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PUBLIC ACCOUNTS COMMITTEE(लोक लेखा समिति)

📃📃लोक लेखा समिति (PUBLIC ACCOUNTS COMMITTEE)📃

 


परिचय (Introduction)

 

हमारे जैसे संसदीय लोकतंत्र में समिति प्रणाली (Committee System) अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। प्रशासनिक उत्तरदायित्व (Administrative Accountability) का विधानमंडल के प्रति होना ऐसे संसदीय प्रणाली का निवार्य शर्त  (sine qua non) है

संसद द्वारा कार्यपालिका (Executive) पर किया जाने वाला नियंत्रण इस मूल सिद्धांत पर आधारित है कि संसद जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है और इसलिए उसे इस बात पर निगरानी रखनी चाहिए कि संसद द्वारा निर्धारित सार्वजनिक नीति किस प्रकार लागू की जा रही है।

 

किन्तु समय के साथ सरकारी गतिविधियों के अत्यधिक विस्तार ने विधानमंडलों का कार्य बहुत जटिल और विविध बना दिया है। संसद, अपने स्वरूप के कारण, सरकार तथा उसकी समस्त गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं रख सकती। अतः समितियों के माध्यम से विधानमंडल के प्रति प्रशासनिक उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना हमारे राजनीतिक तंत्र की विशेष पहचान रही है।

इसी समिति प्रणाली में लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee – PAC) को विशेष महत्व और प्रतिष्ठा प्राप्त है।

 

समिति की उत्पत्ति (Genesis of the Committee)

 

लोक लेखा समिति का गठन पहली बार 1921 में मोंटेग्यूचेम्सफोर्ड सुधारों 1919 (Montague-Chelmsford Reforms) के परिणामस्वरूप किया गया था।

तत्कालीन कार्यकारी परिषद्  (Executive Council) के वित्त सदस्य (Finance Member) इस समिति के अध्यक्ष हुआ करते थे। समिति को सचिवीय सहायता तत्कालीन वित्त विभाग (वर्तमान: वित्त मंत्रालय) द्वारा प्रदान की जाती थी। यह व्यवस्था 1949 तक बनी रही।


अंतरिम सरकार (Interim Government) के समय, तत्कालीन वित्त मंत्री समिति के अध्यक्ष थे। बाद में, 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी वित्त मंत्री ही समिति के अध्यक्ष रहते थे। इस व्यवस्था के कारण स्वाभाविक रूप से कार्यपालिका (Executive) के कार्यों पर स्वतंत्र रूप से विचार रखने और आलोचना करने की समिति की क्षमता सीमित हो जाती थी।

 

26 जनवरी 1950, अर्थात् भारत के संविधान के लागू होने के साथ ही लोक लेखा समिति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ

  • यह समिति स्पीकर के नियंत्रण में कार्य करने वाली संसदीय समिति बन गई
  • समिति के लिए लोकसभा के निर्वाचित सदस्यों में से ही गैर-सरकारी अध्यक्ष (non-official Chairman) को स्पीकर द्वारा नियुक्त किया जाने लगा
  • वित्त मंत्री को समिति का सदस्य बनने से रोक दिया गया, जैसा कि लोकसभा के नियम 309(i) में प्रावधान किया गया है।

 

समिति का गठन (Constitution of the Committee):-

 

लोक लेखा समिति का गठन हर वर्ष लोकसभा के कार्यसंचालन नियमों के अध्याय 26 के नियम 308(1) के तहत् किया जाता है।

लोक लेखा समिति की संरचना इस प्रकार होती है:-

समिति में अधिकतम 22 सदस्य होते हैं। इनमें से 15 सदस्य लोकसभा द्वारा अपने सदस्यों में से प्रत्येक वर्ष एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) द्वारा अनुपातिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत के आधार पर चुने जाते हैं। राज्यसभा अपने सदस्यों में से अधिकतम 7 सदस्यों को इसी प्रकार चुकर समिति में भेजती है।

कोई मंत्री इसका सदस्य निर्वाचित नहीं किया जाता है।


ऐतिहासिक परिवर्तन:-

  • वर्ष 1954–55 से पहले, समिति में केवल लोकसभा के 15 सदस्य होते थे।
  • लेकिन 1954–55 से समिति में राज्यसभा के 7 सदस्य भी शामिल किए जाने लगे।

