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राजस्थान-एक सामान्य परिचय (Rajasthan - A General Introduction)

🔎 राजस्थान-एक सामान्य परिचय

(Rajasthan - A General Introduction)

राजस्थान के नाम के साथ ही एक प्रतिबिम्ब उभरता है, यहाँ के गौरवमय इतिहास का, वीरता एवं शौर्य की गाथाओं का और साथ ही उभरता है मरुस्थल में विस्तृत बालुका स्तूपों एवं रेत के सागर का दृश्य, अरावली की श्रृंखलाओं का फैलाव तथा चम्बल नदी के बहाव का दृश्य। राजस्थान एक ऐसा प्रदेश है, जहाँ भूगोल और इतिहास एकाकार हो गया है और यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि इस प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियों ने न केवल यहाँ के इतिहास को एक दिशा दी है, अपितु यहाँ के सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक परिवेश को नियन्त्रित एवं निर्धारित किया है और न केवल भारत अपितु विश्व में इसकी विशिष्ट पहचान बनाई है। विपरीत प्राकृतिक परिस्थितियों में भी यहाँ जीवन पुष्पित एवं पल्लवित होता रहा है, जो मानव का प्रकृति से सामंजस्य का प्रतीक है। आज राजस्थान अपनी सांस्कृतिक धरोहर को संजोये हुए विकास के पथ पर अग्रसर है। जिसके प्रतीक हैं- इन्दिरा गाँधी नहर, नदियों पर बने बाँध, सिंचाई से लहराते खेत, आणविक एवं ताप विद्युतगृह, औद्योगिक संयंत्र, रेल एवं सड़कों का जाल, व्यापारिक प्रतिष्ठान एवं विकसित पर्यटन स्थल। विकास की दिशा में यह मात्र प्रारम्भ है, जिसको नवीन गति एवं दिशा के माध्यम से तीव्र करने की आवश्यकता है और इसमें संदेह नहीं है कि प्रशासन और जन-सहयोग से यह कार्य अवश्य पूर्ण होगा और राजस्थान राज्य निरन्तर प्रगति के पथ पर अग्रसर होता जायेगा।

 

राज्य निर्माण की पृष्ठभूमि (Background of State Formation):-

वर्तमान राजस्थान का निर्माण ऐतिहासिक घटनाक्रम का प्रतिफल है। यह क्षेत्र प्राचीन काल से मानव को प्रश्रय देता रहा है तथा प्राचीन सभ्यताओं से जुड़ा हुआ था। यह तथ्य राज्य के अनेक भागों के उपलब्ध पुरातत्त्व अवशेषों से स्पष्ट होता है, जो कालीबंगा(हनुमानगढ़), रंग महल(हनुमानगढ़), बूढ़ा पुष्कर(अजमेर), आहड़ घाटी(उदयपुर), बालाथल(उदयपुर), ईशपाल(उदयपुर), लूनी बेसिन, साँचोर(जालौर) आदि से प्राप्त हुए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि यहाँ 6 से 10 हजार वर्ष पूर्व मानव निवास करता था। राज्य के उत्तरी भाग में सरस्वती नदी के प्रवाह के प्रमाण हैं तथा वर्तमान घग्घर नदी के तल को उसी का अवशिष्ट माना जाता है। कालान्तर में जलवायु परिवर्तनों के फलस्वरूप यहाँ का सम्पूर्ण परिदृश्य भी परिवर्तित हो गया और प्राचीन इतिहास काल के गर्भ में समा गया।

 

राजस्थान प्रदेश का विशाल क्षेत्र भिन्न-भिन्न इकाइयों में विभक्त रहा है। प्राचीन काल में भी यहाँ के विभिन्न क्षेत्रों को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता रहा है। प्राचीन भारत में:-

  • गंगानगर के निकट के प्रदेश को योद्धेय,
  • अलवर के समीपवर्ती प्रदेश को कुरु,
  • भरतपुर, करौली, धौलपुर क्षेत्र को शौरसेन,
  • कोटा-बूंदी क्षेत्र को हयहय,
  • जयपुर-टोंक के क्षेत्र को विराट,
  • नागौर के चारों ओर का प्रदेश अहिच्छत्रपुर,
  • जोधपुर-पाली क्षेत्र गुर्जर प्रदेश,
  • बीकानेर क्षेत्र जांगल,
  • बाड़मेर क्षेत्र श्रीमाल (बाद में भीनमाल) बाड़मेर,
  • जैसलमेर क्षेत्र वल्ल और ढुंगल,
  • जालौर को स्वर्णगिरि,
  • सिरोही-आबू क्षेत्र को चन्द्रावती,
  • उदयपुर-चित्तौड़गढ़ क्षेत्र शिवि,
  • डूंगरपुर-बाँसवाड़ा क्षेत्र बागड़ आदि नामों से पुकारा जाता था।

