोठी का निर्माण किया; इस कोठी का नाम फोर्ट सेन्ट जार्ज पड़ा[IAS (Pre) 2022]।
* 1661 ई. में पुर्तगाली राजकुमारी 'कैथरीन ऑफ ब्रेगेन्जा' एवं ब्रिटेन के राजकुमार 'चार्ल्स द्वितीय' का विवाह हुआ। दहेज के रूप में पुर्तगालियों ने चार्ल्स-II को बम्बई प्रदान किया।
* 1668 ई. में चार्ल्स-II ने बम्बई को 10 पौण्ड के वार्षिक किराये पर ईस्ट इंडिया को दे दिया।
* 1687 ई. में अंग्रेजों ने पश्चिमी तट का मुख्यालय सूरत से हटाकर बम्बई को बनाया।
* नोट: गेराल्ड औंगियर (1669-1677 ई.) ने बम्बई शहर की स्थापना की।
* बंगाल के शासक शाहशुजा ने सर्वप्रथम 1651 ई. में अंग्रेजों को व्यापारिक छूट की अनुमति दी। इस अनुमति को निशान कहते थे।
* 1698 ई. में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने तीन गाँव—सूतानुती, कालीकट एवं गोविन्दपुर की जमींदारी 1200 रूपये भुगतान कर प्राप्त की और यहाँ पर फोर्ट विलियम का निर्माण किया। चार्ल्स आयर फोर्ट विलियम के प्रथम प्रेसीडेन्ट हुए। कालान्तर में यही कलकत्ता (कोलकाता) नगर कहलाया, जिसकी नींव जॉर्ज चारनैक ने रखी।
* अंग्रेज जाति ने भारत में व्यापार करने हेतु 1600 ई. में ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना की। मुगल सम्राट फर्रुखसियर द्वारा अंग्रेजों को मुक्त व्यापार हेतु 1717 ई. को आज्ञा पत्र (दस्तक) जारी किया[1 Grade (History) 18.7.2014]।
कर्नाटक का प्रथम युद्ध (1746-48):- ऑस्ट्रिया का उत्तराधिकार युद्ध, जो 1740 में आरंभ हुआ था, का विस्तार मात्र था। गृह सरकारों की आज्ञा के विरुद्ध ही दोनों दलों (अंग्रेज एवं फ्रांसीसी) में 1746 में युद्ध प्रारंभहो गया। अंग्रेज कैप्टन बर्नेट के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना द्वारा कुछ फ्रांसीसी जहाजों पर अधिकार कर लेना युद्ध का तात्कालिक कारण था। यूरोप में युद्ध बंद होते ही कर्नाटक का प्रथम युद्ध समाप्त हो गया। एक्स-ला-शैपेल की संधि (1748) से ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार का युद्ध समाप्त हो गया तथा मद्रास अंग्रेजों को पुनः प्राप्त हो गया[स्कूल व्याख्याता (संस्कृत शिक्षा) इतिहास-18.11.2024]-[स्कूल व्याख्याता(इतिहास)-9.1.2020] [महिला पर्यवेक्षक-6.1.2019]।
द्वितीय कर्नाटक युद्ध (1749-54 ई.) के समय कर्नाटक के नवाबी के पद को लेकर संघर्ष हुआ, चांदा साहब ने नवाबी के लिए डूप्ले का सहयोग प्राप्त किया, दूसरी ओर डूप्ले ने मुजफ्फरजंग के लिए दक्कन की सूबेदारी का समर्थन किया। अंग्रेजों ने अनवरुद्दीन और नासिरजंग को अपना समर्थन प्रदान किया। शीघ्र ही फ्राँसीसी सेना को आत्मसमर्पण हेतु विवश होना पड़ा और चांदा साहब की हत्या कर दी गई।
तृतीय कर्नाटक युद्ध (1757-63) का तात्कालिक कारण था क्लाइव और वॉट्सन द्वारा बंगाल स्थित चंद्रनगर पर अधिकार। इस युद्ध के अन्तर्गत अंग्रेज और फ्राँसीसियों के बीच वाण्डीवांश नामक निर्णायक लड़ाई लड़ी गई। 22 जनवरी, 1760 को लड़े गये वाण्डीवांश के युद्ध में अंग्रेजी सेना को आयरकूट ने तथा फ्राँसीसी सेना को लाली ने नेतृत्व प्रदान किया[Head Master Exam, 2011]। इस युद्ध में फ्राँसीसी पराजित हुए[जेल प्रहरी परीक्षा (Shift-III) 21.10.2018][जेल प्रहरी परीक्षा (Shift-II) 27.10.2018]।