अध्यक्ष पद में परिवर्तन:-

1966–67 तक समिति का अध्यक्ष स्पीकर द्वारा नियुक्त सत्तारूढ़ दल (Ruling Party) का वरिष्ठ सदस्य होता था।

1967 में पहली बार, स्पीकर ने समिति के अध्यक्ष के रूप में लोकसभा की विपक्ष पार्टी के सदस्य को नियुक्त किया। यह परंपरा आज तक जारी है।

 

कार्यकाल:- समिति के सदस्यों का कार्यकाल एक वर्ष से अधिक नहीं होता[लोकसभा के कार्यसंचालन नियमों के अध्याय 26 के नियम 309(2) के तहत् ]।

 

मंत्रियों से संबंधित नियम:-

  • कोई मंत्री समिति का सदस्य नहीं बनाया जा सकता[ नियम 309(1)]।
  • यदि समिति का कोई सदस्य मंत्री नियुक्त हो जाता है, तो नियुक्ति की तिथि से उसकी समिति की सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाती है।

 

अध्यक्ष का चयन:-   समिति के सभापति की नियुक्ति स्पीकर द्वारा समिति के लोकसभा सदस्यों में से की जाती है।

 

क्षेत्र एवं कार्य (Scope and Functions):-

लोकसभा के कार्यसंचालन नियमों के नियम 308(1) के अनुसार लोक लेखा समिति  कार्य करती है। 

समिति निम्नलिखित की जाँच करती है:-

  • संसद द्वारा भारत सरकार के व्यय हेतु स्वीकृत राशि के विनियोग (appropriation) से संबंधित लेखों (accounts) की जाँच।
  • भारत सरकार के वार्षिक वित्त लेखे (Annual Finance Accounts) की जाँच
  • तथा सदन के समक्ष प्रस्तुत ऐसे अन्य लेखे जिन्हें समिति उचित समझे की जाँच

लेखा परीक्षण (Scrutiny) के दौरान समिति को यह सुनिश्चित करना होता है:-

(a) कि लेखों में दिखाए गए व्यय वास्तव में उस सेवा या उद्देश्य के लिए कानूनी रूप से उपलब्ध थे, और उसी कार्य हेतु उपयुक्त रूप से व्यय किए गए हैं।

(b) कि किया गया व्यय उस प्राधिकरण (authority) के अनुरूप है, जिसके तहत वह व्यय किया गया है।

(c) कि प्रत्येक पुनर्विनियोग (re-appropriation) सक्षम प्राधिकारी द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार ही किया गया है।

 

समिति के अतिरिक्त कर्तव्य:-

(a) कि वह राज्य निगमों, व्यापारिक और विनिर्माण योजनाओं, संस्थाओं एवं परियोजनाओं के आय और व्यय को दर्शाने वाले लेखाओं के विवरण तथा लाभ और हानि लेखाओं के तुलनपत्रों और विवरणों की, जिसे राष्ट्रपति ने तैयार करने की अपेक्षा की हो अथवा जिन्हें विशेष निगम, व्यापारिक या विनिर्माण योजना या संस्था या परियोजना के वित्तपोषण को विनियमित करने वाले सांविधिक नियमों के प्रावधानों के अंतर्गत तैयार किया जाता हो, और उन पर नियंत्रक और महालेखापरीक्षक के प्रतिवेदन की जांच करे

(b) स्वायत्त एवं अर्द्ध-स्वायत्त निकायों के आय-व्यय विवरण की जाँच करनाजिनका लेखा परीक्षण CAG द्वारा या तो राष्ट्रपति के निर्देश पर या संसद की संविधि के द्वारा  कराई जा सकती  है।

(c) उन मामलों में CAG की रिपोर्ट का विचार करना जहाँ राष्ट्रपति ने उनसे किसी राजस्व (receipts) का लेखा परीक्षण करने, या भंडार (stores) तथा स्टॉक (stocks) की जाँच करने के लिए कहा हो।

 

अनधिकृत अतिरिक्त व्यय की स्थिति में समिति का कार्य:-

यदि किसी वित्तीय वर्ष में सदन द्वारा स्वीकृत राशि से अधिक धन किसी कार्य पर खर्च किया गया है, तो समिति प्रत्येक मामले से संबंधित तथ्यों का परीक्षण करती हैऐसे अतिरिक्त व्यय के कारणों का पता लगाती है, तथा आवश्यक समझे जाने पर उचित अनुशंसाएँ प्रस्तुत करती है।

 

जांच  का स्वरूप और क्षेत्र (Nature and Scope of Examination):-

 