विभिन्न भौगोलिक विशेषताओं के आधार पर भी राजस्थान के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के नाम थे:-

  • माही नदी के क्षेत्र को 'कांठल' कहा जाता था।
  • प्रतापगढ़ एवं बाँसवाड़ा के मध्य के 56 ग्राम समूह को 'छप्पन' का मैदान कहा जाने लगा।
  • डूंगरपुर-बाँसवाड़ा के बीच के भाग को 'मेवल' और 'देवालिया' कहा जाता था।
  • भैंसरोडगढ़ से बिजौलिया के पठारी भाग को 'उपरमाल का पठार' कहते हैं।
  • जयपुर के आसपास के ढूँढ नदी के प्रवाह क्षेत्र को 'ढूंढाड़' तथा
  • चूरू सरदार शहर क्षेत्र को 'थली' कहा जाता था।

प्रचलित बोलियों के आधार पर भी राज्य के कतिपय क्षेत्रों का नामकरण हुआ है, जिसमें स्थानीय तत्कालीन राजा के गोत्र को भी समाहित किया गया।  

  • कोटा, बूँदी, बारां, हाड़ौती बोली तथा हाड़ा शासकों के आधार पर 'हाड़ौती' क्षेत्र,
  • झुन्झुनूँ-पिलानी, सीकर की शेखावाटी बोली तथा शेखावातों के कारण 'शेखावाटी' क्षेत्र कहा जाता है।
  • मेवाड़ी तथा मेवाड़ शासकों का उदयपुर-भीलवाड़ा-चित्तौडगढ़ क्षेत्र 'मेवाड़' कहलाया।
  • डूंगरपुर-बाँसवाड़ा क्षेत्र में बागड़ी बोली के प्रचलन से इसे 'बागड़' का नाम दिया गया तथा
  • पश्चिमी राजस्थान की मारवाड़ी बोली के प्रचलन इसे 'मारवाड़' प्रदेश के नाम से पुकारा जाता है।

निःसन्देह उपर्युक्त नामकरण राज्य के भौगोलिक, ऐतिहासिक एवं समृद्ध सांस्कृतिक स्वरूप के परिचायक हैं। प्रादेशिक नामकरण की श्रृंखला में नामों का समय-समय पर परिवर्तन भी होता रहा, जो नीचे तालिका से स्पष्ट है:-

राजस्थान के प्रादेशिक नामों के परिवर्तन का स्वरूप

क्र.सं.         

प्राचीन/ऐतिहासिक नाम

मध्यकालीन/अन्य नाम

वर्तमान जिला/स्थान

1.

योद्धेय

जोहायावाटी

गंगानगर

2.

जांगल

भटनेर

बीकानेर

3.

अहिच्छत्रपुर

अहिपुर

नागौर

4.

गुर्जर

गुरुजाना

मण्डोर-जोधपुर

5.

शाकंभरी सांभर

अजयमेरु

अजमेर

6.

श्रीमाल स्वर्णगिरि

गोलोर भीनमाल

बाड़मेर

7.

वल्ल

पुंगल

जैसलमेर

8.

अर्बुद

चन्द्रावती

सिरोही

9.

विराट

रामगढ़

जयपुर

10.

शिवि

चित्तौड़

उदयपुर

11.

कांठल

देवलिया

प्रतापगढ़

12.

पालन

दशपुर

झालावाड़

13.

व्याघ्रवाट

बागड़

बाँसवाड़ा

14.

