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गुलाम वंश

📑सल्तनत वंश

गुरिद साम्राज्य का अंत हो जाता है परंतु इसके सैनिक जनरल कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा अपना शासन स्थापित कर लिया जाता है । अब गुरिद से स्वतंत्र तुर्क गुलाम सरदारों द्वारा दिल्ली सल्तनत की स्थापना की जाती है ।

दिल्ली सल्तनत (Delhi Sultanate) [जेल प्रहरी परीक्षा-2013]

समयावधि

शासन

प्रथम शासक

अंतिम शासक

गुलाम वंश (Slave Dynasty)

1206-1290 

84 वर्ष

कुतुबुद्दीन ऐबक

शम्मुद्दीन कैमुर्स

खिलजी वंश (Khilji Dynasty)

1290-1320

30 वर्ष

जलालुद्दीन खिलजी 

नसीरुद्दीन खुसरो

तुगलक वंश (Tughlaq Dynasty)

1320-1414 

94 वर्ष

गयासुद्दीन तुगलक

नसीरुद्दीन महमूद तुगलक

सैय्यद वंश (Sayyid Dynasty)

1414-1451 

37 वर्ष

खिज्र खाँ 

आलशाह

लोदी वंश (Lodi Dynasty)

1451-1526 ई. 

75 वर्ष

बहलोल लोदी

इब्राहिम लोदी

भारत में तुर्की साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक था। उसके माता-पिता तुर्की थे और उसका जन्म भी तुर्किस्तान में हुआ था। जब वह केवल एक बालक था, उसे एक व्यापारी निशापुर ले गया और वहाँ एक काजी ने उसे दास के रूप में खरीद लिया। काजी ने उसे अपने पुत्रों के साथ धार्मिक व सैनिक प्रशिक्षण दिया। जब काजी की मृत्यु हो गई तो उसके पुत्रों ने उसे एक व्यापारी के हाथ बेच दिया जो उसे गजनी ले गया जहाँ उसे मुहम्मद गौरी ने खरीद लिया। उसके स्वामी ने उसे सेना के एक भाग का अधिकारी बना दिया। उसे अमीर-ए-अखूर (अस्तबलों का अधिकारी) भी नियुक्त किया गया। भारतीय अभियानों में उसने अपने स्वामी की इतनी प्रशंसनीय सेवा की कि 1192 ई. में तराईन  की दूसरी लड़ाई के बाद उसे भारतीय विजयों का प्रबन्धक बना दिया गया। इस प्रकार "केवल शासन-प्रबन्ध के क्षेत्र में ही नहीं, वरन् अपनी विजयों के क्षेत्र को और भी विस्तृत करने में अपने विवेक का प्रयोग करने में उसे पूरी छूट मिल गई।" ऐबक ने दिल्ली के निकट इन्द्रप्रस्थ को अपना केन्द्र बनाया।

अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाने के लिए कुतुबुद्दीन ऐबक ने महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के साथ अपने वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किए। उसने स्वयं ताजुद्दीन यल्दौज की पुत्री से विवाह किया। उसने अपनी बहन का विवाह नासिरुद्दीन कुबाचा(सिंध का प्रभारी) के साथ किया। अपने दास  इल्तुतमिश के साथ उसने अपनी पुत्री का विवाह कर दिया।

1192 ई. में उसने अजमेर और मेरठ में एक विद्रोह का दमन किया। 1194 ई. में उसने अजमेर में दूसरे विद्रोह का दमन किया। उसी वर्ष उसने चन्दवार युद्ध में कन्नौज के शासक जयचन्द्र को परास्त करने में अपने स्वामी की सहायता की। 1197 ई. में उसने गुजरात के भीमदेव को दण्डित किया, उसकी राजधानी में लूटमार की और इसी के मार्ग से दिल्ली लौट आया। 1202 ई. में उसने बुन्देलखण्ड में कालिंजर के किले का घेरा डाला और उस पर अधिकार कर लिया। लूट में उसे बहुत सामान प्राप्त हुआ। सहस्त्रों मनुष्यों को बन्दी बना लिया गया। वह महोबा नगर की ओर बढ़ा और उस पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने बदायूँ पर कब्जा किया जो उस समय भारत के धनी नगरों में से एक था। उसके एक सेनानी इख्तियारुद्दीन ने बिहार व बंगाल के कुछ भाग को जीत लिया। इस प्रकार 1206 ई. में अपने सिंहासनारोहण के पहले कुतुबुद्दीन ऐबक अपनी स्वामी के सेनानी व भारत में उसके प्रतिनिधि के रूप में लगभग सारे उत्तरी भारत पर अधिकार कर चुका था। मुहम्मद गौरी ने कुतुबुद्दीन ऐबक को उपराजसी शक्तियाँ प्रदान कीं और उसे मलिक की उपाधि से सुशोभित किया। 

यलदिज पंजाब की तरफ बढ़ता है और दूसरी तरफ एबक दिल्ली से पंजाब की तरफ। दोनों के मध्य लाहौर में टक्कर होती है और यलदिजू हारकर कोहिस्ताना (वर्तमान पाकिस्तान का उत्तरी भाग) में छिप जाता है। कुतुबुद्दीन एबक  उ.प. सीमा को सुरक्षित कर लेता है और  लाहौर को अपनी राजधानी बना लेता है। इसने गुरिद राजधानी में अपना राजदूत (फिरोज खुह-तुर्किस पर्वतारोही) भेजकर स्वयं को दिल्ली का शासक घोषित करने की मांग की।ग्यासुदीन महमुद ने 1109 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक को भारत का सुल्तान घोषित कर दिया

📑मामलूक/गुलाम वंश( 1206-1210ई. )

मामालुक राजवंश/गुलाम वंश (1206-1210 ई.) [राजस्थान पटवार-24.10.2021 (Shift -1)]

कुतुबुद्दीन एबक

1206-1210ई.

अरामशाह

1210-1211ई. (8 माह शासन)

इल्तुतमिश

1211-1236ई.

रुकनुद्दीन फिरोज

1236ई.

रजिया सुल्तान

1236-1240ई.

मुईजुद्दीन बहरामशाह

1240-1242ई.

अलाउद्दीन मसूद शाह

1242-1246ई.

नासिरुद्दीन महमूद

1246-1266ई.

गियासुद्दीन बलबन

1266-1287ई.

मुईनुद्दीनेन कैकुबाद

1287-1290ई.

शम्मुद्दीन कैमुर्स

1290ई.

गौरी की मृत्यु के बाद गौर का शासक उसका भतीजा ग्यासुद्दीन मुहम्मद बना। मुहम्मद गोरी के तीन विश्वासपात्र ताजुद्दीन यल्दौज, नासिरूद्दीन कुबाचा व कुतुबुद्दीन ऐबक थे। गोरी की मृत्यु के बाद यल्दौज को गजनी, कुबाचा को सिन्ध एवं मुल्तान तथा ऐबक को उत्तर भारत के प्रांत प्राप्त हुए। ऐबक के समय यल्दौज अपने आप को गोरी का वास्तविक उत्तराधिकारी मानने लगा और पंजाब पर आक्रमण कर दिया लेकिन कुतुबुद्दीन ऐबक ने उसे पराजित कर दिया[MPPSC (Pre) Opt. History 2010]। ऐबक ने 1208 ई. में कुछ समय के लिए गजनी पर भी अधिकार कर लिया लेकिन परिस्थितियाँ उसके प्रतिकूल न होने के कारण गजनी छोड़कर लाहौर वापस आ गया। मुईजुद्दीन का एक गुलाम अलइज गाजनी का शासक बना, जो दिल्ली पर दावा करता था। यह दिल्ली का प्रथम मुस्लिम शासक/इल्बारी तुर्क शासक था[UPPCS (Pre) G.S. 2002][UPPCS (Pre) Opt. History 2001]। 

गुलाम वंश की स्थापना 1206 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने किया था[BPSC (Pre) 2004-05, 2011]। वह गौरी का गुलाम था।