समिति का एक महत्वपूर्ण कार्य यह सुनिश्चित करना है कि संसद द्वारा स्वीकृत धन "मांग के दायरे (scope of the demand)" के भीतर ही सरकार द्वारा व्यय किया गया है।

इस वाक्यांश के अंतर्निहित अर्थ निम्नलिखित हैं:-

(i) स्वीकृत अनुदान के विरुद्ध दर्ज व्यय स्वीकृत राशि से अधिक नहीं होना चाहिए।

(ii) किसी विशेष अनुदान के विरुद्ध दर्ज किया गया व्यय उसी प्रकृति का होना चाहिए जो उस अनुदान से सम्बंधित है, कि किसी अन्य से।

(iii) अनुदान राशि का उपयोग केवल उन उद्देश्यों पर होना चाहिए जो विस्तृत मांग (Detailed Demand) में दिए गए हैं; इसे किसी नए कार्य/सेवा पर व्यय नहीं किया जा सकता जो मांग में प्रस्तावित नहीं है।

 

समिति के कार्य केवल व्यय की औपचारिकता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे उसके विवेकपूर्ण उपयोग (wisdom), निष्ठा (faithfulness), और मितव्ययिता (economy) तक विस्तृत हैं। अतः समिति हानियों, निरर्थक व्यय (nugatory expenditure) और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामलों की जाँच करती है।

 

जब किसी सिद्ध लापरवाही के कारण हानि या अनावश्यक खर्च का मामला समिति के समक्ष आता है, तो समिति संबंधित मंत्रालय/विभाग से पूछती है कि उसने ऐसी स्थिति की पुनरावृत्ति रोकने के लिए अनुशासनात्मक या अन्य क्या कार्रवाई की है। ऐसे मामलों में समिति अपनी असहमति व्यक्त कर सकती है, या मंत्रालय/विभाग द्वारा की गई फिजूलखर्ची अथवा नियंत्रण की कमी के विरुद्ध कटु आलोचना दर्ज करा सकती है।

समिति का एक और महत्वपूर्ण कार्य वित्तीय अनुशासन तथा सिद्धांतों से संबंधित मुद्दों पर चर्चा करना है। सिद्धांत एवं प्रणाली से जुड़े प्रश्नों की विस्तृत जाँच समिति के प्रमुख और मान्यता प्राप्त कार्यों में से एक है।

समिति व्यापक अर्थों में नीति संबंधी प्रश्नों से संबंधित नहीं होती। समिति सामान्य यह नीति पर मत व्यक्त नहीं करती, लेकिन यह इंगित करना इसके अधिकार क्षेत्र में है कि नीति के पालना  किसी प्रकार का अपव्यय या धन की बर्बादी तो नहीं  हुई है

 

अनुदानों से अधिक व्यय का नियमितीकरण (Regularisation of Excesses over Grants):-

यदि सरकार द्वारा किसी सेवा पर उसके प्रयोजन के लिए सभा द्वारा अनुदत्त राशि से अधिक धन व्यय किया गया है तो समिति प्रत्येक मामलें के तथ्यों के संबंध में उन परिस्थितियों की जांच करती है जिनके कारण इस प्रकार का अधिक व्यय हुआ और ऐसी सिफारिशें करती है जो वह उचित समझे। 

तत्पश्चात,ऐसे अधिक व्यय के मामलो को संविधान के अनुच्छेद 115 के अनुसार, विनियमितीकरण के लिए सरकार द्वारा सदन के समक्ष लाया जाना आवश्यक होता है। संसद द्वारा ऐसे अधिक व्यय का त्वरित विनियमितीकरण सुगम बनाने के लिए समिति अन्य प्रतिवेदनों से पहले सभी मंत्रालयों / विभागों से संबंधित एक समेकित प्रतिवेदन प्रस्तुत करती है।

 

बचत (Savings):-

समिति, गलत अनुमान अथवा कमियों अथवा प्रक्रिया के अन्य दोषों से होने वाली बचत को भी अधिक व्यय के मामलों को भांति नरमी से नहीं देखती है समिति सुरक्षित अनुमान को भी उतना ही दोषपूर्ण मानती है जितना कि कम अनुमान को। 

 

समिति के कार्य का महत्व एवं महत्ता (Significance and Importance of Committee's Work):-