जाबालीपुर

स्वर्णगिरि

जालौर

मध्य काल में यह सम्पूर्ण क्षेत्र छोटे-छोटे राज्यों एवं ठिकानों में बँटा हुआ था, प्रत्येक राज्य का एक राजा अथवा महाराजा था, जो सम्पूर्ण प्रशासन को देखता था। आपसी युद्ध एवं पड़ोसियों से युद्ध होना सामान्य था। मुगल शासकों का यहाँ पर्याप्त प्रभाव रहा, तत्पश्चात् ब्रिटिश काल में प्रत्येक रियासत पर एक पोलिटिकल एजेंट नियुक्त था। यह इतिहास का विषय है, जिसके विस्तार की आवश्यकता यहाँ नहीं। यहाँ संकेत मात्र इसलिए किया गया है कि स्वतन्त्रता से पूर्व यह सम्पूर्ण क्षेत्र विभिन्न इकाइयों में विभक्त था। ब्रिटिश काल में यहाँ के मुख्य भाग को 'राजपूताना' के नाम से पुकारा जाने लगा था, किन्तु 'राजस्थान' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग कर्नल टॉड ने अपनी पुस्तक "एनाल्स एण्ड एन्टीक्वीटीज ऑफ राजस्थान" (1829, लन्दन) में किया, जो कालान्तर में सामान्य हो गया और स्वतंत्र भारत के राज्य निर्माण के पश्चात् यही नाम स्वीकार किया गया।

स्वतंत्रता से पूर्व 23 जून, 1947 को ब्रिटिश संसद ने भारत स्वतंत्रता कानून पारित किया और इसी के अन्तर्गत देशी रियासतों को उनके महाराजाओं की इच्छा पर छोड़ दिया कि वे चाहे तो स्वतंत्र रहें अथवा किसी संघ (भारत या पाकिस्तान) में सम्मिलित हो जाएँ। इससे स्थिति विकट हो गई और जब 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ, तब इस क्षेत्र में 18 रजवाड़े तथा तीन रियासतें (लावा, कुशलगढ़ तथा नीमराना) थीं तथा अजमेर-मेरवाड़ा केन्द्र शासित था। इस विकट स्थिति से निपटने हेतु प्रयास प्रारम्भ हुए और तत्कालीन गृहमंत्री स्वर्गीय सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बड़ी दूरदर्शिता एवं कुशलता से इस कार्य को क्रमिक रूप से पूर्ण किया।

वर्तमान राजस्थान के निर्माण की प्रक्रिया का प्रारम्भ 17 मार्च, 1948 को मत्स्य संघ की स्थापना से हुआ, जिसमें अलवर, भरतपुर, धौलपुर एवं करौली रियासतें थीं। 25 मार्च, 1948 को बाँसवाड़ा, कुशलगढ़, बूँदी, डूंगरपुर, झालावाड़, कोटा, प्रतापगढ़, शाहपुरा और टोंक को मिलाकर अलग संघ बना, जिसे पूर्व राजस्थान कहा गया। इसकी राजधानी कोटा बनाई गई। इसमें उदयपुर रियासत 18 अप्रैल, 1948 को सम्मिलित हुई और इसे संयुक्त राजस्थान नाम दिया गया, जिसकी राजधानी उदयपुर थी। इसमें बीकानेर, जोधपुर, जयपुर और जैसलमेर रियासतें 30 मार्च, 1949 को सम्मिलित हुईं। तब इसे वृहद् राजस्थान नाम दिया गया और जयपुर को राजधानी बनाया गया। पुनर्गठन के अन्तिम चरण में 'मत्स्य संघ' भी 'वृहद् राजस्थान' में 15 मई, 1949 को सम्मिलित हो गया। 26 जनवरी, 1950 को सिरोही रियासत भी इसमें सम्मिलित हो गई और वृहद् राजस्थान के स्थान पर इसे राजस्थान नाम दिया गया। राजस्थान राज्य के निर्माणक्रम को तालिकाबद्ध रूप में निम्नानुसार वर्णित किया जा सकता है:

राजस्थान का एकीकरण: सात चरण

स्तर-क्रम

निर्मित संघ

बनाने की तिथि

सम्मिलित देशी राज्य/रियासतें

प्रथम

मत्स्य संघ

17 मार्च 1948

अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली

द्वितीय

पूर्व राजस्थान

25 मार्च 1948

बाँसवाड़ा, बूँदी, डूंगरपुर, झालावाड़, किशनगढ़, कोटा, प्रतापगढ़, शाहपुरा, टोंक

तृतीय

संयुक्त राजस्थान

18 अप्रैल 1948

उपर्युक्त (I+II) + उदयपुर

चतुर्थ

वृहत् राजस्थान

30 मार्च 1949

उपर्युक्त (II+III+IV) + बीकानेर, जयपुर, जैसलमेर, जोधपुर

पंचम

वृहत् संयुक्त राजस्थान

15 मई 1949

उपर्युक्त (I+II+III+IV) + मत्स्य संघ

षष्ठ

राजस्थान

26 जनवरी 1950

उपर्युक्त सभी (सिरोही, आबूरोड़ को छोड़कर)

