भारत पर अरबों का आक्रमण
सिन्ध पर अरबों की विजय के समय उत्तरी तथा दक्षिणी भारत में फूट और झगड़े की दशा बनी हुई थी।
अरब आक्रमण के कारण:-
(i) राजनैतिक:- सीरिया, फिलिस्तीन, मिस्र और ईरान को वे पहले ही जीत चुके थे इसलिए उन्होंने अपना मुँह भारत की ओर कर लिया। 636 ई. तक उन्होंने अपनी पहली चढ़ाई आरंभ कर दी जिसका विशेष उद्देश्य बम्बई के निकट थाणे नामक स्थान को जीत लेना था परन्तु यह चढ़ाई व्यर्थ गई। 643-44 ई. में खलीफा उस्मान ने आदुल-बिन-अमर के नेतृत्व में एक भारी अभियान सेना भेजी जिसने सीस्तान पर अधिकार कर लिया और तब वह मकरान की ओर बढ़ा। उसने सिन्ध के एक भाग को जीत लिया परन्तु उसे जिस किसी तरह यह महसूस हुआ कि सिन्ध की ऊसर भूमि को हथिया लेने से कोई लाभ नहीं। उसने खलीफा को इस प्रकार का पत्र लिखा, "यहाँ पानी की कमी है। घटिया और बहुत कम फल उगता है और यहाँ के डाकू बड़े साहसी हैं। यदि थोड़ी सी सेना भेजी गई तो सैनिक मार डाले जाएँगे। यदि अधिक सेना भेजी गई तो सैनिक भूख से मर जाएँगे।" चाहे ये प्रारम्भिक अभियान असफल हुए तो भी इतना तो अवश्य दर्शाते हैं कि मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण से बहुत पहले अरब लोगों में भारत की भूमि जीतने की बड़ी लालसा थी।
(ii) आर्थिक:- भारत की दौलत ने भी अरब लोगों को हमारे देश पर चढ़ाई करने के लिए बहुत लालायित किया। अरब यात्रियों ने मुल्तान को 'स्वर्ण गृह' कहा ।[UPPCS (Pre) Opt. History 2010] प्राचीन काल से अरबों के भारत से व्यापारिक सम्बन्ध थे और इस नाते वे भारत के धन-धान्य से पूरी तरह परिचित थे। भारत में उन्हें एक बहुत ही लुभाने वाली भूमि दिखाई दी जो उनकी आवश्यकता तथा लालच को संतुष्ट कर सकती थी।
(iii) धार्मिक:- अरब इस्लाम धर्म को फैलाना चाहते थे और भारत में मूर्तिपूजा का खण्डन करना चाहते थे।
(iv) तत्कालीन:- अरब व्यापारियों के कुछ जहाज लंका के राजा से जिसने, कहते हैं, इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था कुछ मूल्यवान उपहार ले जा रहे थे। अरबों के जहाज लंका से आते समय देबल के डाकुओं द्वारा लूट लिए गए। बसरा का अलहजाज जो खलीफा के पूर्वी प्रांतों का राज्यपाल था, इस लूटपाट से बड़ा दुःखी हुआ। उसने सिन्ध के राजा दाहिर को लिखा कि अपराधियों को दण्ड दिया जाए और हमारी क्षति की पूर्ति की जाए। दाहिर ने जवाब दिया कि देबल के समुद्री डाकू मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं हैं और इसलिए मैं उन्हें दण्ड देने में असमर्थ हूँ। इस जवाब पर खिन्न होकर हजाज ने दाहिर के विरुद्ध चढ़ाई करने की खलीफा वालिद से आज्ञा माँगी। 711 ई. में इस आज्ञा के अनुसार उबैदुल्ला के नेतृत्व में एक सेना भेजी गई। परन्तु वह हार गया और राजा दाहिर ने उसे युद्धभूमि में मार डाला। अगले वर्ष 712 ई. में बुन्देल के नेतृत्व में एक और चढ़ाई की गई। इस बार भी अरब सेनापति हार गया और मार डाला गया। अब हजाज ने अपने चचेरे भाई तथा दामाद बिन कासिम को, जो एक 17 वर्ष का नवयुवक था, आज्ञा दी कि सिन्ध पर चढ़ाई करे।