लोक सभा, करदाताओं के हित में करदाताओं की बड़ी धनराशि को स्वीकृत करते हुए, विस्तारपूर्वक यह जानने की आशा करती है कि यह धनराशि किस प्रकार व्यय की गई है। समिति को यह संतुष्टि होनी चाहिए कि स्वीकृत धनराशि का अभीष्ट उद्देश्य के लिए विवेकपूर्ण ढंग से एवं मितव्ययितापूर्वक व्यय किया गया। 

नियंत्रक-महालेखापरीक्षक सरकार के वार्षिक लेखाओं की जांच करते हैं और गहन जांच के बाद अपनी टिप्पणियों के साथ लेखाओं को सत्यापित करते हैं और राष्ट्रपति को अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हैं जो उन्हें संसद में रखवाते हैं। लोक सभा के लिए उन लेखाओं की विस्तृत जांच करना, जो जटिल और तकनीकी हैं, यदि असंभव नहीं तो मुश्किल है। इसके अलावा, लोक सभा ऐसी जांच के लिए आवश्यक समय नहीं दे सकती। इन कारणों से लोक सभा ने लोक लेखा समिति गठित की है और इसे उन लेखाओं की विस्तृत जांच की जिम्मेदारी सौंपी है। 

समिति का एक और महत्वपूर्ण कार्य वित्तीय अनुशासन और सिद्धांत के बिन्दुओं पर चर्चा करना है। सिद्धांत और व्यवस्था से संबंधित प्रश्नों की विस्तृत जांच करना समिति का एक प्रमुख और स्वीकृत कार्य है।


लोक लेखा समिति का कार्य (The PAC at Work - लोकसभा के कार्य एवं प्रक्रिया संचालन नियम का नियम 308):-

समिति का कार्य काफी हद तक नियंत्रक महालेखापरीक्षक द्वारा की गई संघ सरकार के लेखाओं की लेखापरीक्षा और जांच के परिणामों पर निर्भर करता है। नियंत्रक महालेखापरीक्षक द्वारा की गई लेखा परीक्षा व्यापक और बहुआयामी होती है। जैसे:-

1. लेखा पद्धति लेखापरीक्षा (Accountancy Audit)

2. नियमितता लेखापरीक्षा (Regularity Audit)

3. विनियोग लेखापरीक्षा (Appropriation Audit)

4. औचित्य लेखापरीक्षा अथवा स्वनिर्णयगत लेखापरीक्षा (Propriety or Discretionary Audit)

5. दक्षता-सह-निष्पादन लेखापरीक्षा (Efficiency-cum-Performance Audit)

हाल के वर्षों में, विकासात्मक योजनाओं(developmental schemes) की लेखापरीक्षा में दक्षता-सह-निष्पादन लेखापरीक्षा(performance audit) की तकनीक इस्तेमाल करने का प्रयास किया गया है। लेखापरीक्षा यह जांच करती है कि कार्यान्वयनकर्ता एजेंसियां शुरू की गई विभिन्न योजनाओं के सम्बन्ध में अपने वित्तीय उत्तरदायित्वों का किस सीमा तक समुचित ढंग से निर्वहन कर रही हैं और यह पता लगाती है कि क्या योजनाओं का कार्यान्वयन प्रभावी ढंग से किया जा रहा है तथा उनके प्रचालनों में मितव्ययिता बरती जा रही है और क्या उनसे अपेक्षित परिणाम प्राप्त हो रहे हैं। वास्तव में, लोक लेखा समिति के कार्यकरण में लेखापरीक्षा संस्था महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को अक्सर समिति का "मित्र, दार्शनिक और पथ-प्रदर्शक" कहा जाता है।

समिति, प्रतिवर्ष अपने कार्यकाल के आरम्भ में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के विभिन्न प्रतिवेदनों में शामिल लेखापरीक्षा पैराओं का गहन जांच हेतु चयन करती है। उपर्युक्त के अतिरिक्त, समिति वर्ष के दौरान स्वप्रेरणा से नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के प्रतिवेदनों/पैराओं में शामिल विषयों के अलावा एक या दो विषयों (प्रक्रिया और नियमों के नियम 276 के अनुरूप) का गहन जांच के लिए चयन (suo motu) कर सकती है। विचार-विमर्श करने और समिति के पास उपलब्ध समय को नोट करने के बाद, समिति उन सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषयों/पैराओं का चयन करती है जिनके सम्बन्ध में मौखिक जाँच की जानी है।

 