नोटः- गुलामों को फारसी में बंदगों कहा जाता है तथा इन्हें सैनिक सेवा के लिए खरीदा जाता था।

कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपना राज्याभिषेक 24 जून, 1206 को किया था। कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपनी राजधानी लाहौर में स्थापित थी[BPSC (Pre) 1996]।

शुरुवात में इसने मलिक व सिपहसालार की उपाधियों के साथ स्वतंत्र शासन करना प्रारंभ किया। 1209 ई. में ग्यासुद्दीन महमूद ( गौरी के भतीजे) ने मुक्ति पत्र व सुल्तान की उपाधि प्रदान की।

कुतुबमीनार की नींव कुतुबुद्दीन ऐबक ने डाली थी।

कुतुबुद्दीन के समय में कुतुबमीनार की केवल पहली मंजिल बन सकी। इल्तुतमिश ने इसे 225 फीट ऊँची चार मंजिल का बना दिया। फिरोज तुगलक के समय विजली गिरने के कारण इसकी चौथी मंजिल नष्ट हो गयी जिसके कारण फिरोज ने इसमें दो छोटी मंजिलें बनवा दी जिससे इसमें पाँच मंजिल हो गयी और ऊँचाई 9 फीट बढ़कर 234 फीट/72.5 मीटर हो गई[CGPSC (Pre) 2023]। सूफी संत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के नाम पर, जिसमें कुवैत उल इस्लाम मस्जिद भी बनाई गई है। इसे 27 हिंदू में जैन मंदिरों को तोड़कर इनके पत्थरों से बनाया गया। यह अफगानिस्तान की 65 मीटर लंबी मीनार-ए-जाम से प्रेरित है जिसे 1194 ई.  में गुरिद सुल्तान गयासुद्दीन ने बनवाया था।  मीनार-ए-जाम को 2002 में यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज के रूप में शामिल कर लिया गया था 

इसे कुतुब परिसर के नाम से भी जाना जाता है जो दिल्ली में है । इसमें कुवैत उल इस्लाम(इस्लाम की विजय) मस्जिद, लोह स्तंभ, कुतुब मीनार, अलाई दरवाजा, अलाई मीनार और इल्तुतमिश का मकबरा आता है ।

दिल्ली का कुवत-उल-इस्लाम मस्जिद मस्जिद का निर्माण ऐबक ने करवाया था।


 




अजमेर का ढाई दिन का झोपड़ा(1192-1199 ई. ) नामक मस्जिद का निर्माण ऐबक ने करवाया था।





कुतुबुद्दीन ऐबक को लाख बख्श (लाखों का दान देनेवाला) भी कहा जाता था[Jharkhand PSC (Pre) G.S. 2003  MPPSC (Pre) Opt. History 2000, 2008]। 

प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय को ध्वस्त करने वाला ऐबक का सहायक सेनानायक बख्तियार खिलजी था।

कुतुबुद्दीन ऐबक एक तुर्क शासक था जिसने भारत में पोलो (चौगान) खेल का प्रचलन करवाया[UPPCS (Pre) G.S. 2001]। ऐबक की मृत्यु 1210 ई. में चौगान खेलते समय घोड़े से गिरकर हो गयी। इसे लाहौर में दफनाया गया[R.A.S/R.T.S. (Pre) Opt. History 2010][IAS (Pre) 2003]

उसने हसन-उन-निजामी व फखरुद्दीन जैसे लेखकों को आश्रय दिया। हसन-उन-निजामी ने ताज-उल-मासिरफखरुद्दीन ने 'तारीख-ए-मुबारिकशाही' की रचना की।

हसन-उन-निजामी का यह विचार है, "उसके आदेशों से इस्लाम के निर्देशों को खूब लागू किया गया और ईश्वर की सहायता से सच्चाई के सूर्य ने हिन्द के प्रदेशों पर अपनी छाया की।" उसने एक मस्जिद दिल्ली में और दूसरी अजमेर में बनवाई।

मिन्हाज के शब्दों में ऐबक एक "उच्च साहस वाला और खुले हृदय का शासक था, वह बहुत उदार भी था।"

'ताज-उल-मासिर' का लेखक हसन निजामी यह बताता है कि ऐबक ने "लोगों को अपने हाथ से न्याय दिया और राज्य में शक्ति व समृद्धि का संचार करने के लिए उसने और परिश्रम किया।"

मिन्हास - उसा - सिराजा ने इसे हातिमताई उपाधि दी।


आराम शाह (1210-11):-

ऐबक का उत्तराधिकारी आरामशाह हुआ, जिसने आठ महीनों तक शासन किया। 

कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के साथ लाहौर में मलिकों व सरदारों ने अचानक "सैनिक वर्ग के हृदयों को सन्तोष देने, साधारण जनता में शान्ति रखने व उपद्रव रोकने के लिए" आराम शाह को गद्दी पर बिठा दिया। आराम शाह के कुतुबुद्दीन से सम्बन्ध के विषय में मतभेद हैं। एक मत यह है कि इल्तुतमिश कुतुबुद्दीन का पुत्र था। मिन्हाज-उस-सिराज इस मत का खण्डन करता है क्योंकि उसके विचार में कुतुबुद्दीन के कोई पुत्र नहीं केवल तीन कन्याएँ थीं। अबुल फजल का विचार है कि आराम शाह कुतुबुद्दीन का कोई सम्बन्धी नहीं था परन्तु उसे इसलिए सत्तारूढ़ किया गया था क्योंकि उस समय स्थित्यानुसार उसी की उपलब्धि हो सकी। इस विषय में कोई भी निश्चित प्रमाण नहीं मिलता। दुर्भाग्यवश आराम शाह एक कमजोर एवं अयोग्य शासक सिद्ध हुआ और इसलिए दिल्ली के लोगों ने उसे अपना शासक स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। विभिन्न प्रान्तों के शक्तिशाली अध्यक्षों ने जैसे सुल्तान के कुबाचा व बंगाल के अली मरदान ने आराम शाह की सार्वभौमिकता मानने से इन्कार कर दिया। देश में गृह युद्ध का भय उठ गया और उसका निराकरण करने के उद्देश्य से बदायूँ के प्रान्ताध्यक्ष इल्तुतमिश को एक निमन्त्रण भेजा गया। शम्मसुद्दीन इल्तुतमिश ने निमन्त्रण स्वीकार किया और दिल्ली के निकट जड (Jud) के स्थान पर उसने आराम शाह को परास्त किया। शायद आराम शाह की हत्या कर दी गई। उसका शासन लगभग आठ महीनों तक रह कर समाप्त हुआ।


इल्तुतमिश(1211-36 ई.):- 

आरामशाह की हत्या करके इल्तुतमिश 1211 ई. में दिल्ली की गद्दी पर बैठा। इसे ''गुलाम का गुलाम'' कहा जाता है[UPPCS (Pre) G.S. 2016]।  

इल्तुतमिश तुर्किस्तान का इल्बरी तुर्क था, जो ऐबक का गुलाम एवं दामाद था। ऐबक ने अपने दास  इल्तुतमिश के साथ उसने अपनी पुत्री का विवाह कर दिया था। इल्तुतमिश ने खोखरों के विरुद्ध संग्राम करके अपनी ख्याति बढ़ा ली। अपनी सेवाओं की मान्यता के उपलक्ष्य में मुहम्मद गौरी के आदेश से इल्तुतमिश को दासता से मुक्ति मिल गई और साथ ही अमीर-उल-उमरा की उपाधि मिल गई। ऐबक की मृत्यु के समय वह बदायूँ का गवर्नर था। इल्तुतमिश लाहौर से राजधानी को स्थानान्तरित करके दिल्ली लाया[UPPCS (Mains) G.S. 2016, 2012, 2008] [UPPCS (Mains) Spl. G.S. 2004][UPPSC Opt. History 2001]।  

मुस्लिम शासक इल्तुतमिश का साम्राज्य दार-उल-इस्लाम का एक भाग माना जाता था।[67th BPSC 2021 Re-exam (30-09-2022]

