💭💭 JUDJE CASES💭
S.P.
Gupta बनाम भारत के राष्ट्रपति व अन्य (1981)
(First
Judges Case / पहला न्यायाधीश मामला)
मामले का नाम व संदर्भ:-
S.P. Gupta बनाम भारत
के राष्ट्रपति
व अन्य
निर्णय
तिथि:- 30 दिसम्बर 1981
रिपोर्ट:- AIR 1982 SC 149
यह
मामला भारतीय
संविधान के
न्यायिक नियुक्तियों
से संबंधित
एक ऐतिहासिक
निर्णय है।
पीठ (Bench):-
7 न्यायाधीशों
की संविधान
पीठ
मुख्य
निर्णय:- न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती
निर्णय:- 4 : 3 (बहुमत बनाम अल्पमत)
✅
बहुमत
में (कार्यपालिका
के
पक्ष
में)
(Consultation ≠ Concurrence)
1. न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती
2. न्यायमूर्ति वाई. वी. चंद्रचूड़
3. न्यायमूर्ति एस. एम. फज़ल अली
4. न्यायमूर्ति वी. डी. तुलज़ापुरकर
इन्होंने कहा:- नियुक्ति में अंतिम अधिकार सरकार का है।
❌
विपक्ष (अल्पमत – न्यायपालिका
के
पक्ष
में)
1. न्यायमूर्ति पी. एन. शिंगल
2. न्यायमूर्ति डी. ए. देसाई
3. न्यायमूर्ति ई. एस. वेंकटारमैया
इन्होंने कहा कि CJI की राय को प्रधानता मिलनी चाहिए
नोट:- यही अल्पमत आगे चलकर 1993 में बहुमत बना ।
मुख्य संवैधानिक
प्रश्न?
इस मामले में मुख्य रूप से यह प्रश्न उठे:-
1. ‘परामर्श (Consultation)’ का अर्थ क्या है?
संविधान
के अनुच्छेद 124 और 217 में न्यायाधीशों
की नियुक्ति
के लिए “परामर्श” शब्द
का प्रयोग
हुआ है।
प्रश्न
यह था
कि क्या परामर्श
का अर्थ
सहमति (Concurrence) है या
केवल राय
लेना पर्याप्त
है?
2. न्यायपालिका की स्वतंत्रता?
क्या
न्यायाधीशों की नियुक्ति
में कार्यपालिका (Executive) की प्रमुख
भूमिका न्यायपालिका
की स्वतंत्रता
को प्रभावित
करती है?
क्या
न्यायपालिका की स्वतंत्रता
संविधान की
मूल संरचना (Basic Structure) का हिस्सा
है?
3. लोकहित याचिका (Locus Standi)?
क्या
कोई सामान्य
नागरिक भी
सार्वजनिक हित
से जुड़े
संवैधानिक मामलों
में न्यायालय
जा सकता
है?
मामले की पृष्ठभूमि:-
केंद्र
सरकार द्वारा
न्यायाधीशों की नियुक्ति
और स्थानांतरण
से संबंधित
कुछ निर्णय
लिए गए। इन्हें चुनौती देने
के लिए
विभिन्न याचिकाएँ
दायर हुईं। चूँकि मामला पूरे
देश से
जुड़ा था, इसलिए इसे
सर्वोच्च न्यायालय
ने सुना।
✅
सर्वोच्च
न्यायालय
के
प्रमुख
निर्णय:-
1. परामर्श ≠ सहमति:-
न्यायालय
ने कहा कि परामर्श का
अर्थ सहमति
नहीं है।
सरकार
न्यायाधीशों की नियुक्ति
में अंतिम
निर्णय ले
सकती है
अर्थात् मुख्य
न्यायाधीश (CJI) की राय बाध्यकारी
नहीं मानी
गई। इस कारण
इस फैसले
में कार्यपालिका
को अधिक
महत्व दिया
गया।
2. न्यायपालिका की स्वतंत्रता:-
न्यायालय
ने स्पष्ट
किया कि
न्यायपालिका की स्वतंत्रता
संविधान की
मूल संरचना
है। न्यायाधीशों पर किसी
भी प्रकार
का दबाव
लोकतंत्र के
लिए घातक
है।
3. लोकहित याचिका का विस्तार:-
इस
मामले में
Locus Standi को उदार
बनाया गया। यदि कोई मामला
जनहित से
जुड़ा है, तो कोई
भी जागरूक
नागरिक न्यायालय
जा सकता
है। यह निर्णय
आगे चलकर
जनहित याचिका (PIL) के
विकास का
आधार बना।
इस फैसले का महत्व?