भारत पर अरबवासियों के आक्रमण का मुख्य उद्देश्य धन-दौलत लूटना तथा इस्लाम धर्म का प्रचार-प्रसार करना था।
मुहम्मद बिन कासिम का आक्रमण:-
मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में अरबों ने भारत पर 711 ई. में पहला सफल आक्रमण किया।[UP Lower (Pre) 2002)] [UPPCS (Pre) G.S. 1992][MPPSC (Pre) G.S. 1995]
अरबों ने सिन्ध पर 712 ई. में विजय पायी थी। अरबों आक्रमण के समय सिन्ध पर चच के पुत्र दाहिर का शासन था।[MPPSC (Pre) Opt. History 2008]
मुहम्मद बिन कासिम 15000 सैनिक लेकर चला था जिनमें 6000 सीरियाई घुड़सवार थे और 1000 कैंट सवार। मार्ग में मरकान के निकट मुहम्मद हारू के नेतृत्व में कुछ और सेनाएँ उसके साथ आ मिलीं। सिन्ध पर उसके आक्रमण के समय उसके पास लगभग 35000 सैनिक थे। जब अरब नेता देबल की ओर बढ़ा तब बहुत से जाट और मेव लोग जो अधिकतर बुद्ध धर्म को मानने वाले थे और जो अपने ब्राह्मण राजा दाहिर के व्यवहार से खिन्न थे उसके साथ मिल गये और उसकी सेना की संख्या को और भी अधिक बढ़ा दिया।
जब मुहम्मद की सेना देबल की ओर बढ़ी तो राजा दाहिर ने निष्क्रिय रहने की घातक गलती की। उसने आक्रमणकारी सेना की प्रगति को रोकने का कोई प्रयत्न नहीं किया।
आखिरकार अरब लोगों ने देबल पर अधिकार जमा लिया और वहाँ एक भयानक रक्तपात आरंभ हुआ जो तीन दिन तक चलता रहा। लोगों को कहा गया कि इस्लाम स्वीकार करो, नहीं तो मार डाले जाओगे और बहुतों ने मरना स्वीकार किया। कहा जाता है कि 17 वर्ष के ऊपर के सब पुरुष मौत के घाट उतार दिये गये और उनकी स्त्रियाँ और बच्चे दास बना लिये गये। लूटमार का बहुत-सा माल अरबों के हाथ लगा। जिसका पाँचवाँ हिस्सा हजाज के द्वारा खलीफा को भिजवा दिया गया।
देबल को जीतने और लूटने के बाद मुहम्मद बिन कासिम उत्तर पूर्व में एक महानगर निरुन की ओर बढ़ा। इस नगर को जब राजा दाहिर से किसी प्रकार की कोई सहायता न मिली तो वे विवश हो बिना किसी विरोध के झुक गये और उन्होंने हथियार डाल दिये। विदेशी अब सेहवन की ओर बढ़े जिस पर दाहिर के चचेरे भाई बाझरा का अधिकार था। वह कोई एक सप्ताह तक लड़ता रहा परन्तु अन्त में उसे किला छोड़ना पड़ा। सेहवन से अरब लोग सीसम की ओर बढ़े और वहाँ भी दो दिन लड़ाई के बाद जाट लोग हार गये।
20 जून 712 ई. रावड़ की एक निर्णायक लड़ाई हुई। दाहिर और उसके सैनिक बड़ी वीरता से लड़े और उन्होंने बहुत से अरबों को मार डाला। परन्तु दुर्भाग्यवश लड़ाई के बीच राजा दाहिर के हाथी पर एक तीर आकर लगा जिससे हौदे को आग लग गई और वह हाथी भागकर नदी में चला गया। इससे यह बात फैल गई कि राजा या तो मार डाला गया है या युद्धभूमि से भाग गया है। परिणाम यह हुआ कि सिन्ध के लोग निराश तथा निरुत्साहित हो गये। दाहिर जब अपने हाथी को लेकर युद्धक्षेत्र में लौटा तो क्या देखता है कि उसके बहुत से सैनिक भाग खड़े हुए वह बड़ा घबराया तो भी बड़ी वीरता से लड़ा परन्तु अन्त में हार खाई और वीरगति को प्राप्त हुआ।