भारत अरब नहीं है, इसे दारुल इस्लाम में परिवर्तित करना व्यावहारिक रूप से सम्भव नहीं है।"[67th BPSC (Pre) 2022 (Re. Exam.)][UPPCS (Pre) Opt. History 2003]

काजी वजीह-उद्-दीन के नेतृत्व में कुछ विधि ज्ञाताओं ने इल्तुतमिश का इस आधार पर विरोध किया कि वह एक स्वतन्त्र मनुष्य नहीं और उन्होंने अपनी दलील तभी वापस ली जबकि इल्तुतमिश ने उन्हें अपना मुक्तिपत्र दिखाया। 

1229 ई. में बगदाद के अब्बासी खलीफा अलमुस्तान सिर बिल्लाह ने मंसूर/खिल्लत देकर इल्तुतमिश की पुष्टि उस सारे क्षेत्र में कर दी "जो उसने विजित किया था" और उसे सुल्तान-ए-आजम (महान् शासक) की उपाधि प्रदान कीUPPCS (Pre) Opt. History 1998। इल्तुतमिश पहला शासक था, जिसने 1229 ई. में बगदाद के खलीफा से सुल्तान पद की वैधानिक स्वीकृति प्राप्त की, इसलिए इसे दिल्ली क प्रथम वैधानिक सुल्तान कहा जाता है[UPPCS (Pre) Opt. History 1994] दिल्ली का प्रथम सुल्तान इल्तुतमिश ही था जिसने नियमित सिक्के जारी किए[UPPCS (Pre) Opt. History 1998]।  सिक्कों पर इल्तुतमिश ने अपने लिए खलीफा का दूत प्रदर्शित किया।

ताजुद्दीन यल्दौज इल्तुतमिश का एक शत्रु था। उसने अपने को मुहम्मद गौरी का उत्तराधिकारी समझा। 1214 ई. में यल्दौज ने लाहौर पर अपना अधिकार जमा लिया। इल्तुतमिश के लिए यह एक बड़ी असह्य बात थी। वह यल्दौज के विरुद्ध बढ़ा और थानेसर के निकट तरावण/तराई  के युद्ध में उसे परास्त कर दिया। यल्दौज को बन्दी बनाकर बदायूँ के एक दुर्ग में भेज दिया गया, जहाँ बाद में उसकी हत्या कर दी गई।

उच्छ व मुल्तान के प्रांताध्यक्ष नासिरुद्दीन कुबाचा का दमन करने में भी इल्तुतमिश सफल हुआ। 1217 ई. में  मंसूरा का युद्ध हुवा।   सन्धि की शर्तों पर समझौता करने के लिए उसने अपने पुत्र बहराम मसूद को भेजा परन्तु उसको बन्दी बना लिया गया। कुबाचा इतना घबरा गया कि उसने भक्कर से भागने का निश्चय किया किन्तु सिन्ध नदी में डूब जाने से उसकी मृत्यु हो गयी। एक विचार यह भी है कि दुर्घटना में उसकी हत्या हो गई। एक मत यह भी है कि उसने आत्महत्या कर ली। फुतुह उस-सलातिन (किताब) के अनुसार इल्तुतमिश ने यल्दौज के सुल्तान के दावे के जवाब में कहा " "जो सबसे शक्तिशाली है वही राजा बनेगा न की राजा का बेटा राजा ।

कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के बाद अली मरदान ने बंगाल में अपने को स्वाधीन बना लिया और अलाउद्दीन की उपाधि ग्रहण कर ली। परन्तु दो वर्ष बाद उसकी मृत्यु हो गई। उसके बाद उसका पुत्र हिसाम-उद-दीन इवाज उत्तराधिकारी बना। उसने गयासुद्दीन आजिम की उपाधि ग्रहण करके अपने नाम का सिक्का निकाला। उसके नाम का खुतबा भी पढ़ा गया। ऐसी उद्दण्डता के  कारण 1225 ई. में उसने उसके विरुद्ध एक अभियान भेजा और बाद में एक अभियान का स्वयं नेतृत्व किया। जब गयासुद्दीन ने इल्तुतमिश के आने का समाचार सुना तो उसने तुरन्त आधीनता स्वीकार कर ली और कर देने पर सहमत हो गया। कुछ समय बाद उसने विद्रोह का स्वर पुनः उठा दिया। इल्तुतमिश ने उसके विरुद्ध एक दूसरा अभियान भेजा। गयासुद्दीन की पराजय के साथ हत्या भी हो गई और बंगाल पूर्णतया दिल्ली के सिंहासन के आधीन हो गया। जब 1229 ई. में बंगाल के विजेता नासिरुद्दीन का स्वर्गवास हो गया, तो बलका के नेतृत्व में खिलजी मलिकों ने पुनः विद्रोह कर दिया। तब इल्तुतमिश स्वयं एक बड़ी सेना लेकर बंगाल पहुंचा और बलका को परास्त करके अलाउद्दीन जानी को बंगाल का प्रबंधक बना दिया।


राजपूत (Rajputs):- कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के बाद राजपूतों ने तुर्कों को बाहर निकालने का घोर प्रयत्न किया। चन्देलों ने कालिंजर व अजयगढ़ पर पुनः अधिकार कर लिया। प्रतिहारों ने मुसलमानों की सेना को ग्वालियर से निकाल दिया और नगर पर पुनः अधिकार कर लिया। रणथम्बौर के चौहान शासक ने तुर्की सेनाओं को बाहर निकाल दिया और जोधपुर व उसके निकटवर्ती क्षेत्रों को अपने आधीन कर लिया। जालौर के चौहानों ने एक बार फिर अधिकार कर लिया।  भट्टियों ने उत्तरी अलवर में अपनी सत्ता स्थापित कर ली। 

इल्तुतमिश ने  1226 ई. में उसने घेरा डालकर रणथम्बौर जीत लिया और इसके बाद उसने जालौर का घेरा डाला। वहाँ के शासक उदयसिंह ने उसका विरोध किया किन्तु अन्त में उसे आत्मसमर्पण करने पर विवश होना पड़ा। कर चुकाने की शर्त स्वीकार कर लेने पर उसे शासक बने रहने की अनुमति मिल गई। उसने बयाना  पर भी अधिकार कर लिया। कठोर विरोध के बाद अजमेर पर भी उसने अधिकार कर लिया। 1231 ई. में ग्वालियर का भी घेरा डाल दिया गया। वहाँ के शासक मलय वर्मदेव ने वीरता के साथ संग्राम किया किन्तु आत्मसमर्पण करने पर वह विवश हो गया। कालिंजर के शासक त्रिलोक्यवर्मा ने अपना राज्य त्याग दिया जिससे वहाँ लूटमार शुरू हो गई किन्तु चन्देलों ने एक बार फिर मुसलमानों को निकाल दिया। इल्तुतमिश ने स्वयं नागाद के आक्रमण का नेतृत्व किया परन्तु वहाँ के शासक क्षेत्रसिंह ने उसे परास्त किया जिसमें इल्तुतमिश को घोर हानि का सामना करना पड़ा। इल्तुतमिश ने गुजरात के चालुक्यों को दबाने का प्रयत्न किया लेकिन उसे सफलता न मिल सकी। 1234-35 ई. में इल्तुतमिश ने मालवा के एक अभियान का नेतृत्व किया। उसने भिलसा व उज्जैन में लूटमार की।   उज्जैन में महाकाल के मन्दिर को नष्ट किया। सर वुल्जले हेग का यह विश्वास है कि इल्तुतमिश ने मालवा पर विजय करके उसका अपने प्रदेश में विलय कर लिया परन्तु ऐसा ज्ञात होता है कि यह कोई विजय का संग्राम न होकर केवल एक छापा था।

