मुहम्मद गौरी
गजनवी वंश के अन्तिम शासक खुसरो मलिक को मुईजुद्दीन मुहम्मद बिन-साम ने जो शाहबुद्दीन मुहम्मद गौरी(शंसबनी/गौर वंश) के नाम से प्रसिद्ध था, मार डाला। इस प्रकार बारहवीं शताब्दी के अन्तिम चौथाई में गजनवी वंश समाप्त हो गया।
गौर महमूद गज़नी के अधीन एक छोटा-सा राज्य था। 1173 ई. में शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी गौर का शासक बना। इसने भारत पर पहला आक्रमण 1175 ई. में मुल्तान के विरुद्ध किया था[UPPSC Asst. Forest Conservator Exam. 2013 ] [UPPCS (Pre) Opt. History 2001]। जिस पर उस समय करमिथियन लोगों का शासन था। आक्रमणकारी ने उन्हें हार दी, मुलतान नगर पर अधिकार कर लिया और अपने ही रूढ़िवादी राज्यपाल को वहाँ नियुक्त कर दिया। मोहम्मद गौरी का भारत पर आक्रमण का मुख्य उद्देश्य भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना करना था। शाहबुद्दीन मुहम्मद गौरी भारत का प्रथम मुस्लिम शासक था[PSI-2011]।
मुलतान से मुहम्मद उच्छ की ओर बढ़ा। कहते हैं कि यहाँ उसने एक चाल चली। उसने उच्छ के भट्टी राजा की पत्नी से षड्यंत्र रचा कि वह अपने पति को मार डाले और मुहम्मद उसकी लड़की को अपने अन्तःपुर में शामिल कर लेगा और उसे ऊँची से ऊँची पदवी प्रदान कर देगा। भट्टी राजा की पत्नी ने वैसा ही किया परन्तु मुहम्मद अपने वचन से फिर गया। आजकल की छानबीन ने इस कहानी को मिथ्या सिद्ध कर दिया है। यह बताया जाता है कि उच्छ पर भट्टी राजा का शासन हुआ ही न था और यह अवश्य किसी करमिथियन मुसलमान के समय हुआ होगा। कुछ भी हो इसमें कोई संदेह नहीं कि मुहम्मद ने 1176 ई. में उच्छ पर अधिकार कर लिया।
मुहम्मद गौरी का दूसरा आक्रमण 1178 ई. में पाटन (गुजरात) पर हुआ। यहाँ का शासक भीम-II ने गौरी को बुरी तरह परास्त किया[UPPCS (Pre) Opt. History, 1997, 1994]।
अन्हिलवाड़ा पर चढ़ाई और गौरी की हार:- 1178 ई. में मुहम्मद ने अन्हिलवाड़ा पर चढ़ाई कर दी। अन्हिलवाड़ा के शक्तिशाली राजा भीमदेव ने आक्रमणकारी गौरी का डटकर मुकाबला किया और उसे करारी हार दी। इस हार से गौरी को इतनी निराशा हुई कि 20 वर्ष तक उसने गुजरात पर आक्रमण करने का साहस न किया।
पंजाब की चढ़ाई (1179-86 ई.):- मुहम्मद ने अब पंजाब पर चढ़ाई करने की सोची क्योंकि अब उसने अनुभव किया कि सिन्ध और मुल्तान की ओर से भारत पर चढ़ाई करना आसान नहीं है और भारत की ओर जाने के लिए उचित द्वार पंजाब ही है। 1179 ई. में उसने पेशावर पर आक्रमण किया और उस पर अधिकार कर लिया। 1185 ई. में उसने फिर पंजाब पर चढ़ाई की और सियालकोट के किले पर अधिकार कर लिया। पंजाब के गजनवी शासक खुसरो मलिक ने अब इस गौरी आक्रमणकारी से लड़ने की तैयारियाँ शुरू कर दीं। 1186 ई. में मुहम्मद गौरी ने जम्मू और चक्रदेव की सहायता से जो खुसरो मलिक का शत्रु था फिर पंजाब पर चढ़ाई की और लाहौर को घेर लिया परन्तु इस पर अधिकार न कर सका[MPPSC (Pre) Opt. History 2010]। अब उसने एक चाल चली, उसने खुसरो मलिक को मनाया कि मेरे साथ आकर भेंट करो और वचन दिया कि तुम्हारी जान को कोई खतरा नहीं है। परन्तु जब भेंट हुई तो मुहम्मद गौरी ने अपना वचन तोड़कर गजनवी शासक को बन्दी बना लिया। उसे गजिस्तान भेज दिया जहाँ उसे 1192 ई. में मार डाला। लाहौर पर अधिकार कर लेने के बाद मुहम्मद आगे बढ़ा। फिर उसने आसानी से सिन्ध और भटिण्डा पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार पंजाब का बहुत-सा भाग गौरी सरदार के शासन में आ गया।
तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ई.):- मुहम्मद गौरी की हार
तराइन की दूसरी लड़ाई (1192 ई.):- पृथ्वीराज चौहान की हार
नोट:- पृथ्वीराज चौहान के विरुद्ध मुहम्मद गोरी के आक्रमण के समय कन्नौज पर गहड़वाल वंश का शासन था[MPPSC (Pre) Opt. History 2010]।
बुलन्दशहर, मेरठ तथा कोयल की चढ़ाई (1193-94 ई.):-
तराइन की विजय के पश्चात् मुहम्मद गौरी ने कुतुबुद्दीन ऐबक को अपना राज्यपाल नियुक्त कर दिया और स्वयं गजनी लौट गया। ऐबक ने अपनी विजय को पक्का करके अपने राज्य को और अधिक फैलाया। उसने धोखे से देव राजपूतों से बुलन्दशहर छीन लिया। उसने मेरठ और कोयल (अलीगढ़) पर भी चढ़ाई की और बिना किसी अधिक विरोध के इन प्रदेशों को जीत लिया। देहली को राजधानी बना लिया गया और वहाँ शान्ति तथा व्यवस्था स्थापित कर दी गई। इस प्रकार मुहम्मद गौरी के लौटे जाने के दो वर्ष के अन्दर अन्दर कुतुबुद्दीन ने पंजाब, देहली, अजमेर, बुलन्दशहर, मेरठ और आजकल के अलीगढ़ में एक ठोस मुस्लिम राज्य स्थापित कर दिया।
कन्नौज के जयचंद्र के विरुद्ध लड़ाई/चन्दावर की लड़ाई (1194 ई.):-
कोई राजपूतसंघ संगठित न किया जा सका और जयचंद्र अकेला ही चन्दवाड़ा(आधुनिक चंदवाल, फिरोजाबाद-उत्तर प्रदेश के पास ) के स्थान पर शत्रु से भिड़ा[UPPCS (Pre) Opt. History 2002][MPPSC (Pre) Opt. History 2008]। राजपूत लोग स्वभावानुसार वीरता से लड़े और उन्होंने बहुत से मुसलमानों को मार डाला। परन्तु अन्त में जयचंद्र की आँख में एक घातक घाव आया और वह धरती पर आ गिरा। इससे राजपूतों में आतंक फैल गया और वे भिन्न-भिन्न दिशाओं में बिखर भागे। इस प्रकार मुसलमानों को पूर्ण विजय प्राप्त हो गई[UPPCS (Pre) G.S.2008]। मुहम्मद गौरी अब बनारस की ओर बढ़ा और वहाँ उसने कोई एक हजार मन्दिर तोड़ डाले। वहाँ उसे बहुत-सा धन हाथ लगा जिसे वह 1400 ऊँटों पर लदवा कर गजनी ले गया। तो भी कन्नौज की राजधानी वह 1198 ई. से पहले न ले सका।
अन्हिलवाड़ा की विजय (1197-98ई.):-
मुहम्मद के गजनी लौट जाने के बाद उसके योग्य राज्यपाल कुतुबुद्दीन ने अपना विजय का काम जारी रखा। उसने एक बड़ी सेना इकट्ठी की और अन्हिलवाड़ा पर चढ़ाई कर दी[MPPSC (Pre) Opt. History 2009]। यहाँ का शासक भीमदेव एक बहुत शक्तिशाली शासक था जिसने एक बार मुहम्मद गौरी को हराया था। परन्तु ऐबक बड़ी सावधानी तथा पूरी तैयारी से आगे बढ़ा। अन्हिलवाड़ा के चालुक्य राजपूतों ने आबू पहाड़ के तले उसका सामना किया परन्तु शत्रुओं से हार खाई। उनके सेनापति कंवरलाल को मार डाला गया और मुसलमान विजयी हुए। अन्हिलवाड़ा पर तो अधिकार कर लिया गया परन्तु भीमदेव भाग खड़ा हुआ।
कालिंजर की विजय (1202-03 ई.):-