दाहिर की विधवा पत्नी रवी बाई ने 15,000 सैनिक लेकर रावड़ के किले के अंदर से डटकर मुकाबला किया परन्तु आखिरकार यह महसूस करके कि शत्रुओं के विरुद्ध अधिक डटे रहना सम्भव रहीं, उसने दूसरी स्त्रियों के साथ जौहर की परम्परा को पूरा किया तथा अपमान की अपेक्षा मृत्यु को गले लगाया। इस प्रकार अरब लोगों को एक पूर्ण विजय प्राप्त हुई और वे ब्राह्मणावाद की ओर बढ़े।
जब अरब ब्राह्मणावाद पहुँचे तब दाहिर के बेटे जयसिंह ने ब्राह्मणावाद की प्रतिरक्षा में सैनिक जुटाए और शत्रुओं का डटकर मुकाबला किया। कोई 8000 हिन्दू मारे गये परन्तु कम-से-कम उतने ही शत्रु भी नष्ट हुए। जयसिंह किसी तरह बचकर निकल गया। मुहम्मद ने नगर पर अधिकार कर लिया और सारे धनकोष को अपने कब्जे में ले लिया। यहीं ब्राह्मणावाद में ही दाहिर की एक और विधवा रविलादी और उसकी दो सुन्दर लड़कियाँ सूर्यदेवी और परमलदेवी शत्रुओं के हाथ लगीं। मुहम्मद ने दाहिर की दोनों सुन्दर लड़कियाँ सूर्यदेवी और परमलदेवी खलीफा वालिद के पास भेज दीं।
अब मुहम्मद बिन कासिम एलोर जिसे एरोड़ भी कहते थे, की ओर बढ़ा। वह उस समय सिन्ध की राजधानी था। यहाँ दाहिर के एक और बेटे फूजी ने शत्रु का सामना किया परन्तु उसकी हार हुई। एलोर की विजय के साथ सारे सिन्ध की विजय मुकम्मल हो गई।
713 ई. के आरंभ में मुहम्मद बिन कासिम मुलतान की ओर बढ़ा। राह में जिस किसी ने उसका विरोध किया उन सबको हराते हुए वह अन्त में मुलतान के द्वार पर जा पहुँचा। कहते हैं कि देबल की तरह इस महत्त्वपूर्ण नगर की भी हार इस कारण हुई कि एक गद्दार ने धोखा दिया और शत्रु को वह नदी बता दी जहाँ से मुलतान के लोग पानी पिया करते थे। मुहम्मद ने बड़ी चालाकी से जल-प्राप्ति का वह स्रोत काट डाला और लोग प्यासे मरने लगे। इस प्रकार उसे बड़ी सुगमता से नगर पर विजय प्राप्त हो गई और उसने खूब लूटमार मचाई। अरब लोगों को यहाँ से इतनी दौलत मिली कि वे मुलतान को सोने का नगर समझने लगे।
मुलतान की विजय के बाद मुहम्मद बिन कासिम ने कन्नौज को जीतने की तैयारी आरंभ कर दी परन्तु उसकी अचानक दुःखदायी मौत ने भारत में अरबों की अधिक विजय पर रोक लगा दी।
मुहम्मद बिन कासिम की मौत की कहानी कुछ इस प्रकार है-
ब्राह्मणावाद की विजय के बाद मुहम्मद ने दाहिर की दोनों सुन्दर लड़कियाँ सूर्यदेवी और परमलदेवी खलीफा वालिद के पास भेज दीं। लड़कियों ने खलीफा को बताया कि हमें तो कासिम ने पहले ही अपमानित तथा दूषित कर दिया है। इस पर खलीफा क्रोध से भभक उठा और उसने आज्ञा दी कि मुहम्मद बिन कासिम को एक बैल की कच्ची खाल में मढ़वाकर मेरे पास भेज दिया जाए। मुहम्मद को सता-सताकर मार डाला गया। इसके बाद दोनों लड़कियों ने खलीफा को बता दिया कि मुहम्मद बिन कासिम निर्दोष था और हमने यह कहानी अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए गढ़ी थी। खलीफा क्रोध से लाल-पीला हो गया और उसने आज्ञा दी कि दोनों राजकुमारियों को एक-एक घोड़े की दुम के साथ बाँधकर तब तक घसीटा जाए जब तक वे मर नहीं जातीं। परन्तु अब कासिम की मौत की यह कहानी झूठी मानी जाती है।