राजपूतों की तरह वर्तमान उत्तर प्रदेश के बहुत से जिलों ने इल्तुतमिश के समय में स्वाधीनता ग्रहण कर ली थी। बदायूँ, कन्नौज, बनारस, कटेहर (रोहेलखण्ड) इत्यादि ऐसे ही जिले थे। किन्तु जैसे ही इल्तुतमिश ने अपनी सत्ता स्थापित कर ली उसने उनके विरुद्ध कदम उठाया। एक-एक करके बदायूँ, कन्नौज व बनारस पर अधिकार कर लिया गया। कटेहर के साथ भी ऐसा ही किया गया। एक अभियान बहरायच भी भेजा गया जिसने वहाँ अधिकार कर लिया। 

काफी कठोर विरोध के बाद अवध पर भी अधिकार कर लिया गया। एक स्थानीय जाति जो अपने नेता बारतू या पिरथू के नेतृत्व में संग्राम कर रही थी उसे परास्त करना कठिन प्रतीत हो रहा था। बहुत अवसरों पर उन्होंने तुकों को परास्त किया और उन्होंने एक लाख से अधिक की सेना का संहार किया। केवल पिरथू की मृत्यु के बाद ही स्थानीय जाति का दमन हुआ। चन्दवार और तिरहुत के विरुद्ध भी अभियान भेजे गए।

चंगेज खाँ(मूल नाम-तेमुचीन)[UPPCS (Pre) G.S. 2015] से बचने के लिए ख्वारिज्म के सम्राट जलालुद्दीन को इल्तुतमिश ने अपने यहाँ शरण नहीं दी थी। चंगेज खाँ ईरानी राजकुमार (ख्वारिज्म युवराज) जलालुद्दीन मँगबरनी का पीछा करते हुए सिन्धु नदी(भारत की उत्तरी- पश्चिमी सीमा) तक आ पहुँचा परंतु उसने भारत पर आक्रमण करने के लिए इस नदी को पार नहीं किया। इल्तुतमिश ने मँगबरनी की सहायता न करके दिल्ली सल्तनत को मंगोल आक्रमण से बचाया[IAS (Pre.)GS-2001] [UPPCS (Pre) G.S. 1993][Chhattisgarh PSC (Pre) Ist G.S., 2013][UPPCS (Main) G.S. Ist Paper 2007][CDS (I) 2020]

Note:- मंगोल चीन के उत्तर में गोवी के रेगिस्तान के निवासी थे। वह एक घूमने-फिरने वाली अर्द्धसभ्य जाति थी तथा उनका मुख्य पेशा घोड़ों और अन्य पशुओं का पालन करना था। वे वहुत गन्दे रहते थे तथा सभी प्रकार का माँस खाते थे । उनमें स्त्री-विषयक नैतिकता का सर्वथा अभाव था यद्यपि माँ का सम्मान करते थे। वे विभिन्न कवीलों में बँटे थे, उन्हीं कवीलों में से एक में 1163 ई. तेमूचिन उर्फ चंगेज खाँ का जन्म हुआ जिसे महान (Chengiz the great) और श्रापित (The Accursed) दोनों पुकारा गया। इसका पिता येसूगाई वहादुर था।

इसने हौज-ए-सुल्तानी का निर्माण देहली-ए-कुहना के निकट करवाया था।





1235 ईस्वी में पंजाब के खोखरों(वामिया नगर इनका केंद्र था) के विरुद्ध इल्तुतमिश का अंतिम विजय थी ।इल्तुतमिश की मृत्यु अप्रैल, 1236 ई. में हो गयी। 

इल्तुतमिश का मकबरा नई दिल्ली के कुतुब कॉम्प्लेक्स में स्थित है। 








इल्तुतमिश के महत्वपूर्ण कार्य:-

1. कुतुबमीनार के निर्माण को पूर्ण करवाया[67th BPSC 2021 (निरस्त ) 08-05-2022]

2. सबसे पहले शुद्ध अरबी सिक्के जारी किए। (चाँदी का टंका एवं ताँबा का जीतल)

3. इक्ता प्रणाली चलाई[UPPCS (Pre) G.S. 2010][UT RO/ARO (M) GS Ist 2017]

4.  विरोधी सरदारों को हराकर 40 वफादार गुलाम अमीरों या सरदारों  का संगठन बनाया, जो तुर्कान-ए-चिहलगानी के नाम से जाना गया।

5. सर्वप्रथम दिल्ली के अमीरों का दमन किया।

इक्ता का अर्थ नकद वेतन के बदले किसी खास भू-भाग का राजस्व अधिन्यास है[UPPCS (Pre) Opt. History 1998]।  यह अरबी भाषा का शब्द है। इक्ता का अर्थ था दिल्ली सुल्तानों के अंतर्गत अधिकारियों को नियत की गई भूमि[RAS/RTS (Pre) Opt. History 95-96]/सैन्य अधिकारियों को समनुदेशित विभिन्न प्रादेशिक इकाईयों से प्राप्त भू-राजस्व[CDS (I) 2016] । इक्ता प्रणाली के अंतर्गत एक अधिकारी को राज्य से तनख्वाह के बदले राजस्व कर का अनुदान दिया जाता था। इक्ता व्यवस्था वंशानुगत नहीं होती थी एवं इक्ता भूमि के प्राप्तकर्ता को इक्तादार कहा जाता था। इस क्षेत्र से प्राप्त लगान की राशि से इक्तादार अपना वेतन व अपनी सेना का खर्च निकालकर शेष राशि केन्द्रीय कोष में जमा कर देता था तथा इस शेष राशि को फवाजिल कहा जाता था।

सम्राज्य के क्षेत्र का विभाजन इक्ता के रूप में किया गया।  वरिष्ठ दरबारी की यहां भेजा गया व 3 जिम्मेदारी थी-

1. राजस्व एकत्र करना

2. कानून व्यवस्था बनाए रखना

3. सुल्तान की सहायता हेतु सेना का गठन

इल्तुतमिश ने शुद्ध अरबी प्रकार के सिक्के टँका (चाँदी का) ब जीतल (तांबे का, 1:48) चलाया। अपने सिक्कों पर इल्तुतमिश ने अपने लिए खलीफा का दूत प्रदर्शित किया।

इल्तुतमिश ने ईरानी (फारसी) राजतंत्रीय परम्पराओं को ग्रहण किया व उन्हें भारतीय वातावरण के अनुकूल समन्वित किया[UPPCS (Pre) Opt. History 2008]। उसने अपने सभी पुत्रों को राजपद हेतु प्रशिक्षित किया क्योंकि उसका मानना था कि “राजा का पद, कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व का ऐसा पद है जिसे केवल योग्य व्यक्ति को ही सौंपना चाहिए।" 

निजामुद्दीन जुनेदी इल्तुतमिश का वजीर और एक योग्य प्रशासक था[UPPCS (Pre) Opt. History 2001, 2007, 2010]। इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद जुनेदी उसके पुत्र फिरोज का भी वजीर नियुक्त हुआ था। रजिया के शासक बनने के बाद जुनेदी ने उसके विरुद्ध षड्यंत्र रचा तथा उसका विरोध किया। किन्तु अन्ततः जुनेदी गुट की पराजय हुई।

महरौली में गंधक की बावली / बावड़ी को बनवाया।

इल्तुतमिश ने नागौर (राजस्थान) में अतारकिन का दरवाजा बनवाया।

डॉ. के.ए. निजामी के अनुसार " ऐबकने दिल्ली सल्तनत की रुपरेखा के बारे में सिर्फी दिमागी खाका बनाया प्या, इल्तुतमिश ने उसे एक व्यक्तित्व, एक पद, एक प्रेरणा शक्ति, एक दिशा, एक शासन व्यवस्था और एक शासक वर्ग प्रदान किया।"

डॉ. आर. पी. त्रिपाटी के अनुसार "इल्तुतमिश दिल्ली  गुलाम वंश का वास्तविक संस्थापक था[UPPCS (Pre) Opt. History 1995]।"

डॉ ईश्वरी प्रसाद के अनुसार " इल्तुतमिश निःसन्देह गुलाम वंश का वास्तविक संस्थापक था।" इल्तुतमिश ने अपनी पुत्री रजिया को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया ।