सिफारिशों पर की गई कार्रवाई (Action Taken on Recommendations):-

किसी भी रिपोर्ट का मूल्य तभी सार्थक होता है जब उस पर उचित  अनुवर्ती कार्यवाही की जाए। समिति सरकार से प्राप्त इन Action Taken Replies का परीक्षण करती है और उत्तरों के वर्गीकरण (classification) के बाद एक Action Taken Report (ATR) संसद में प्रस्तुत करती है

मूल प्रतिवेदन (Original Report) के मामले में सरकार को रिपोर्ट प्रस्तुत होने के 6 महीने के अंदर प्रतिवेदन में अन्तर्विष्ट सिफारिशों पर उसके द्वारा की गई-कार्रवाई अथवा की जाने वाली कार्रवाई से समिति को अवगत कराना होता है। समिति सरकार के की गई-कार्रवाई उत्तरों पर विचार करती है और उत्तरों के उचित वर्गीकरण के बाद, संसद में की गई-कार्रवाई प्रतिवेदन प्रस्तुत किया जाता है। सरकार को की गई-कार्रवाई प्रतिवेदन(Action Taken Report) के अध्याय एक में अंतर्विष्ट सिफारिशों के सम्बन्ध में उसके द्वारा की गई कार्रवाई अथवा की जाने वाली कार्रवाई से भी समिति को अवगत कराना होता है और मूल प्रतिवेदन में अंतर्विष्ट पूर्व सिफारिशों के सम्बन्ध में अंतिम उत्तर भी प्रस्तुत करने होते हैं जिनके सम्बन्ध में या तो पहले कोई उत्तर प्राप्त नहीं हुए थे या केवल अंतरिम उत्तर(Interim Replies) प्राप्त प्राप्त हुए थे (अर्थात Chapter V)। 

इस प्रकार सरकार द्वारा सूचित की गई-कार्रवाई को विवरण के रूप में सभा पटल पर रखा जाता है, जिस पर समिति आगे और कोई टिप्पणी नहीं करती है। यह व्यवस्था न केवल संसद के प्रति कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करती है बल्कि संसद और आम जनता को भी समिति की सिफारिशों पर सरकार के अंतिम उत्तरों के मूल्यांकन में भी समर्थ बनाती है। यह समिति द्वारा विषय की जांच को संपन्न करती है।

 

समिति द्वारा चयन न किए गए लेखापरीक्षा पैराओं पर सरकार द्वारा की गई कार्रवाई पर अनुवर्ती कार्रवाई:-

1981 तक, समिति द्वारा विस्तृत जांच हेतु चयन न नहीं किए गए लेखापरीक्षा पैराओं पर, मंत्रालयों/ विभागों द्वारा की गई-कार्रवाई का पता लगाने की कोई परम्परा नहीं थी। तथापि, विभिन्न लेखापरीक्षा पैराओं में उठाए गए सभी मुद्दों के संबंध में कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करने के मद्देनजर लोक लेखा समिति ने 1982 में यह निर्णय लिया कि वर्ष 1980-81 से लेखापरीक्षा प्रतिवेदनों को उनमें अंतर्विष्ट सभी पैराओं पर की गई उपचारात्मक / सुधारात्मक कार्रवाई को दर्शाते हुए लेखापरीक्षा द्वारा विधिवत रूप से पुनःरीक्षित टिप्पण प्रस्तुत करने के लिए संबंधित मंत्रालयों / विभागों को भेजा जाएगा।


लेखापरीक्षा पैराओं पर मंत्रालय द्वारा की गई सुधारात्मक कार्रवाई के संबंध में, समिति को सूचित करने में बड़ी संख्या में मंत्रालयों द्वारा अत्यधिक विलंब और लगातार असफलता को ध्यान में रखते हुए, समिति ने सिफारिश की कि भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के प्रतिवेदन के सभी पैराओं पर की गई कार्रवाई टिप्पण, प्रतिवेदन के सभा पटल पर रखे जाने की तिथि से चार माह की अवधि के भीतर वित्त मंत्रालय (व्यय विभाग) के माध्यम से समिति को प्रस्तुत किए जाए और निगरानी प्रकोष्ठ, व्यय विभाग इसकी वास्तविक निगरानी के लिए लेखापरीक्षा पैरा निगरानी प्रणाली पोर्टल(APMS Portal) को विकसित एवं प्रचालनरत करें। वर्तमान में समिति के निरंतर प्रयासों के कारण लेखापरीक्षा पैराओं के निपटान संबंधी संपूर्ण प्रक्रिया ऑनलाइन है। लोक लेखा समिति द्वारा की गई पहल के परिणामस्वरूप संबंधित मंत्रालयों/विभागों ने समिति द्वारा की गई सिफारिशों पर उपचारात्मक की गई-कार्रवाई-टिप्पणों और की-गई-कार्रवाई-उत्तरों को समय पर प्रस्तुत करने के लिए अपने प्रशासनिक तंत्र को चुस्त-दुरुस्त किया है। लंबतिता के आंकडों में भारी कमी आई है और समिति का लक्ष्य शून्य लंबितता हासिल करना है।