असली कारण यह था कि कासिम का महान संरक्षक खलीफा वालिद हजाज और उसका परिवार 715 ई. में मर चुके थे और नया खलीफा सुलेमान हजाज का बड़ा विरोधी था, मुहम्मद को जो हजाज का चचेरा भाई और दामाद था खलीफा की आज्ञा से सिन्ध से निकाल दिया गया और उसे कैदी बनाकर इराक भेज दिया गया, जहाँ उसे सता-सताकर मार डाला गया।
दाहिर की असफलता के कारण:-
(i) सामाजिक फूट:- लोग कई धड़ों तक वर्गों में बँटे हुए थे और वे एक-दूसरे से ईर्ष्या रखते थे। हिन्दू राजा ने बुद्धधर्मी प्रजा पर पाबंदियाँ लगा दीं।
(ii) शासकों की अप्रियता:- लोग अपने शासकों को पसंद नहीं करते थे जो दुर्बल तथा अयोग्य थे।
(iii) सिन्ध की गरीबी:- बंजर भूमि का प्रदेश होने के कारण सिन्ध के साधन बहुत सीमित थे। सिन्ध इतना धनी प्रांत नहीं था कि शत्रुओं का पूरी तरह सामना कर सकता।
(iv) सिन्ध की अलहदगी:- व्यावहारिक रूप से अलग-थलग रहने के कारण सिन्ध भारत के दूसरे भागों से सहायता प्राप्त नहीं कर सका।
(v) लोगों का अन्धविश्वासपूर्ण स्वभाव:- लोग अन्धविश्वास का शिकार थे और अपनी शक्ति पर भरोसा नहीं करते थे।
(vi) दाहिर का अयोग्य नेतृत्व:- राजा दाहिर एक अयोग्य नेता था जिसने शत्रुओं की प्रगति रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया और बहुत-सी गलतियाँ कीं।
(vii) मुसलमानों का धार्मिक जुनून:- अपने धार्मिक जुनून के कारण मुसलमान बड़ी वीरता तथा बड़े जोश से लड़ते थे।
( viii) मुहम्मद-बिन-कासिम का सेनापतित्व तथा उसकी शक्ति:- मुहम्मद की सेना संख्या तथा सामान में कहीं श्रेष्ठ थी और स्वयं भी वह एक निडर तथा अनुभवी सेनापति था।
अरब विजय का भारत पर प्रभाव:-
अरब विजय भारत के इतिहास में एक घटना मात्र थी क्योंकि इसका किसी भी क्षेत्र में कोई पक्का प्रभाव नहीं पड़ा।
(i) राजनैतिक क्षेत्र में:- अरबों ने भारत के केवल एक भाग सिन्ध को ही जीता। भारत के अन्य भाग राजपूतों के अधीन स्वतन्त्र बने रहे।
(ii) सामाजिक क्षेत्र में:- संस्थाओं पर कोई प्रभाव हिन्दुओं के जाति-पाँति को मानने के कारण अरब लोग भारतीय रिवाजों, परम्पराओं तथा न डाल सके।
(iii) धार्मिक क्षेत्र में:- हिन्दुओं ने अपने धर्म को नहीं छोड़ा और इस्लाम की अपेक्षा मौत को पसन्द किया। फिर भी अरबों ने भारत में इस्लाम के बीज बो ही दिए।
(iv) आर्थिक क्षेत्र में:- हिन्दुओं की भूमि अरबों ने हथिया ली परन्तु उनकी खेती-बाड़ी और व्यापार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