मिन्हाज-उस-सिराज के विचार में "उस जैसा गुणवान्, दयालु, बुद्धिमानों व धर्मपरायण लोगों के प्रति सम्मान रखने वाला शासक कभी भी सिंहासनारूढ़ नहीं हुआ। कुछ समकालीन विवरणों में इल्तुतमिश को "अल्लाह के इलाकों का संरक्षक” व “ईश्वर के सेवकों का सहायक" भी बताया जाता है। 

'ताबात-ए-नासिरी' के लेखक मिन्हाज-उस-सिराज को इल्तुतमिश ने ही आश्रय दिया था। रूहानी और मलिक ताज-उद्दीन रेजाब के साथ भी ऐसा ही हुआ। इल्तुतमिश के शासन काल में अवफी ने 'जवामी-उल-हिकायत' की रचना की।


रुकनुद्दीन फिरोजशाह (1236ई.):-

इल्तुतमिश के वाद उसका पुत्र रुकनुद्दीन फिरोज गद्दी पर बैठा, वह एक अयोग्य शासक था। इसके अल्पकालीन शासन पर उसकी माँ शाह तुरकान छाई रही  सुल्तान बनने से पहले रुक्नुद्दीन बदायूँ व लाहौर की सरकार का प्रबंध संभाल चुका था। उसने हाथी पर बैठकर दिल्ली की सड़कों की सैर करने व लोगों में धन बाँटने में भी आनंद लिया। मसखरे व जोकर उसके साथी बन चुके थे और इसीलिए उसको विलास-प्रेमी जीव कहा गया है। 

रुक्नुद्दीन ने शासन का कार्य अपनी महत्त्वाकांक्षी माता शाह तुर्कन के हाथों में सौंप दिया। मूलतः वह एक तुर्की दासी थी। उसने उन सब लोगों से बदला लिया जिन्होंने युवावस्था में उसका अपमान किया था। कुछ का पद घटा दिया गया और कुछ की हत्या की गई। इल्तुतमिश के एक पुत्र कुतुबुद्दीन की हत्या कर दी गई। इन सब बातों का यह फल निकला कि चारों ओर विद्रोह उठ खड़े हुए। मुल्तान, हाँसी, बदायूँ व लाहौर के प्रान्ताध्यक्षों ने रुक्नुद्दीन की सत्ता मानने से इंकार कर दिया। यह ठीक है कि नए सुल्तान ने उनके विरुद्ध अभियान किये परन्तु उसने यह देखा कि वजीर मुहम्मद जुनैदी ने उसका साथ छोड़कर विश्वासघात किया है। रजिया की हत्या का एक षड्यंत्र रचा गया जो किसी प्रकार से खुल गया। 

राजिया शाह तुरकान के आंतक से परेशान होकर जुमा के दिन जनता के बीच लाल वस्त्र (न्याय वयाचना का प्रतीक धारण कर नमाज के वक्ता न्याय मांगने पहुंची। दिल्ली की जनता ने राजमहल पर धावा बोलकर शाह व तुरकान दोनों को बंदी बनाकरर रजिया को सुलतान बना दिया। समस्त मुस्लिम सरदार इस अव्यवस्था से तंग आ गए और इसलिए उन्होंने शाह तुर्कन की हत्या कर दी। जब रुक्नुद्दीन अपनी माता की सहायता के लिए आया तो उसको भी हार के साथ अपने प्राणों का दान देना पड़ा। इस प्रकार रुक्नुद्दीन के शासन काल का अन्त हो गया।




रज़िया(1236-1240 ई.):- इल्तुतमिश की पुत्री। [UPPCS (Pre) 2023]  

शाह तुरकान(इल्तुतमिश की पुत्नी) के अवांछित प्रभाव से परेशान होकर तुर्की अमीरों ने रुकनुद्दीन को हटाकर रज़िया को सिंहासन पर आसीन किया। इस प्रकार रजिया बेगम प्रथम मुस्लिम महिला थी जिसने शासन की बागडोर सँभाली । रजिया पहली भारतीय उपमाळीप की महिला शासक और दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाली एकमात्र महिला शासक ।

उसका विरोध प्रसिद्ध तुर्क अमीरों निजामुल मुल्लक जुनैदी, मलिक अलाउद्दीन जानी, मलिक सैफुदीन कुची आदी ने किया। जिसको संतुलित करने हेतु रजिया ने गैर तुर्की सरदारों की नियुक्ती की।

1231-1232 ई. में ग्वालियर अभियान के दौरान दिल्ली की गद्दी र्जिया ने संभाली थी। इससे प्रभावित होकर ग्वालियर से वापस आने पर इल्तुतमिश्र ने रजिया को। अपना उत्तराधिकारी घोषित कर चाँदी के टंके पर उसका नाम अंकित करवाया।रजिया के के काल से ही राजतन्त्र और तुर्क सरदारों (सुल्तानों व अमीरों) के मध्य संघर्ष आरंभ हुआ, जो आगे 30 वर्षी तक चला।

रजिया ने पर्दाप्रथा का त्यागकर व पुरुषों की तरह चोगा (काबा) एवं कुलाह (टोपी) पहनकर राजदरबार  में खुले मुँह से जाने लगी। रज़िया ने मलिक जमालुद्दीन याकूत को किया। 

लाहौर के गवर्नर की बगावत को दबाने के लिए रजिया जाती है तो वापस आते समय इस्तियारुद्दीन ऐतगिन एक षड्यंत्र करके याकूत खान को मार देता है व रजिया को कैद कर लेता है । बगावत करने वालों में तबरहिंद यानी भटिंडा का सूबेदार अल्तूनिया था जिसने इसे बंदी बना लिया था । मगर रजिया अल्तूनिया से शादी कर लेती है और 1240 ईस्वी में गाड़ी को वापस प्राप्त करने के लिए दिल्ली की ओर चलती है । रास्ते में जंगलों में दल चालीसा या चहलगानी षड्यंत्र द्वारा डाकुओं के हाथों  13 अक्टूबर, 1240 ई. को डाकुओं के द्वारा कैथल के पास कर दी गई। गैर तुर्कों को सामंत बनाने के रज़िया के प्रयासों से तुर्की अमीर विरुद्ध हो गए और उसे बंदी बनाकर दिल्ली की गद्दी पर मुइजुद्दीन बहरामशाह को एतगीन के नेतृत्त्व  बैठा दिया। 

मिन्हाज-उस-सिराज के शब्दों में, "रजिया एक महान शासक, कुशाग्र बुद्धि वाली, न्यायप्रिय, हितकारी, विद्वानों को आश्रय देने वाली, न्यायकर्ता, अपनी प्रजा का कल्याण करने वाली और सामरिक गुण को रखने वाली थी, उसमें वे समस्त प्रशंसनीय गुण एवं योग्यताएँ थीं जो एक शासक के लिए आवश्यक हैं। "

यह कहा जाता है कि यदि रजिया स्त्री न होती, तो वह भारत में एक अत्यधिक सफल मुस्लिम शासक सिद्ध होती। उसकी सबसे बड़ी कमजोरी उसका स्त्री होना था। एल्फिस्टन का कहना था कि उसकी "विशेषताएँ व गुण उसको इस कमजोरी से बचाने में अपर्याप्त रहे।" वह एक ऐबेसीनिया निवासी दास जलालुद्दीन याकूत(याकूत खान)  पर अनुचित कृपाओं की वर्षा करने लगी। याकृत को अमीर -ए-आखूर (अस्तबलों का स्वामी) बना दिया गया। 

इब्नबतूता का कहना है कि उसका एक ऐबेसीनिया वाले के प्रति चाव उसके लिए अपराध के समान था, किन्तु एक समकालीन लेखक मिन्हाज-उस-सिराज ने ऐसा कोई संकेत नहीं किया है। वह केवल इतना बताता है कि ऐबेसीनिया निवासी ने सुल्ताना की सेवा में रह कर उसकी कृपाएँ प्राप्त कर लीं। 

