जयपुर कांग्रेस द्वारा नियुक्त भाषायी प्रांत समिति की रिपोर्ट
(दिसंबर, 1948)
सदस्य
सरदार वल्लभभाई पटेल
डॉ. पट्टाभि सीतारमैया
पंडित जवाहरलाल नेहरू
जयपुर कांग्रेस द्वारा नियुक्त भाषायी प्रांत समिति की रिपोर्ट :-
जून, 1948 में भारत की संविधान सभा के अध्यक्ष ने आंध्र, केरल और महाराष्ट्र के नए प्रांतों के गठन की जाँच करने तथा उस पर प्रतिवेदन देने के लिए एक आयोग नियुक्त किया। इस आयोग के अध्यक्ष श्री एस. के. धर थे। इस आयोग ने जयपुर कांग्रेस के अधिवेशन की पूर्वसंध्या पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसके बाद कांग्रेस ने एक समिति नियुक्त की, जिसके सदस्य हम हैं, ताकि भाषायी प्रांतों के प्रश्न पर विचार किया जा सके और “कांग्रेस द्वारा पूर्व में लिए गए निर्णयों तथा वर्तमान स्थिति की आवश्यकताओं के आलोक में स्थिति की समीक्षा की जा सके, संविधान सभा के अध्यक्ष द्वारा नियुक्त भाषायी प्रांत आयोग की रिपोर्ट तथा (ii) स्वतंत्रता की प्राप्ति से उत्पन्न हुई नई समस्याओं के संदर्भ में इस प्रश्न की जाँच की जा सके।”
उपरोक्त कांग्रेस प्रस्ताव में इस विषय पर कांग्रेस की पूर्व नीति तथा उत्पन्न हुई नई समस्याओं—दोनों का उल्लेख किया गया है। दूसरे शब्दों में, कांग्रेस चाहती थी कि हम यह विचार करें कि देश में उत्पन्न नई समस्याओं और वर्तमान परिस्थितियों ने कांग्रेस की पुरानी नीति को किस सीमा तक प्रभावित किया है।
कांग्रेस की पुरानी नीति, जिसे अनेक अवसरों पर दोहराया गया था, स्पष्ट रूप से भाषायी प्रांतों के गठन के पक्ष में थी। कुछ हद तक कांग्रेस ने इस सिद्धांत को अपने संगठनात्मक संविधान में भी लागू किया था—आंध्र, केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात का गठन, जहाँ तक कांग्रेस संगठन का संबंध है, किया गया। सिंध को एक पृथक प्रांत बनाए जाने से बहुत पहले ही सिंध कांग्रेस प्रांत का गठन कर दिया गया था। यह भी उल्लेखनीय है कि कांग्रेस संगठनात्मक उद्देश्यों के लिए विद्यमान प्रांतों को भाषायी क्षेत्रों में विभाजित करते समय बंबई नगर को एक पृथक इकाई के रूप में रखा गया था और बंबई नगर के लिए एक प्रांतीय कांग्रेस समिति गठित की गई थी, जो आज भी अस्तित्व में है।
इस प्रकार कांग्रेस ने भाषायी प्रांतों के सामान्य सिद्धांत को अपनी स्वीकृति की मुहर प्रदान कर दी थी। किंतु उसे इस सिद्धांत के व्यावहारिक क्रियान्वयन का सामना नहीं करना पड़ा था और इसलिए इसके व्यावहारिक प्रयोग से उत्पन्न होने वाले सभी निहितार्थों और परिणामों पर उसने विस्तार से विचार नहीं किया था। तथापि, आंध्र और कर्नाटक प्रांतों के गठन के लिए लगातार माँग और आंदोलन चलते रहे। इस सिद्धांत के प्रति कांग्रेस की स्वीकृति आंशिक रूप से इस कारण थी कि ब्रिटिश शासन द्वारा भारत में विद्यमान प्रांतों का निर्माण एक कृत्रिम ढंग से किया गया था। इसका मुख्य कारण यह भी था कि जहाँ तक संभव हो, समरूप सांस्कृतिक इकाइयों का गठन किया जाए, जो इस समरूपता के कारण अपेक्षाकृत अधिक तीव्र गति से प्रगति कर सकें।
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हमारा मत है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में उत्पन्न परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि भाषायी प्रांतों की समस्या को अब एक नए दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। सर्वप्रथम विचार भारत की सुरक्षा, एकता और आर्थिक समृद्धि का होना चाहिए तथा प्रत्येक प्रकार की अलगाववादी और विघटनकारी प्रवृत्ति को कठोरता से हतोत्साहित किया जाना चाहिए। इसलिए भाषायी प्रांतों के गठन की कांग्रेस की पुरानी नीति को केवल तभी लागू किया जा सकता है, जब प्रत्येक मामले में सावधानीपूर्वक विचार किया जाए और ऐसा कोई गंभीर प्रशासनिक अव्यवस्था या आपसी संघर्ष उत्पन्न न हो, जो देश की राजनीतिक और आर्थिक स्थिरता को संकट में डाल दे।
हम यह अधिक उपयुक्त समझते हैं कि कुछ वर्षों के लिए नए प्रांतों के गठन को स्थगित कर दिया जाए, ताकि इस अवधि में हम अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण विषयों पर ध्यान केंद्रित कर सकें और इस प्रश्न से विचलित न हों। तथापि, यदि जनभावना अत्यंत प्रबल और आग्रहपूर्ण हो, तो हमें, लोकतंत्र में विश्वास रखने वालों के रूप में, उसके आगे झुकना पड़ेगा, किंतु भारत के समग्र हित को ध्यान में रखते हुए कुछ सीमाओं और ऊपर उल्लिखित कुछ शर्तों के अधीन। जनभावना को किसी भी प्रकार के आगे के विभाजन के परिणामों को स्पष्ट रूप से समझना चाहिए, ताकि वह अपनी माँग से उत्पन्न होने वाले प्रभावों का पूर्णतः आकलन कर सके।
हमारा यह भी मत है कि सर्वप्रथम आंध्र प्रांत के मामले को लिया जाना चाहिए और उसके क्रियान्वयन के प्रश्न की जाँच की जानी चाहिए, उसके बाद ही किसी अन्य प्रांत के प्रश्न पर विचार किया जा सकता है।
हम स्पष्ट रूप से इस मत के हैं कि वर्तमान समय में उत्तरी भारत के प्रांतों में सीमाओं के परिष्कार (संशोधन) का कोई प्रश्न नहीं उठाया जाना चाहिए, चाहे ऐसे प्रस्ताव में कितनी ही merit क्यों न हो।
नई दिल्ली,
1 अप्रैल, 1949
हस्ताक्षरित/–
वल्लभभाई पटेल
हस्ताक्षरित/–
बी. पट्टाभि सीतारमैया
हस्ताक्षरित/–
जवाहरलाल नेहरू

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