  

परिणाम:-

समिति के सतत प्रयासों के कारण:

  • पूरी ऑडिट पैरा सेटलमेंट प्रक्रिया अब ऑनलाइन है,
  • मंत्रालयों/विभागों ने अपने प्रशासनिक ढाँचे को मजबूत किया है,
  • Remedial Action Taken Notes और Action Taken Replies समय पर भेजे जाने लगे हैं,
  • लंबित मामलों (pendency) में भारी कमी आई है,
  • और समिति शून्य लंबित (zero pendency) प्राप्त करने का लक्ष्य रखती है।

जनवरी 1950 में समिति के लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) के नियंत्रण में एक संसदीय समिति बनने के बाद से लेकर 30 अप्रैल 2025 तक समिति द्वारा कुल 1804 प्रतिवेदन (Reports) प्रस्तुत किए जा चुके हैं।

 1921 में इसके सभापति श्री डब्ल्यू. एम. हैली थी तथा 1950-51 में काँग्रेस श्री. बी. दास थे। 

नोट:- 1966-67 लोकलेखा समिति के सभापति के सदस्यों से नियुक्त किया जाता था। 

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🧠   अरस्तू यूनान के दार्शनिक  अरस्तू का जन्म 384 ईसा पूर्व में मेसीडोनिया के स्टेजिरा/स्तातागीर (Stagira) नामक नगर में हुआ था। अरस्तू के पिता निकोमाकस मेसीडोनिया (राजधानी–पेल्ला) के राजा तथा सिकन्दर के पितामह एमण्टस (Amyntas) के मित्र और चिकित्सक थे। माता फैस्टिस गृहणी थी। अन्त में प्लेटो के विद्या मन्दिर (Academy) के शान्त कुंजों में ही आकर आश्रय ग्रहण करता है। प्लेटो की देख-रेख में उसने आठ या बीस वर्ष तक विद्याध्ययन किया। अरस्तू यूनान की अमर गुरु-शिष्य परम्परा का तीसरा सोपान था।  यूनान का दर्शन बीज की तरह सुकरात में आया, लता की भांति प्लेटो में फैला और पुष्प की भाँति अरस्तू में खिल गया। गुरु-शिष्यों की इतनी महान तीन पीढ़ियाँ विश्व इतिहास में बहुत ही कम दृष्टिगोचर होती हैं।  सुकरात महान के आदर्शवादी तथा कवित्वमय शिष्य प्लेटो का यथार्थवादी तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला शिष्य अरस्तू बहुमुखी प्रतिभा का धनी था। मानव जीवन तथा प्रकृति विज्ञान का शायद ही कोई ऐसा पहलू हो, जो उनके चिन्तन से अछूता बचा हो। उसकी इसी प्रतिभा के कारण कोई उसे 'बुद्धिमानों का गुरु' कहता है तो कोई ...

1726 ईस्वी का राजलेख

1726 ईस्वी का राजलेख इसके तहत कलकात्ता, बंबई तथा मद्रास प्रेसिडेंसीयों के गवर्नर तथा उसकी परिषद को विधि बनाने की शक्ति प्रदान की गई, जो पहले कंपनी के इंग्लैंड स्थित विद्युत बोर्ड को प्राप्त थी।  यह सीमित थी क्योंकि - (1) यह ब्रिटिश विधियों के विपरीत नहीं हो सकती थी। (2) यह तभी प्रभावित होंगी जब इंग्लैंड स्थित कंपनी का निदेशक बोर्ड अनुमोदित कर दे। Charter Act of 1726 AD  Under this, the Governor of Calcutta, Bombay and Madras Presidencies and its Council were empowered to make laws, which was previously with the Company's Electricity Board based in England.  It was limited because -  (1) It could not be contrary to British statutes.  (2) It shall be affected only when the Board of Directors of the England-based company approves.