इसे
पहला न्यायाधीश
मामला (First Judges Case) कहा जाता
है। इसमें न्यायाधीशों
की नियुक्ति
में सरकार
को प्रधानता
दी गई। बाद में Second Judges Case (1993) और Third Judges Case
(1998) में
इस फैसले
को पलट
दिया गया
और कॉलेजियम
प्रणाली विकसित
हुई।
|
First Judges Case का संक्षिप्त सार |
|
|
विषय |
निर्णय |
|
परामर्श (Consultation) |
सहमति
नहीं है |
|
नियुक्ति में वरीयता |
कार्यपालिका को |
|
न्यायपालिका की स्वतंत्रता |
संविधान
की मूल |
|
संरचनालोकहित याचिका |
दायरा बढ़ाया गया |
Second
Judges Case (1993)
Supreme Court Advocates-on-Record
Association बनाम Union of India (1993)
मामला पहचान (Case Identity):-
निर्णय
वर्ष:- 6/10/1993
न्यायालय: भारत का
सर्वोच्च न्यायालय
पीठ:- 9 न्यायाधीशों की संविधान
पीठ
महत्व:-
न्यायाधीशों की नियुक्ति
पर सबसे
महत्वपूर्ण फैसला
निर्णय:- 7 : 2
✅
बहुमत
में (न्यायपालिका
के
पक्ष
में)
1. न्यायमूर्ति जे. एस. वर्मा (मुख्य
निर्णय)
2. न्यायमूर्ति वेंकटचलैया
3. न्यायमूर्ति एस. सी. अग्रवाल
4. न्यायमूर्ति के. जे. रेड्डी
5. न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह
6. न्यायमूर्ति एन. पी. सिंह
7. न्यायमूर्ति एस. पी. भरूचा
निर्णय:- CJI की राय को प्राथमिकता (Primacy)
देकर First
Judges Case को पलटा गया।
❌
विपक्ष (कार्यपालिका
के
पक्ष
में)
1. न्यायमूर्ति ए. एम. अह्मदी
2. न्यायमूर्ति एस. पंडियन
मत:- सरकार की भूमिका अधिक होनी चाहिए।
पृष्ठभूमि (Background):-
S.P. Gupta केस (1981) में यह
तय हुआ
था कि “परामर्श (Consultation)” का अर्थ सहमति नहीं और सरकार को नियुक्ति में प्राथमिकता है। इस व्यवस्था से सरकार का प्रभाव
बढ़ गया न्यायपालिका
की स्वतंत्रता
पर खतरा
महसूस हुआ। इसी कारण इस मामले में S.P. Gupta (First Judges Case) को चुनौती दी गई।
मुख्य संवैधानिक प्रश्न (Issues):-
1. क्या न्यायाधीशों की नियुक्ति में CJI (मुख्य न्यायाधीश) की राय को प्राथमिकता (Primacy) मिले?
2. क्या “Consultation” का अर्थ अब न्यायपालिका की निर्णायक भूमिका होनी चाहिए?
3. क्या S.P. Gupta केस सही था या नहीं?