फरिश्ता ने उस पर मर्यादा भंग करने का सबसे बड़ा यह आरोप लगाया है कि जो "वह घनिष्ठता है जो ऐबेसीनियाई (याकूत) एवं रानी के बीच इस बात में प्रकट होती थी कि जब रानी घोड़े पर सवार होती थी, तो सदैव वही अपने हाथों से उसे घोड़े पर चढ़ाता था।" 

टामस के विचार में, "ऐसी बात नहीं थी कि अविवाहित रानियों को प्रेम करने की आज्ञा न रही हो। वह किसी विनम्र राजपुत्र पर आसक्त हो सकती थी या हरम के अंधेरे भागों में निर्बाध रूप से विलास कर सकती थी, परन्तु उसकी उच्छृंखलता उसको गलत दिशा की ओर ले चली और वह अपनी राजसभा के बर्बर सेवक के प्रेम में मग्न हो गई। साथ यह स्नेह जिस व्यक्ति के प्रति प्रदर्शित किया जा रहा था, उसको सभी तुर्क सरकार घृणा की दृष्टि से देखते थे। । परन्तु मेजर रावर्टी ने इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया है और उसका यह कथन है कि टामस की विवेचना के पीछे कोई न्यायसंगत कारण नहीं।


मुइजुद्दीन बहरामशाह(1240-42ई.) :-

मुईजुद्दीन बहराम शाह इल्तुतमिश का तीसरा पुत्र था। उसे इस निश्चित विमर्श के साथ गद्दी पर बिठाया गया था कि वह तुर्की मलिकों व अमीरों को उनके कार्यों में बिना कोई हस्तक्षेप किए उनके क्षेत्रों का प्रबंध करने देगा। एक नए पद 'नाइब-ए-मुमलिकत(सम्पूर्ण अधिकार का स्वामी)' का निर्माण किया गया और इस पर इख्तियार उद्दीन आइतिगिन की नियुक्ति की गई। यद्यपि मुहाजिबुद्दीन वजीर बना रहा, परन्तु उसकी स्थिति द्वितीय श्रेणी की हो गई। सारी शक्ति सरदारों व उनके मनोनीत किये गये व्यक्तियों के हाथ में आ गई।

इख्तियार उद्दीन आइतिगिन उन समस्त शक्तियों का प्रयोग करने लगा जिनका प्रयोग पहले सुल्तानों द्वारा किया जाता था। उसने सुल्तान के विशेषाधिकारों तक का प्रयोग किया। उसने सुल्तान की एक बहन के साथ विवाह कर लिया और फिर अपने आप को सुल्तान से भी अधिक शक्तिशाली समझने लगा। सुल्तान के लिए यह व्यवहार सहन करना कठिन हो गया और उसकी हत्या कर दी गई।

बदरुद्दीन सुनकार अमीर-ए-हाजिब था और वह दरबार के चालीस सरदारों में से एक था। वह उस समस्त शक्ति का प्रयोग कर रहा था जिसका प्रयोग पहले नाइब-उल-मुमलिकत द्वारा होता था। बहरामशाह इसे सहन न कर सका और वजीर से मिलकर उसने सुनकार का निर्वासन कर दिया। ज्योंही सुनकार बिना आज्ञा के दरबार में वापस लौटा तो  उसे बन्दी बनाकर मौत के घाट उतार दिया गया।

बहराम शाह के शासन काल में 1241 ई. में तायर के नेतृत्व में मंगोलों ने भारत पर आक्रमण किया। उनका प्रथम निशाना मुल्तान था, किन्तु मुल्तान के प्रान्ताध्यक्ष कबीर खाँ अयाज ने उनका घोर विरोध किया। मुल्तान पर बिना अधिकार किये मंगोल लाहौर की ओर बढ़े और उन्होंने दिसम्बर 1241 ई. में उस पर अधिकार कर लिया। पारस्परिक फूट के कारण सेना सुसज्जित नहीं थी। लाहौर के लोग व व्यापारी जो मध्य एशिया के साथ व्यापार करते थे और जिन्हें मंगोलों से अनुमति पत्र व अन्य सुविधाएँ प्राप्त होती थीं, उन्हें मंगोलों का विरोध अरुचिकर प्रतीत हुआ। वजीर निजाम-उल-मुल्क के नेतृत्व में बहराम शाह ने एक सेना भेजी परन्तु इससे कोई लाभ नहीं हुआ। लाहौर के प्रान्ताध्यक्ष मलिक कराकश ने कुछ समय तक नगर की रक्षा की किन्तु इस कार्य को व्यर्थ समझकर वह नगर छोड़कर भाग गया। नगर पर अधिकार करके उसे लूट लिया गया। लाहौर के निवासियों की हत्या की गई और उसके बाद मंगोल लोग लौट गये। 

सुनकार व आइतिगिन की मृत्यु ने तुर्कों को भयभीत कर दिया और उन्होंने उलेमाओं के साथ मिलकर सुल्तान का विरोध किया। एक षड्यंत्र रचा गया। मुइजुद्दीन बहरामशाह को बंदी बनाकर उसकी हत्या मई, 1242 ई. में कर दी गई। उसके वाद दिल्ली का सुल्तान अलाउद्दीन मसूद शाह बना।


अलाउद्दीन मसूदशाह (1242-46):- 

मसूदशाह ने चार वर्षों तक राज्य किया। वह सुल्तान रुक्नुद्दीन फिरोजशाह का पुत्र और इल्तुतमिश का पौत्र था। उसके समय में तुर्की सरदार सर्वोच्च बने रहे। यह नया सुल्तान 40 सरदारों के पक्ष में अपनी सारी शक्ति त्यागने पर विवश हो गया। उसके पास केवल सुल्तान की उपाधि रह गई। एक बार फिर नाइब-ए-मुमलिकत का पद बना दिया गया और उस पद की पूर्ति मलिक कुतुबुद्दीन हसन द्वारा हुई। शासन व्यवस्था के अन्य महत्त्वपूर्ण पदों पर 'चालीसों' के अन्य सदस्यों का अधिकार हो गया। वजीर मुहाजिबुद्दीन ने वही पद ग्रहण किया जो पहले नाइब के पास था। सरदारों व वजीर के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए और अन्ततः वजीर का निष्कासन कर दिया गया। बलबन को अमीर-ए-हाजिब नियुक्त किया गया। धीरे-धीरे उसने सारी शक्ति अपने हाथों में एकत्र कर ली।

मसूद शाह के शासन काल में बंगाल का प्रांताध्यक्ष तुगर खाँ सुल्तान की सत्ता की अवहेलना कर स्वतंत्र बन गया। उसने बिहार को अपने प्रदेश में मिला लिया और अवध पर आक्रमण करने का प्रयास किया। मुल्तान और उच्छ भी स्वतंत्र बन गए।  1245 ई. में सैफुद्दीन हसन कारलग ने मुल्तान पर आक्रमण किया और उस पर अधिकार कर लिया। 1245 ई. में भारत में फिर मंगोल प्रकट हुए। उन्होंने मुल्तान पर आक्रमण करके हसन कारलग को निकाल दिया। उसके बाद उन्होंने उच्छ का घेरा डाला। सुल्तान महमूद व्यास तक मंगोलों के विरुद्ध बढ़ा किन्तु सुल्तान के आगमन का समाचार सुनकर मंगोलों ने घेरा हटा दिया और भारत छोड़कर चल दिए।

बलवन ने पड्यंत्र के द्वारा 1246 ई. में एक षड्यंत्र ऐसा रच गया जिसमें बलबन के अलावा नासिरुद्दीन महमूद और उसकी माता ने भाग लिया। नासिरुद्दीन महमूद ने एक रोगी पुरुष का भेष बनाकर और बाद में बुरका डालकर राजधानी में प्रवेश कर लिया और मसूद शाह को पदच्युत करके जून 1246 ई. में स्वयं सुल्तान बन गया।