सप्तम

पुनर्गठित राजस्थान

1.11.1956

उपर्युक्त सभी + अजमेर, आबूरोड़, सुनेल टप्पा (सिरोंज मध्य प्रदेश को दिया) अर्थात् वर्तमान राजस्थान

उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि 1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम में राजस्थान को पूर्ण राज्य का दर्जा एक नवम्बर, 1956 को दिया गया अर्थात् 1948 से प्रारम्भ हुई राज्य-निर्माण प्रक्रिया 1956 में पूर्ण हुई और वर्तमान राज्य अस्तित्व में आया। उस समय राज्य को प्रशासनिक दृष्टि से 26 जिलों और 5 संभागों में विभक्त किया गया। सन् 1963 में संभाग समाप्त कर दिए गए और 26 जिले रखे गए। 9 अप्रैल, 1991 को तीन नए जिले- बारां (कोटा जिले से), राजसमंद (उदयपुर जिले से) तथा दौसा (जयपुर जिले से) बनाए गए। इसके पश्चात् हनुमानगढ़ (गंगानगर जिले से) तथा करौली (सवाई माधोपुर जिले से) तथा प्रतापगढ़ 26 जनवरी, 2008 को अस्तित्व में आया। संभाग व्यवस्था जो पूर्व में समाप्त कर दी गई थी, पुनः 15 जनवरी, 1987 से प्रारम्भ की जा चुकी है, जिसके अन्तर्गत राज्य 7 संभागों में विभाजित किया गया। 6 अगस्त, 2023 को राज्य सरकार ने 3 नये संभाग एवं 19 नये जिलों के गठन की स्वीकृति दी थी तदनानुसार 10 संभाग और 50 जिले हो गये किन्तु 28 दिसम्बर, 2024 को राज्य सरकार ने निर्णय लेते हुए तीन संभाग (पाली, बांसवाड़ा और सीकर) तथा 9 जिलों को निरस्त कर दिया। अतः वर्तमान में राज्य में 7 संभाग और 41 जिलें है, जिनका विवरण निम्न निम्नलिखित है :-

राजस्थान के 41 ज़िलों की सूची (क्रमानुसार):-

क्र.सं.

ज़िला

क्र.सं.

ज़िला

1.

श्रीगंगानगर

2.

धौलपुर

3.

बीकानेर

4.

चूरू

5.

हनुमानगढ़

6.

करौली

7.

सवाई माधोपुर

8.

जैसलमेर

9.

पाली

10.

दौसा

11.

जयपुर

12.

सिरोही

13.

झुंझुनूं

14.

सीकर

15.

बूँदी

16.

बारां

17.

झालावाड़

18.

कोटा

19.

बाँसवाड़ा

20.

चित्तौड़गढ़

21.

डूंगरपुर

22.

राजसमंद

23.

बाड़मेर

24.

जालौर

25.

भरतपुर

26.

जोधपुर

27.

अलवर

28.

प्रतापगढ़

29.

अजमेर

30.

भीलवाड़ा

31.

नागौर

32.

टोंक

33.

उदयपुर

34.

बालोतरा

35.

ब्यावर

36.

डीडवाना-कुचामन

37.

फलौदी

38.

सलूंबर

39.

खैरथल-तिजारा (नया नाम भर्तृहरि नगर)

40.

डीग

41.

कोटपूतली-बहरोड़

 

 


राज्य के संभाग और उनमें सम्मलित जिलें:-

(1)

जयपुर संभाग

जयपुर, दौसा, सीकर, अलवर, कोटपूतली, बहरोड, खैरथल-तिजारा एवं झुन्झुनूं जिले।

 

(2)

जोधपुर संभाग

जोधपुर, फलोदी, जालौर, पाली, बाड़मेर, बालोतरा, सिरोही एवं जैसलमेर जिले।

 

(3)

भरतपुर संभाग

भरतपुर, डीग, धौलपुर, करौली एवं सवाईमाधोपुर जिले ।

(4)

अजमेर संभाग

भीलवाड़ा, टोंक, नागौर, डीडवाना-कुचामन, अजमेर एवं ब्यावर जिले ।

(5)