1202 ई. में कुतुबुद्दीन ने कालिंजर पर चढ़ाई कर दी जो उस समय चन्देल राजा परमर्दी देव के अधीन था। चन्देलों ने डट कर मुकाबला किया और बहुत देर कालिंजर का घेरा पड़ा रहा। अन्त में शत्रुओं की शक्ति के सामने हिन्दुओं ने अपने आपको विवश पाया। ऐबक के सैनिकों ने कालिंजर और महोबा पर अधिकार कर लिया।
बख्तियार खिलजी द्वारा बंगाल और बिहार की विजय[UPPCS (Pre) G.S. 1991][MPPSC (Pre) Opt. History 2009]:-
बिहार के बाद बंगाल की बारी आई जिसे थोड़े से सैनिकों से उतनी ही आसानी से जीत लिया गया। इख्तियारुद्दीन ने एकदम बंगाल पर धावा बोल दिया। बंगाल का राजा लक्ष्मणदेव भाग खड़ा हुआ। बंगाल इख्तियारुद्दीन के हाथ आ गया, जिसने अपने स्वामी के नाम पर खुत्वा प्राप्त किया और अपने स्वामी के स्वामिभक्त सहायक का काम किया।
15वीं शताब्दी के तिब्बती इतिहासकार तारानाथ के अनुसार “बख्तियार खिलजी ने विक्रमशिला एवं नालन्दा पर अधिकार कर उछंडपुर में दुर्ग बनवाया था।”
1202 ई. में नालन्दा विश्वविद्यालय को इख्तियारुद्दीन मोहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने नष्ट किया था[UPPCS (Pre) Opt. History 2006]।
खोखरों पर चढ़ाई तथा मुहम्मद गौरी की मौत (1205-06 ई.):-
मुहम्मद गौरी के केन्द्रीय एशिया के युद्धों में उलझे रहने तथा भारत से अनुपस्थित रहने के कारण पंजाब के खोखरों ने साहस करके विद्रोह कर दिया। ऐबक ने उन्हें दबाना चाहा परन्तु असफल रहा। 1205 ई. के अन्तः में मुहम्मद गौरी स्वयं पंजाब आया। जेहलम के निकट उसने खोखरों को हरा दिया।
डॉ. ईश्वरी प्रसाद लिखते हैं कि "खोखर साँप को झुलस तो दिया गया परन्तु मारा नहीं जा सका।" खुली लड़ाइयों में हार खाकर खोखरों ने विश्वासघात का सहारा लिया। उन्होंने सुलतान की जान लेने के लिए एक षड्यंत्र रचा। मुहम्मद गौरी भारत के विजित प्रदेशों पर शासन का भार अपने गुलाम सेनापतियों को सौंपते हुए गजनी लौट गया। मार्ग में जेहलम जिले के एक स्थान धम्यक पर ठहरा तो अपनी योजना के अनुसार कुछ खोखर उस पर टूट पड़े और छुरा मारकर उसे मार डाला[RAS/RTS (Pre) Opt. History 2008]। यह घटना 15 मार्च, 1206 ई. में हुई।
मुहम्मद गौरी द्वारा लड़ा गया प्रमुख युद्ध[MPPSC (Pre) Opt. History 2009]:-
युद्ध वर्ष पक्ष परिणाम
तराइन का प्रथम युद्ध 1191 गौरी व पृथ्वीराज चौहान चौहान विजयी
तराइन का द्वितीय युद्ध 1192 गौरी व पृथ्वीराज चौहान गौरी विजयी
चन्दावर का युद्ध 1194 गौरी एवं जयचन्द गौरी विजयी
नोटः तराइन के प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज चौहान का सेनापति स्कन्द था।
चौहान वंश के सिक्कों की तरह मुहम्मद गोरी ने दिल्ली में भारतीय ढंग की मुद्रा तैयार करवाई। कन्नौज जीतकर उसने भारत का राजा (सुल्तान) कहलाने के लिए लक्ष्मी की आकृति का सिक्का (स्वर्ण, रजत) जारी किया[UPPCS (Pre) Opt. History 1996, 2004][UPPCS (Pre) Spl. Opt. History 2008][Uttarakhand PCS (Pre) 2006-07]।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
ब्लॉग पढ़ने के लिए धन्यवाद। यदि कोई उत्तम सुझाव अथवा शिक्षा से संबंधित कोई अन्य टॉपिक जिसको आप जानने के लिए उत्सुक है तो नीचे कमेंट करके बताएं। यदि आपको कोई गलती नजर आ रही है या कोई संदेह है तो भी आप कृपया कमेंट करके अवश्य बताएं।। धन्यवाद।।