प्रथम एंग्लो-बर्मी युद्ध(1824-1826)
प्रथम एंग्लो-बर्मी युद्ध (1824-1826) तब शुरू हुआ जब बर्मा ने असम में विस्तार किया, जिससे ब्रिटिश सेनाओं के साथ सीधा संघर्ष हुआ। यह युद्ध दो वर्षों तक चला, और प्रारंभिक बर्मी सफलताओं के बावजूद, सर आर्चीबाल्ड कैंपबेल के नेतृत्व में ब्रिटिश सेनाओं ने अंततः बर्मा के प्रमुख क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया। यांडाबो संधि पर 24 फरवरी 1826 को हस्ताक्षर किए गए थे[स्कूल व्याख्याता (इतिहास)-18.10.2022]।
यांडाबो की संधि
यांडाबो संधि पर 24 फरवरी 1826 को हस्ताक्षर किए गए थे। ब्रिटिश पक्ष का प्रतिनिधित्व जनरल आर्चीबाल्ड कैंपबेल ने किया, जबकि बर्मा की ओर से लेगाइंग के गवर्नर महा मिन हला क्याव हटिन ने हस्ताक्षर किए। इस संधि ने प्रथम एंग्लो-बर्मी युद्ध का आधिकारिक अंत किया और बर्मा साम्राज्य पर महत्वपूर्ण शर्तें लागू कीं। बर्मा ने असम, मणिपुर, अराकान और तेनासेरिम को अंग्रेजों को सौंप दिया। बर्मा को अंग्रेजों को भारी हर्जाना देना पड़ा। आवा और कलकत्ता के बीच राजनयिक प्रतिनिधियों के आदान-प्रदान की अनुमति दें।
द्वितीय एंग्लो-बर्मी युद्ध
1852 में हुआ दूसरा एंग्लो-बर्मी युद्ध ब्रिटिश व्यापारिक महत्वाकांक्षाओं और लॉर्ड डलहौज़ी की साम्राज्यवादी नीतियों से प्रेरित था । ब्रिटिश व्यापारी ऊपरी बर्मा के समृद्ध लकड़ी संसाधनों तक पहुंच बनाने और बर्मी बाज़ार में अपनी उपस्थिति बढ़ाने के लिए उत्सुक थे। इन आर्थिक हितों और डलहौज़ी के आक्रामक विस्तारवादी एजेंडे के कारण एक बार फिर संघर्ष छिड़ गया। युद्ध के अंत तक, अंग्रेजों ने पेगू प्रांत पर कब्जा कर लिया, जिससे निचले बर्मा पर उनका नियंत्रण और बढ़ गया।
तीसरा एंग्लो-बर्मी युद्ध
तीसरे एंग्लो-बर्मी युद्ध का तात्कालिक कारण राजा थिबाव द्वारा फ्रांसीसियों के साथ गठबंधन बनाने और सीमा शुल्क बढ़ाने के प्रयासों पर ब्रिटिश प्रतिक्रिया थी, जिससे ब्रिटिश व्यापार प्रभावित हो रहा था। अंग्रेजों ने नवंबर 1885 में एक त्वरित अभियान चलाया और बर्मा की राजधानी मांडले पर कब्जा कर लिया। राजा थिबाव को पदच्युत कर दिया गया और 1886 तक बर्मा को औपचारिक रूप से ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया।
मार्तण्ड वर्मा ने 18 वीं शताब्दी में डचों को पराजित किया था[1 Grade (History) 20 July, 2016]।
फ्रांसीसी (French):-
* भारत में फ्रांसीसियों की प्रथम कोठी फ्रैंको कैरों के द्वारा सूरत में 1668 ई. में स्थापित की गयी।* 1674 ई. में फ्रांसीसी कम्पनी के निदेशक फ्रैंक्विस मार्टिन ने वालिकोंडापुर के सूबेदार शेर खाँ लोदी से पुदुचेरी नामक एक गाँव प्राप्त किया, जो कालान्तर में पाण्डिचेरी के नाम से जाना गया।
* मर्कारा, गोलकुंडा के सुल्तान से एक अधिकार-पत्र प्राप्त कर, 1669 में मसूलीपट्टनम (मछलीपट्टनम) में दूसरी फ्रांसीसी कोठी स्थापित की गई।
1673 में बंगाल के सूबेदार शाइस्ता खाँ द्वारा फ्राँसीसियों को प्रदत्त स्थान पर 1690-92 को चंद्रनगर की स्थापना की गई[College Lecturer (History) 2014 (2016)]।
फ्रांन्सिस्को डी अल्मेडा ब्लू वाटर पॉलिसी[Uttarakhand PCS (Pre) G.S. 2016]|
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