कोटा संभाग

कोटा, बूँदी, बारां एवं झालावाड़ जिले।

(6)

 

 

(7)

उदयपुर संभाग

उदयपुर, सलुम्बर, राजसमंद, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, चित्तौड़गढ़ एवं प्रतापगढ़ जिले।

 

स्थिति एवं विस्तार (Location & Extension):-

राजस्थान राज्य भारत के उत्तरी-पश्चिमी भाग में 23°3' से 30°12' उत्तरी अक्षांश से 69°30' से 78°17' पूर्वी देशान्तर के मध्य स्थित है। * राज्य की पश्चिमी सीमा भारत-पाकिस्तान की अन्तरराष्ट्रीय सीमा है, जो 1,070 कि.मी. लम्बी है। इस सीमा को रेडक्लिफ अन्तरराष्ट्रीय सीमा कहा जाता है। राज्य की उत्तरी और उत्तरी-पूर्वी सीमा पंजाब तथा हरियाणा से, पूर्वी सीमा उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश से, दक्षिणी-पूर्वी सीमा मध्य प्रदेश से तथा दक्षिणी और दक्षिणी-पश्चिमी सीमा क्रमशः मध्य प्रदेश तथा गुजरात से संयुक्त है। कर्क रेखा राज्य के दक्षिणी भाग से बाँसवाड़ा नगर के दक्षिण से गुजरती है।

राजस्थान का क्षेत्रीय विस्तार 3,42,239.74 वर्ग कि.मी. में है। अतः यह भारत का क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा राज्य, जो देश के कुल क्षेत्र का 10.41 प्रतिशत है। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह विश्व के अनेक देशों से बड़ा है। यहाँ तक कि इजराइल से 17 गुना, श्रीलंका से पाँच गुना, इंग्लैण्ड से दुगना तथा नार्वे, पोलैण्ड, इटली से भी अधिक क्षेत्रीय विस्तार रखता है। राज्य की उत्तर से दक्षिण तक लम्बाई 826 कि.मी. तथा पूर्व-पश्चिम चौड़ाई 869 कि.मी. है। राज्य की सम्पूर्ण सीमा लगभग 5920 कि.मी. लम्बी है।

 

राजस्थान - मुख्य तथ्य (Rajasthan at a Glance):-

राजस्थान राज्य ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक एवं आर्थिक विशिष्टताओं के कारण विशिष्ट है, जिनका समुचित विवेचन पुस्तक के विभिन्न अध्यायों में किया जाएगा, किन्तु राजस्थान के सम्बन्ध में प्रथम दृष्टया विशिष्ट तथ्य निम्न तालिका से स्पष्ट है-

राजस्थान संबंधी प्रमुख तथ्य

क्र.सं.

क्षेत्र श्रेणी

वर्ष/समय

इकाई

विवरण

1.

क्षेत्रफल

-

वर्ग कि.मी.

3,42,239.74

2.

जनसंख्या

2011

लाख में

685.48

3.

पुरुष

2011

लाख में

355.509

4.

महिला

2011

लाख में

329.97

5.

जनसंख्या घनत्व

2011

प्रति वर्ग कि.मी.

200

6.

लिंग अनुपात

2011

प्रति हजार पुरुषों पर

928

7.

नगरों की संख्या

2011

संख्या

297*

8.

गाँवों की संख्या

2011

संख्या

44,672

9.

साक्षरता दर

2011

प्रतिशत

66.1

10.

कुल सिंचित क्षेत्र

2023-24

लाख हैक्टेयर

129.59

11.

खाद्यान्नों का उत्पादन

2023-24

लाख हैक्टेयर टन

241.86

12.

पशुधन

2019

करोड़ में

5.68

13.

ऊर्जा स्थापित क्षमता

दिसं. 2024 तक

मेगावाट

26,325.19

14.

कच्चा तेल उत्पादन (पेट्रोलियम)

2023-24

दस लाख बैरल

44.01

15.

सड़कें (सभी प्रकार)

2023-24

किलोमीटर

317,121

16.