नासिरुद्दीन महमूद (1246-66):- 

अपने सिंहासनारोहण के लिए नासिरुद्दीन महमूद तुर्की सरदारों के प्रति ऋणी था और इसलिए उसके शासन में उनका अत्यधिक प्रभाव होना भी स्वाभाविक था। यह नया सुल्तान उन लोगों के भाग्य से भी परिचित था । जिन्होंने शक्तिशाली सरदारों का विरोध किया था। यह बताया जाता है कि नासिरुद्दीन ने अपनी समस्त शक्ति तुर्की सरदारों के पक्ष में त्याग दी (विशेष कर बलबन के पक्ष में) और केवल नाम मात्र के सुल्तान की भाँति 20 वर्ष तक राज्य कार्य करता रहा। यह भी बताया जाता है कि वह अत्यन्त सादा जीवन व्यतीत करता था और अपना बहुत समय पवित्र कुरान की नकलें बनाने में व्यय करता था। नासिरुद्दीन महमूद ऐसा सुल्तान था जो टोपी सीकर अपना जीवन-निर्वाह करता था।वह इतना सरल स्वभाव का था कि उसने अपनी रानी के लिए एक दासी रखने की अनुमति न दी। यह कहा जाता है कि एक बार भोजन पकाते समय उसकी रानी की उँगलियाँ जल गई और रानी ने अपने लिए एक दासी रखने की प्रार्थना की। सुल्तान ने यह उत्तर दिया कि चूंकि वह राज्य का केवल एक संरक्षक मात्र है, इसलिए वह अपने वैयक्तिक सुखों पर कोई धन नहीं व्यय कर सकता। स्पष्टतया यह सब कुछ असत्य है, क्योंकि उसकी पत्नी बलबन की लड़की थी और इसलिए ऐसी स्त्री से स्वयं भोजन पकाने की आशा करना व्यर्थ था। इसके अतिरिक्त यह भी सत्य है कि उसकी एक से अधिक पत्नियाँ व बहुत से दास थे।

लबन ने अपनी पुत्री का विवाह नासिरुद्दीन महमूद के साथ किया था।  1246 ईस्वी में बलबन को वजीर बनाया गया । 1249 ईस्वी में बलबन को नायब-ए-मुमालिक बनाया गया। लबन को उलुग खाँ की उपाधि प्रदान की गई । 1297 ईस्वी में मंगोल नेता हलुका खाँ ने आक्रमण किया जो हर कर भाग गया । बलबन ने इसके साथ राजनीतिक संबंध स्थापित किए हुए 1259 ई. में इसका राजदूत दिल्ली आया ।  

नासिरुद्दीन महमूद के शासनकाल में भारतीय मुसलमान का बलबन विरोधी दल बन गया जिसका नेतृत्त्व  इमादुद्दीन रिहान था जो धर्म परिवर्तन से बना हुआ मुसलमान था।

नासिरुद्दीन महमूद के चरित्र के विषय में डॉ. पी. सरन का मत अन्य लेखकों से भिन्न है। उनका यह कहना है कि इस सुल्तान ने अपना शासन अत्यन्त उत्साह के साथ शुरू किया परन्तु वह बलबन को पसंद नहीं था क्योंकि वह समस्त सत्ता अपने हाथों में रखना चाहता था। यह सुल्तान अत्यन्त दूरदर्शी था और वह बलबन को चुनौती देने के लिए किसी उपयुक्त अवसर की ताक में था। एक ऐसा समय आया कि बलबन तुर्की सरदारों तथा अपने सम्बन्धियों में अलोकप्रिय हो गया और इस अवसर से लाभ उठाकर उसने बलबन का निर्वासन कर दिया और उसका स्थान इमादुद्दीन रैहान को दे दिया। जिस छोटे काल में रैहान ने कार्य किया उसमें सुल्तान अवश्य सर्वोच्च शासक की भांति कार्य कर सका। जब बलबन पुनः शक्तिशाली हो गया और रैहान को निकाल दिया गया तो उसने बलबन की इच्छा के अनुसार कार्य करने में कोई संकोच नहीं किया। उसने बलबन के आदेश पर अपनी माता मलिका-ए-जहाँ तक को निकाल दिया। सुल्तान ने अपनी सुरक्षा के सामने माता के जीवन की कोई परवाह न की। डॉ. पी. सरन ने यह भी बताया है कि जब नासिरुद्दीन महमूद सुल्तान बना, उस समय वह केवल 17 वर्ष का एक छोकरा था और ऐसी छोटी आयु में उससे विरागी होने की आशा नहीं की जा सकती। ऐसा कोई तत्त्व नहीं मिलता कि सांसारिक कार्यों में सुल्तान को कोई रुचि नहीं थी। इसके विपरीत 'पवित्र युद्ध' करने व काफिरों का दमन करने में सुल्तान ने बड़ी शक्ति व कुशलता का स्पष्ट प्रदर्शन किया। कहा जाता है कि आस-पास के क्षेत्रों में महमूद ने सात अभियानों का नेतृत्व किया। यह संकेत किया जाता है कि अपनी अत्यधिक प्रदर्शित धर्मान्धता के होते हुए भी सुल्तान लोकसत्ता व सुखों को भोगने की उतनी आकांक्षा रखता था जितनी कोई भी भौतिक वस्तुओं का प्रेमी व क्षीण बुद्धि वाला शासक रख सकता था। उसके सच्चे चरित्र का पता उस रीति से चल सकता है जिसे ग्रहण करके उसने मसूद शाह को सिंहासन से हटाया था।


गियासुद्दीन बलवन(1266-1286 ई.):-

वह एक इलबारी तुर्क था। बलवन का वास्तविक नाम बहाउद्दीन था। वह इल्तुतमिश का गुलाम था । तुर्कान-ए-चिहलगानी(इल्तुतमिश द्वारा बनाया गया)  का विनाश बलवन ने किया था। बलवन 60 वर्ष की उम्र में 1266 ई. में गियासुद्दीन बलबन के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठा।

कठिनाइयां:-

  • राजपूत जमीदार
  • मेवातियों का दिल्ली की सीमा पर लूट
  • गंगा यमुना दोआब में लुटेरे व डाकू

 वह मंगोलों के आक्रमण से दिल्ली की रक्षा करने में सफल रहा।

जंगल काटकर अफगानिस्तान सैनिकों की बस्तियां बसाई ।

इसने साम्राज्य विस्तार की जगह साम्राज्य सुधार डीकरण में अपना समय बिताया । न्याय व्यवस्था उत्तम श्रेणी की स्थापित की व दीवाने - ए - अर्ज  नामक सैन्य विभाग की स्थापना की। बदायूं के गवर्नर व अवध के गवर्नर के पिता द्वारा दास के साथ दुर्व्यवहार करने पर दरबार में कोड़े लगवाए गए।

इसने सुल्तान को जिल्ले अल्लाह (अल्लाह की छाया) वह नियमित- ए -खुदाई अर्थात् ईश्वर का प्रतिनिधि कहा । इसने स्वयंको दंतकथा की ईरानी बादशाह आफ्रासियाब का वंशज बताया। 

सीरी नामक नया नगर बलवन ने बसाया था। राजदरबार में सिजदा(लेट कर प्रणाम करना) एवं पबोस प्रथा(बादशाह के पांव चूमना) की शुरुआत बलबन ने की थी। बलबन ने फारसी रीति-रिवाज पर आधारित ईरानी त्यौहार नवरोज (फ़ारसी साल का पहला दिन) उत्सव को प्रारंभ करवाया। यह प्रथा ईरानी मूल की थी जो गैर इस्लामिक मानी जाती थी ।  अपने विरोधियों के प्रति बलबन ने कठोर 'लौह एवं रक्त' की नीति का पालन किया। नासिरुद्दीन महमूद ने बलवन को उलूग खाँ की उपाधि प्रदान की। बलवन आखेट अभियान के वहाने अपनी सेना को लंबी दूरी तक कवायद कराकर दुरुस्त रखता था। बलवन के दरबार में फारसी के प्रसिद्ध कवि अमीर खुसरो एवं अमीर हसन रहते थे। अमीर खुसरो 7 सुल्तानों के दरबार में रहा वहसाहित्यिक जीवन इसने बलबन के दरबार से प्रारंभ किया था ।