न्यायालय का तर्क (Court’s
Reasoning):-
(A) न्यायपालिका की स्वतंत्रता:-
न्यायालय ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) है। यदि सरकार को अंतिम अधिकार दिया जाए तो राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावना बढ़ेगी और निष्पक्ष न्याय खतरे में पड़ सकता है।
(B) CJI की
भूमिका:-
CJI कोई अकेला व्यक्ति
नहीं, बल्कि
वरिष्ठ न्यायाधीशों
से परामर्श
लेकर राय
देता है। इसलिए CJI की राय व्यक्तिगत नहीं बल्कि संस्थागत (Institutional
Opinion) होती है।
अंतिम निर्णय (Final Holding):-
1. CJI की राय
को
प्राथमिकता:- न्यायाधीशों
की नियुक्ति
और स्थानांतरण
में CJI की राय सर्वोपरि (Primacy) होगी। सरकार CJI की राय के
खिलाफ नियुक्ति
नहीं कर
सकती ।
2. S.P. Gupta केस
खारिज:- First Judges Case (1981) को आंशिक
रूप से
पलट दिया
गया (Overruled) ।
3. कॉलेजियम
प्रणाली
की
नींव:-
नियुक्ति
की प्रक्रिया:- CJI + वरिष्ठ न्यायाधीश
यही
आगे चलकर Collegium System बना।
कॉलेजियम प्रणाली (इस केस से क्या बना)?
इस
फैसले के
बाद:-
|
पद |
परामर्श |
|
सुप्रीम
कोर्ट जज |
CJI + 2 वरिष्ठ जज |
|
हाईकोर्ट
जज |
CJI + वरिष्ठ जज + HC CJ |
|
(बाद में 1998 में इसे और मजबूत किया गया) |
|
इस फैसले का महत्व (Importance)?
·
न्यायपालिका को सरकार से स्वतंत्र बनाया।
·
राजनीतिक हस्तक्षेप कम किया।
·
न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता बढ़ी।
· भारतीय न्याय व्यवस्था का स्वरूप बदला।
Supreme Court Advocates-on-Record
Association बनाम Union of India (1993) में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश की राय को प्राथमिकता प्राप्त होगी। न्यायपालिका की स्वतंत्रता को संविधान की मूल संरचना माना गया। S.P. Gupta केस के निर्णय को आंशिक रूप से पलट दिया गया। इस फैसले से कॉलेजियम प्रणाली की शुरुआत हुई। यह मामला Second Judges
Case कहलाता है।
First
vs Second Judges Case
|
बिंदु |
First (1981) |
Second (1993) |
|
प्राथमिकता |
सरकार |
CJI |
|
परामर्श |
बाध्यकारी नहीं |
बाध्यकारी |
|
न्यायपालिका |
कमजोर |
मजबूत |
|
परिणाम |
Executive Control |
Collegium Syste |
Third
Judges Case (1998)
In Re: Presidential Reference (Article
143)
(Appointment & Transfer of Judges
Case)
पीठ:- 9 न्यायाधीशों की संविधान
पीठ
निर्णय
वर्ष:- 28/10/1998
निर्णय:- सर्वसम्मति (9 : 0)
1. S.P.
BHARUCHA(मुख्य निर्णय)
2. M.K.MUKHERJEE
3. S.B.
MAJMUDAR
4. SUJATA
V. MANOHAR
5. G.T.
NANAVATI
6. S.SAGHIR
AHM AD
7. K.
VENKATESWAMI
8. B.N.
KIRPAL
9. G.B.PAΤΤΑΝΑΙΚ
मामला क्या था?
यह
मामला राष्ट्रपति
द्वारा अनुच्छेद 143 के तहत
सुप्रीम कोर्ट
से पूछे
गए सवालों
पर आधारित
था।
उद्देश्य:- Second Judges Case (1993) में बनी कॉलेजियम प्रणाली की स्पष्ट व्याख्या और
अंतिम रूप
तय करना।
राष्ट्रपति ने क्या प्रश्न पूछे?
1. क्या CJI अकेले न्यायाधीशों की नियुक्ति
का निर्णय
ले सकता
है?
2. “Consultation” में किन-किन जजों
से परामर्श
अनिवार्य है?
3. कॉलेजियम में
कितने न्यायाधीश
होंगे?
4. क्या सरकार
कॉलेजियम की
सिफारिश को
अस्वीकार कर
सकती है?
5. न्यायाधीशों की नियुक्ति
में सीनियॉरिटी
का क्या
महत्व है?