पंजीकृत मोटर वाहन

2024-25

लाख में

16.24

Source: Some Facts About Rajasthan, 2016

 

* जनगणना विभाग के अनुसार कानून सम्मत नगरों की संख्या (Statutory Towns)- 185

जनगणना के अनुसार नगरों की संख्या (Census Towns)- 112

कुल नगरों की संख्या- 297

 

भारतीय अर्थव्यवस्था में राजस्थान (Rajasthan in Indian Economy):-

राजस्थान राज्य भारतीय गणतंत्र का एक राज्य है अतः देश की अर्थव्यवस्था में इसका महत्त्वपूर्ण योगदान है। यद्यपि राजस्थान आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा राज्य है, किन्तु वर्तमान में विपरीत भौगोलिक परिस्थितियों के होते हुए भी विकासरत है तथा क्रमिक रूप में देश में अपना स्थान बनाता जा रहा है। यहाँ के आर्थिक विकास का अनुमान कृषि, सिंचाई, पशुपालन, खनिज, उद्योग, परिवहन, व्यापार आदि से लगाया जा सकता है। इन सभी तथ्यों का विस्तृत विवेचन अगले अध्यायों में किया जा रहा है। यहाँ मात्र यह संकेत देना आवश्यक है कि प्रत्येक राज्य की देश के विकास में अपनी भूमिका होती है और राजस्थान भी अपने सीमित साधनों से यह भूमिका निभा रहा है।

राजस्थान का क्षेत्रफल 3,42,239 वर्ग किलोमीटर है, जो भारत के कुल क्षेत्रफल का 10.41 प्रतिशत है; अतः क्षेत्रफल की दृष्टि से यह भारत का सबसे बड़ा राज्य है। जनसंख्या की दृष्टि से 2011 में राजस्थान का भारत में स्थान आठवाँ है (यद्यपि आन्ध्रप्रदेश के दो राज्य (तेलंगाना और आन्ध्र प्रदेश) बनने से वर्तमान में सातवाँ स्थान हो गया) 2011 में राजस्थान में भारत की 5.66% जनसंख्या निवास करती है। जनसंख्या वृद्धि की दर यहाँ भारतीय दर से अधिक है। 1971-81 के दशक में यह 33 प्रतिशत थी, जबकि भारत की 24.7 प्रतिशत, इसी प्रकार 1981-91 के दशक में राजस्थान में जनसंख्या वृद्धि दर 28.44 प्रतिशत अंकित की गई, जबकि भारत में यह 23.85 रही। वर्ष 2001 में राजस्थान की दशाब्दी वृद्धि दर 28.33 प्रतिशत अंकित की गई है, जबकि भारत में यह दर 21.34 थी। इसी प्रकार 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार राजस्थान में जनसंख्या वृद्धि दर 21.3 प्रतिशत रही जबकि भारत में यह 17.64 प्रतिशत रही। इस दृष्टि से राज्य में जनसंख्या वृद्धि दर भारतीय औसत से अधिक है, किन्तु वर्ष 1981-91 के दशक से यह कुछ कम हुई है। राजस्थान में वर्ष 2011 में जनसंख्या घनत्व 200 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. रहा, जबकि भारत में यह संख्या 382 है अर्थात् राजस्थान में जनसंख्या विरल है। इसका प्रमुख कारण राज्य की भौगोलिक परिस्थितियाँ विशेषकर मरुस्थली क्षेत्र का अधिक विस्तार, अरावली पर्वत श्रेणियाँ तथा प्रतिकूल जलवायु है।

 

राजस्थान में 2001 में लिंगानुपात 921 रहा, जबकि भारत में 933 था। 2011 में राजस्थान का लिंगानुपात 928 रहा जबकि भारत में यह 940 है। साक्षरता के क्षेत्र में राजस्थान ने अभूतपूर्व प्रगति की है। वर्ष 1991 में भारत के साक्षरता प्रतिशत 52.19 की तुलना में राजस्थान में 38.55 प्रतिशत थी, जो 2001 में 60.41 प्रतिशत हो गई और भारत का साक्षरता प्रतिशत इसी वर्ष में 64.84 प्रतिशत रहा। भारत की तुलना में राजस्थान की साक्षरता का प्रतिशत नीचा है। 2001 में राजस्थान में पुरुष साक्षरता प्रतिशत 75.70 है जो भारत के प्रतिशत 75.26 से अधिक है। जब कि महिला साक्षरता प्रतिशत 43.85 है, जब कि भारत में यह प्रतिशत 53.67 है। वर्ष 2011 की गणना के अनुसार राजस्थान का साक्षरता प्रतिशत 66.1 रहा जबकि भारत में यह 74.04 प्रतिशत अंकित किया गया। राज्य में पुरुष साक्षरता 79.2 और महिला साक्षरता 52.1 अंकित की गई जो भारतीय औसत से कम है।