इसका पुत्र शहजादा महमूद  मुल्तान का गवर्नर था, जो 1285 ईस्वी में मंगोल से लड़ता हुआ मारा गया । इसका एक पुत्र  बुगरा खाँ  बंगाल का गवर्नर था जिसने 1287 ईस्वी में बंगाल में स्वतंत्रता घोषित कर दी और 40 वर्षों तक वहां शासन करता रहा ।

बलबन ने कुलीनों को महत्व दिया । इसने अपने एक अधिकारी अली को तुगरिल कुश की उपाधि दी ।

बलबन ने राजत्त्व  सिद्धांत फारस(ईरान) से ग्रहण किया जो नक्सलवाद पर आधारित था । बलबन ने एक अत्यन्त कुशल जासूस व्यवस्था का संगठन किया। बलबन ने अपने पुत्र बुगरा खाँ के समक्ष राजपद के विषय में अपने विचारों की इस प्रकार व्याख्या की "राजा का हृदय ईश्वर की कृपा का विशेष कोष है और इस सम्बन्ध में मानव जाति में कोई भी उसके समान नहीं।"


1279 ईस्वी में बंगाल के सूबेदार तुगरिल खाँ के विद्रोह है को दबाया ।

लेनपूल महोदय के विचार में, "बलबन जो एक दास, आखेटकर्ता, सेनानी, राजनीतिज्ञ व सुल्तान रहा, दिल्ली के सुल्तानों की लम्बी श्रेणी में अत्यधिक ख्याति प्राप्त मनुष्यों में एक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति है।"




गुलाम वंश का अंतिम शासक शम्मुद्दीन कैमुर्स था।



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  राजस्थान नगरपालिका ( सामान क्रय और अनुबंध) नियम , 1974 कुल नियम:- 17 जी.एस.आर./ 311 (3 ) – राजस्थान नगरपालिका अधिनियम , 1959 (1959 का अधिनियम सं. 38) की धारा 298 और 80 के साथ पठित धारा 297 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए , राज्य सरकार इसके द्वारा , निम्नलिखित नियम बनाती हैं , अर्थात्   नियम 1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ – ( 1) इन नियमों का नाम राजस्थान नगरपालिका (सामान क्रय और अनुबंध) नियम , 1974 है। ( 2) ये नियम , राजपत्र में इनके प्रकाशन की तारीख से एक मास पश्चात् प्रवृत्त होंगे। राजपत्र में प्रकाशन:- 16 फरवरी 1975 [भाग 4 (ग)(1)] लागू या प्रभावी:- 16 मार्च 1975 [ 1. अधिसूचना सं. एफ. 3 (2) (75 एल.एस.जी./ 74 दिनांक 27-11-1974 राजस्थान राजपत्र भाग IV ( ग) ( I) दिनांक 16-2-1975 को प्रकाशित एवं दिनांक 16-3-1975 से प्रभावी।]   नियम 2. परिभाषाएँ – इन नियमों में , जब तक संदर्भ द्वारा अन्यथा अपेक्षित न हो , (i) ' बोर्ड ' के अन्तर्गत नगर परिषद् ( Municipal Council) आती है ; (ii) ' क्रय अधिकारी ' या ' माँगकर्त्ता अधिकार...

1781 ई. का एक्ट ऑफ सेटलमेंट

1781 ई. का Act of settlement(बंदोबस्त कानून) 👉 1773 ई. के रेगुलेटिंग एक्ट के दोषों को दूर करने के लिए ब्रिटिश संसद के प्रवर समिति के अध्यक्ष एडमंड बर्क के सुझाव पर इस एक्ट का प्रावधान किया गया। 👉 इसके अन्य  नाम - संशोधनात्मक अधिनियम (amending act) , बंगाल जुडीकेचर एक्ट 1781 इस एक्ट की विशेषताएं:- 👉कलकत्ता के सभी निवासियों को सर्वोच्च न्यायालय के अधिकर क्षेत्र के अंतर्गत कर दिया गया। 👉 इसके तहत कलकत्ता सरकार को बंगाल, बिहार और उड़ीसा के लिए भी विधि बनाने का अधिकार दे दिया गया। अब कलकत्ता की सरकार को विधि बनाने की दो श्रोत प्राप्त हो गए:-  1. रेगुलेटिंग एक्ट के तहत कलकत्ता प्रेसिडेंसी के लिए 2. एक्ट ऑफ सेटलमेंट के अधीन बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा के दीवानी प्रदेशों के लिए 👉 सर्वोच्च न्यायालय के लिए आदेशों और विधियों के संपादन में भारतीयों के धार्मिक व सामाजिक रीति-रिवाजों तथा परंपराओं का ध्यान रखने का आदेश दिया गया अर्थात् हिंदुओं व मुसलमानों के धर्मानुसार मामले तय करने का प्रावधान किया गया । 👉 सरकारी अधिकारी की हैसियत से किए गए कार्यों के लिए कंपनी ...

राजस्थान के दुर्ग

  दुर्ग

वैश्विक राजनीति का परिचय(Introducing Global Politics)

🌏 वैश्विक राजनीति का परिचय( Introducing Global Politics)

ऐतिहासिक संदर्भ(Historical Context)

 🗺  ऐतिहासिक संदर्भ(Historical Context)

अरस्तू

🧠   अरस्तू यूनान के दार्शनिक  अरस्तू का जन्म 384 ईसा पूर्व में मेसीडोनिया के स्टेजिरा/स्तातागीर (Stagira) नामक नगर में हुआ था। अरस्तू के पिता निकोमाकस मेसीडोनिया (राजधानी–पेल्ला) के राजा तथा सिकन्दर के पितामह एमण्टस (Amyntas) के मित्र और चिकित्सक थे। माता फैस्टिस गृहणी थी। अन्त में प्लेटो के विद्या मन्दिर (Academy) के शान्त कुंजों में ही आकर आश्रय ग्रहण करता है। प्लेटो की देख-रेख में उसने आठ या बीस वर्ष तक विद्याध्ययन किया। अरस्तू यूनान की अमर गुरु-शिष्य परम्परा का तीसरा सोपान था।  यूनान का दर्शन बीज की तरह सुकरात में आया, लता की भांति प्लेटो में फैला और पुष्प की भाँति अरस्तू में खिल गया। गुरु-शिष्यों की इतनी महान तीन पीढ़ियाँ विश्व इतिहास में बहुत ही कम दृष्टिगोचर होती हैं।  सुकरात महान के आदर्शवादी तथा कवित्वमय शिष्य प्लेटो का यथार्थवादी तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला शिष्य अरस्तू बहुमुखी प्रतिभा का धनी था। मानव जीवन तथा प्रकृति विज्ञान का शायद ही कोई ऐसा पहलू हो, जो उनके चिन्तन से अछूता बचा हो। उसकी इसी प्रतिभा के कारण कोई उसे 'बुद्धिमानों का गुरु' कहता है तो कोई ...

1726 ईस्वी का राजलेख

1726 ईस्वी का राजलेख इसके तहत कलकात्ता, बंबई तथा मद्रास प्रेसिडेंसीयों के गवर्नर तथा उसकी परिषद को विधि बनाने की शक्ति प्रदान की गई, जो पहले कंपनी के इंग्लैंड स्थित विद्युत बोर्ड को प्राप्त थी।  यह सीमित थी क्योंकि - (1) यह ब्रिटिश विधियों के विपरीत नहीं हो सकती थी। (2) यह तभी प्रभावित होंगी जब इंग्लैंड स्थित कंपनी का निदेशक बोर्ड अनुमोदित कर दे। Charter Act of 1726 AD  Under this, the Governor of Calcutta, Bombay and Madras Presidencies and its Council were empowered to make laws, which was previously with the Company's Electricity Board based in England.  It was limited because -  (1) It could not be contrary to British statutes.  (2) It shall be affected only when the Board of Directors of the England-based company approves.