(v) सांस्कृतिक क्षेत्र में:- भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता से चुंधिया अरबों ने खगोल विद्या, चिकित्सा, गणित तथा चित्रकारी में भारतीयों से बहुत कुछ सीखा। खलीफाओं ने बहुत से भारतीय विद्वानों को बुलाया कि अरबों को भारतीय संस्कृति के पाठ पढ़ाएँ।
अतः अरब विजय भारत के इतिहास में तो एक घटना मात्र थी पर इस्लाम के इतिहास में नहीं।
अरबों के तुच्छ योगदान के कारण (Causes of Arab's poor legacy in India):-
(i) अरब गलत दिशा से आये:- अरब लोग पंजाब की अपेक्षा सिन्ध की मरुभूमि से होकर आये।
(ii) मुहम्मद-बिन-कासिम की अचानक मृत्यु :- मुहम्मद जिसने सिन्ध और मुलतान को जीत लिया था और जो दूसरे प्रदेशों पर चढ़ाई की तैयारी कर रहा था खलीफा द्वारा सता-सता कर मार डाला गया।
(iii) खलीफों के झगड़े: उमैयद और अबासीद खलीफों में लड़ाई हुई। पहलों की हार और दूसरों की जीत ने भारत में अरबों की बढ़ती हुई सैनिक प्रगति को भारी चोट लगाई।
(iv) तुर्कों का उदय:- तुर्कों के उदय ने भी खलीफा और अरब शक्ति को बहुत धक्का लगाया।
(v) शक्तिशाली राजपूत राज्य:- राजपूतों की बहादुर कौम को हराना और उनके राज्य को जीतना कोई आसान काम नहीं था।
(vi) भारतीयों की जाति-पाँति व्यवस्था:- इस व्यवस्था के कारण भारतीय लोग विदेशियों के सम्पर्क में नहीं आए और इसलिए हमारी सभ्यता पर उनका प्रभाव पड़ना सम्भव ही नहीं था।
(vii) हिन्दुओं की सांस्कृतिक श्रेष्ठता:- भारतीय संस्कृति श्रेष्ठ होने के कारण अरबों ने भारतीयों को सिखाने के बजाय उनसे सीखा।
अरबों का सिंध पर अधिकार तथा उनका प्रशासन (Arab administration and Occupation of Sindh):-
(i) विभाग दर विभाग : प्रान्तों को जिलों में बाँट दिया। हर जिले पर एक अरब फौजी अधिकारी बिठा दिया। उपविभाग भारतीयों के हाथ में रहने दिए गए।
(ii) राज कर सम्बन्धी नीति:- हिन्दुओं की भूमि छीनकर अरबों को दे दी गई। लगान किसी स्थान पर एक-चौथाई था तो दूसरे स्थान पर दो-पाँचवाँ भाग। पुरानी व्यवस्था चलती रही। प्रजा पर अन्य सभी कर और जजिया लगाए जाते रहे।
(iii) न्याय सम्बन्धी व्यवस्था:- मुकदमों का फैसला काजी लोग करते और वह भी इस्लामी कानूनों के अनुसार। हिन्दुओं को कड़ा दण्ड दिया जाता।
(iv) निम्न वर्ग के लोगों की दुःखदायी दशा:- निम्न वर्ग के लोगों से पहले जैसा दुर्व्यवहार होता रहा।
(v) धार्मिक नीति:- आरम्भ में अरबों ने हिन्दुओं पर बड़ा अत्याचार किया परन्तु बाद में उन्होंने हिन्दुओं को अपने देवी-देवताओं की पूजा की आज्ञा दे दी साथ ही उनसे जजिया लेते रहे।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
ब्लॉग पढ़ने के लिए धन्यवाद। यदि कोई उत्तम सुझाव अथवा शिक्षा से संबंधित कोई अन्य टॉपिक जिसको आप जानने के लिए उत्सुक है तो नीचे कमेंट करके बताएं। यदि आपको कोई गलती नजर आ रही है या कोई संदेह है तो भी आप कृपया कमेंट करके अवश्य बताएं।। धन्यवाद।।