 

विपरीत भौगोलिक परिस्थितियों- मरुस्थलता, पर्वतीय प्रदेश, अल्प वर्षा आदि के उपरांत भी राजस्थान कृषि उत्पादन में संलग्न है। राजस्थान में देश के कुल कृषिकृत क्षेत्र का 11.87 प्रतिशत है। इस दृष्टि से राजस्थान का स्थान भारत में चौथा है। राजस्थान में कार्यशील जोत का औसत आकार 4.34 हैक्टेयर है, जबकि भारत में यह औसत मात्र 1.68 हैक्टेयर है। यहाँ की अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर है, किन्तु भूमि की उत्पादन क्षमता कम है। राज्य में प्रति हैक्टेयर उत्पादन क्षमता 192 किलोग्राम है, जबकि पंजाब में यह 887 कि.ग्रा., हरियाणा में 508 कि.ग्रा., हिमाचल प्रदेश में 251 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर है। इस दृष्टि से राजस्थान उत्पादन क्षमता में सातवें स्थान पर है। वर्तमान में राजस्थान कुछ कृषि उपजों के उत्पादन में भारत में महत्त्वपूर्ण है। 2024 में देश में बाजरा, सरसों, ग्वार एवं पोषक अनाजों में प्रथम, मूंगफली के उत्पादन में द्वितीय एवं ज्वार, चना, सोयाबीन और कुल दालों में तृतीय स्थान पर है। राजस्थान की अर्थव्यवस्था में पशुधन की विशेष महत्ता है। भारत के पशुधन का 10.7 प्रतिशत राजस्थान में है। राज्य में 2003 की पशुगणना में संख्या 4.91 करोड़ थी। 2007 की पशुगणना के अनुसार राज्य में कुल पशुओं की संख्या 5.66 करोड़ अंकित थी। 2012 की पशुगणना के अनुसार राज्य में पशुओं की कुल संख्या 5.77 करोड़ अंकित की गई। किन्तु 2019 की पशुगणना में यह संख्या घटकर 5.68 करोड़ रही। राजस्थान ऊन उत्पादन में भारत में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है, यहाँ देश के कुल ऊन उत्पादन का लगभग 40 प्रतिशत है। इसी प्रकार देश के कुल दुग्ध उत्पादन का 11 प्रतिशत राजस्थान में होता है।

 

राजस्थान अपने विविध खनिज भण्डारों के लिये जाना जाता है। राज्य में लगभग 46 प्रकार के खनिज उपलब्ध हैं तथा खनिजों की दृष्टि से भारत में इसका दूसरा स्थान है। राजस्थान घिया पत्थर, एस्बेस्टास, स्टेटाइट, फेल्सपार, खड़िया मिट्टी के उत्पादन में भारत में प्रथम स्थान रखता है। अन्य महत्त्वपूर्ण खनिजों में सीसा जस्ता, अभ्रक, इमारती पत्थर, नमक, पन्ना, तामड़ा आदि के अतिरिक्त यहाँ आणविक खनिज जैसे बेरियम, यूरेनियम, लीथियम भी उपलब्ध हैं। पेट्रोल एवं गैस का उत्पादन राज्य में हो रहा है।

 

राज्य में सार्वजनिक क्षेत्र के कारखाने जैसे खेतड़ी का ताँबा संयंत्र, उदयपुर (देबारी) का जिंक स्मेल्टर, अजमेर का हिन्दुस्तान मशीन टूल्स, इन्स्ट्रूमेंटेशन लिमिटेड (वर्तमान में बन्द), कोटा, सांभर साल्ट्स आदि के अतिरिक्त सीमेंट, मर्शीनें, विद्युत यंत्र, कृषि उपकरण, बालबियरिंग, रसायन, प्लास्टिक आदि के यहाँ महत्त्वपूर्ण उद्योग हैं। इसके अतिरिक्त राजस्थान अपने कुटीर उद्योगों के लिए भी भारत में विशिष्ट स्थान रखता है, मूर्ति निर्माण, नक्काशी, आभूषण, लकड़ी का सामान, जूतियाँ, कपड़ों पर रंगाई-छपाई, दस्तकारी आदि में यह अग्रणी है और इन उत्पादित पदार्थों की न केवल भारत अपितु विदेशों में भी माँग रहती है।

 