सुप्रीम कोर्ट का तर्क (Reasoning)?
(A) CJI अकेले नहीं:- सुप्रीम कोर्ट ने
साफ कहा
CJI की राय
व्यक्तिगत नहीं
हो सकती। CJI को वरिष्ठतम न्यायाधीशों
से परामर्श
लेना अनिवार्य
है। निर्णय
संस्थागत (Institutional Opinion) होना चाहिए।
(B) कॉलेजियम की संरचना तय:- कोर्ट ने कॉलेजियम
को अंतिम
और स्पष्ट
रूप दिया
।
सुप्रीम कोर्ट
जजों
की
नियुक्ति: -
CJI + 4 वरिष्ठतम जज = 5 सदस्यीय कॉलेजियम
हाईकोर्ट जजों
की
नियुक्ति: -
CJI +2 वरिष्ठतम सुप्रीम
कोर्ट जज(संबंधित हाईकोर्ट
के मुख्य
न्यायाधीश)
(C) बहुमत का सिद्धांत:- कॉलेजियम का निर्णय
बहुमत से
होगा।
यदि किसी
नाम
पर
गंभीर
असहमति
है
→ वह
नाम
आगे
नहीं
जाएगा।
सरकार की भूमिका (Role of
Executive):- सरकारनाम पुनर्विचार
हेतु वापस
भेज सकती
है। लेकिन
यदि कॉलेजियम
वही नाम
दोबारा भेजे, सरकार को
नियुक्ति करनी
अनिवार्य होगी
।
अंतिम निर्णय (Holding):-
·
कॉलेजियम प्रणाली को संवैधानिक मान्यता।
·
Second Judges Case (1993) को स्पष्ट और मजबूत किया।
·
CJI को अकेले निर्णय लेने से रोका।
·
न्यायपालिका की स्वतंत्रता को और सुदृढ़ किया।
इस फैसले का महत्व (Importance):-
·
न्यायाधीशों
की नियुक्ति
प्रक्रिया स्पष्ट
हुई।
·
राजनीतिक
हस्तक्षेप कम
हुआ।
·
न्यायपालिका
की स्वतंत्रता
मजबूत हुई।
·
आज
भी भारत
में यही
प्रणाली लागू
है।
Third Judges Case (1998) में सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम प्रणाली की अंतिम संरचना तय की। न्यायालय ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश अकेले निर्णय नहीं ले सकता और उसे वरिष्ठ न्यायाधीशों से परामर्श करना अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट के लिए पाँच सदस्यीय कॉलेजियम बनाया गया। सरकार की भूमिका सीमित रखी गई। इस निर्णय से न्यायपालिका की स्वतंत्रता और मजबूत हुई।
|
3 Judges Cases |
||
|
केस |
वर्ष |
किसे प्राथमिकता |
|
First Judges Case |
1981 |
सरकार |
|
Second Judges Case |
1993 |
CJI |
|
Third Judges Case |
1998 |
कॉलेजियम |
|
3 Judges Cases बहुमत
तुलना |
||
|
केस |
पीठ |
बहुमत |
|
First Judges
Case (1981) |
7 |
4 : 3 |
|
Second Judges
Case (1993) |
9 |
7 : 2 |
|
Third Judges
Case (1998) |
9 |
9 : 0 |
First Judges Case (1981) में 4:3 के बहुमत से न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती के नेतृत्व में कार्यपालिका को प्राथमिकता दी गई, जबकि न्यायमूर्ति पी.एन. शिंगल सहित तीन जजों ने असहमति जताई। Second Judges
Case (1993) में न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा के नेतृत्व में 7:2 के बहुमत से CJI की राय को प्रधानता दी गई। Third Judges
Case (1998) में 9 न्यायाधीशों ने सर्वसम्मति से कॉलेजियम प्रणाली को अंतिम रूप दिया।
Exam Trick:-
1981 → भगवती (सरकार)
1993 → वर्मा (CJI)
1998 →
सर्वसम्मति (कॉलेजियम)
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