राजस्थान में ऊर्जा के सीमित साधन हैं। मार्च 2024 में राजस्थान में कुल विद्युत अधिष्ठापित क्षमता 24,783.64 मेगावाट रही। इसमें आधी राज्य में और शेष बाहर से प्राप्त होती है। यहाँ प्रति व्यक्ति विद्युत की खपत 231 किलोवाट है। राज्य में गाँवों के विद्युतीकरण की ओर विशेष ध्यान दिया गया है और मार्च 2024 तक 43,965 गाँवों का विद्युतीकरण कर दिया गया है। जल विद्युत के अतिरिक्त आणविक विद्युत तथा तापीय विद्युत का भी राज्य में उत्पादन होता है। राज्य देश की विद्युत का 3.48% उत्पादन कर बारहवें स्थान पर है। राज्य में सौर ऊर्जा एवं पवन ऊर्जा के विकास की अत्यधिक सम्भावना है, जिसके विकास से ऊर्जा की समस्या को एक सीमा तक दूर किया जा सकता है। राज्य में बाड़मेर-जैसलमेर क्षेत्र में पेट्रोलियम एवं गैस का उत्पादन हो रहा है।

 

राजस्थान में सड़क परिवहन के विकास पर पर्याप्त ध्यान दिया गया है। राज्य में 1950-51 में सड़कों की लम्बाई 17,339 कि.मी. थी, जो 1997 में 76813 कि.मी. हो गई तथा 2003-04 में सड़कों की लम्बाई 1,59,000 कि.मी. हो गई। 2005-06 में सड़कों की लम्बाई 1,67,128 कि.मी., 2006-07 में 1,73,514 कि.मी., 2009-10 में 1,88,534 कि.मी., 2010-11 में 1,89,402 कि.मी., 2011-12 में 1,90,000 कि.मी., 2014-15 में 2,08,342 कि.मी., 2015-16 में 2,17,707 किमी., 2016-17 में 2,26,854 किमी., 2017-18 में 2,36,572 किमी. तथा 2018-19 में 2,64,244 किमी. हो गई। वर्ष 2019-20 में राज्य में सभी प्रकार की सड़कों की लम्बाई 2,69,028 कि.मी. अंकित की गई। राज्य में 2023-24 में कुल सड़कों की लम्बाई 3,01,810.86 किमी. थी जो 2023-24 में 317121 किमी. हो गई। राज्य में सड़कों के विकास पर पर्याप्त ध्यान दिया जा रहा है और 1000 की जनसंख्या वाले अधिकांश गाँवों को सड़क से जोड़ दिया गया है। राज्य में वर्ष 2024-25 में कुल रेलमार्ग की लम्बाई 5893.91 किमी. थी।

 

राज्य में स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार सुविधाओं का निरन्तर विकास हो रहा है। राज्य में पेयजल की कमी है, इसके लिये विशेष प्रयत्न किए जा रहे हैं। कृषि उत्पादों के विपणन हेतु कृषि मण्डियों की स्थापना की गई है, इसमें 238 प्राथमिक मण्डियाँ और लगभग 220 यार्ड हैं। इसी प्रकार राज्य अपने पर्यटन उद्योग के विकास में विशेष प्रयत्नशील है, क्योंकि राजस्थान के प्राकृतिक एवं ऐतिहासिक स्थल विश्व भर से पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। इसके लिए हेरिटेज होटल्स के माध्यम से विदेशी पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसमें राजस्थान की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत को सर्वोपरि स्थान दिया गया है। वर्ष 2024 में यहाँ 23 करोड़ घरेलू तथा 20 लाख विदेशी पर्यटक आये।

 

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि राजस्थान राज्य एक विशिष्ट प्रदेश है, जहाँ भौगोलिक विविधता है। यहाँ के भूगोल ने इस प्रदेश के इतिहास को संजोया है तथा आर्थिक विकास को प्रभावित किया है। राजस्थान-निर्माण के पश्चात् राज्य निरन्तर प्रगति के पथ पर अग्रसर है और भविष्य में यह प्रगति और अधिक होगी। प्रस्तुत पुस्तक में राज्य के भौगोलिक एवं आर्थिक स्वरूप का संक्षिप्त विवेचन है, जिससे राज्य के न केवल वर्तमान स्वरूप को समझा जा सकता है, अपितु भविष्य हेतु नियोजन भी किया जा सकता है।

 

 

 

 

 

 

 

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