धर आयोग(17 june 1948)
भाषायी प्रांत आयोग की रिपोर्ट
1948
सेवा में,
माननीय राष्ट्रपति,
भारत की संविधान सभा,
नई दिल्ली।
हम, आंध्र, कर्नाटक, केरल और महाराष्ट्र के प्रस्तावित प्रांतों के गठन की उपयुक्तता अथवा अनुपयुक्तता की जाँच करने, उनकी सीमाएँ निर्धारित करने तथा उन प्रांतों और भारत के निकटवर्ती क्षेत्रों में उससे उत्पन्न होने वाले वित्तीय, आर्थिक, प्रशासनिक और अन्य परिणामों का आकलन करने के उद्देश्य से नियुक्त आयुक्तगण, यह रिपोर्ट सादर प्रस्तुत करते हैं। यह उल्लेखनीय है कि हमारी यह रिपोर्ट सर्वसम्मत है और इसमें कोई असहमति टिप्पणी (डिसेंटिंग मिनट) सम्मिलित नहीं है।
परिचय
2. दिनांक 17 जून, 1948 की एक अधिसूचना द्वारा हमें आंध्र, केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र प्रांतों के गठन; उससे उत्पन्न होने वाले वित्तीय, आर्थिक, प्रशासनिक तथा अन्य परिणामों; और उनकी अनुमानित सीमाओं के प्रश्न पर प्रतिवेदन देने के लिए नियुक्त किया गया। संविधान की प्रारूप समिति द्वारा की गई वह सिफारिश, जिसके परिणामस्वरूप हमारी नियुक्ति हुई, तथा हमारे कार्यादेश (Terms of Reference) परिशिष्ट–I में पुनः प्रस्तुत किए गए हैं।
2A. हमारी प्रथम बैठक 19 जुलाई, 1948 को नई दिल्ली स्थित काउंसिल हाउस में हुई, जिसमें एक प्रश्नावली तैयार कर उसे जनता के लिए जारी किया गया। यह प्रश्नावली परिशिष्ट–II में दी गई है। अगस्त के अंतिम सप्ताह में नई दिल्ली में कुछ गवाहों की जाँच की गई और सितंबर के आरंभ में हमने 26 दिनों की एक यात्रा आरंभ की, जिसके दौरान विशाखापट्टनम, मद्रास, मदुरा, मंगलौर, कालीकट और कोयंबटूर में बड़ी संख्या में गवाहों की जाँच की गई। इसके बाद अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में लगभग पंद्रह दिनों की एक और यात्रा की गई, जिसमें नागपुर, हुबली, पूना और बंबई में भी बड़ी संख्या में गवाहों के बयान दर्ज किए गए। कुल मिलाकर लगभग 1,000 लिखित ज्ञापन प्राप्त हुए और जाँच के दौरान 700 से अधिक गवाहों के मौखिक साक्ष्य दर्ज किए गए। आयोग की अंतिम बैठक, जिसमें सभी सह-सदस्य अंतिम परामर्श के लिए उपस्थित थे, 20 और 21 नवंबर को नई दिल्ली के काउंसिल हाउस में आयोजित हुई। इस रिपोर्ट पर 10 दिसंबर, 1948 को हस्ताक्षर किए गए।
इस प्रकार की गई जाँच अत्यंत विवादास्पद थी। जिन सभी प्रमुख मुद्दों पर विचार आवश्यक था, उन पर दो पक्ष थे और कुछ मामलों में दो से भी अधिक। फिर भी किसी एक पक्ष की ओर से भी मामलों का कोई सर्वसम्मत प्रस्तुतीकरण नहीं था और प्रत्येक मामले में व्यक्तिगत भिन्नताओं के कारण कार्य लंबा खिंच गया और जटिल हो गया। एक अतिरिक्त कठिनाई यह भी थी कि प्रांतीय सरकारें, जो सामान्यतः ऐसी जाँचों में निष्पक्ष और स्वतंत्र साक्ष्य उपलब्ध कराती हैं, वर्तमान में विवाद से जुड़े सभी पक्षों से बनी मिश्रित सरकारें होने के कारण, तटस्थ बनी रहीं और उन्होंने अपना सामान्य सहयोग प्रदान नहीं किया। तथापि, हमारे समक्ष पर्याप्त सामग्री प्रस्तुत हुई, जिससे हम इस विवाद के मूल गुण-दोष पर एक निश्चित मत बनाने में सक्षम हो सके।
**सेवा में,
माननीय जे. रैम्ज़े मैकडोनाल्ड, सांसद**
महोदय,
आपके द्वारा 16 दिसंबर, 1931 को हमारे अध्यक्ष को लिखे गए निम्नलिखित पत्र में वर्णित उद्देश्य के लिए हमें महामहिम की सरकार द्वारा नियुक्त किया गया था—
“महामहिम की सरकार की ओर से, भारतीय रियासत जाँच समिति (वित्त) के अध्यक्ष के रूप में आपको तथा समिति के अन्य सदस्यों को यह सूचित एवं मार्गदर्शन हेतु बताया जाता है कि समिति की स्थापना किन उद्देश्यों के लिए की गई है और किन विशिष्ट मुद्दों पर उसे प्रतिवेदन देना आवश्यक है।
1 दिसंबर की मेरी घोषणा में, महामहिम की सरकार का यह आशय घोषित किया गया था कि गोलमेज सम्मेलन द्वारा अनुशंसित अन्य समितियों के साथ-साथ, एक ऐसी समिति गठित की जाए जो कुछ विशिष्ट रियासतों से संबंधित विशेष वित्तीय समस्याओं का और अधिक गहन अध्ययन कर सके। संबंधित सिफारिश संघीय संरचना समिति की तृतीय रिपोर्ट के अनुच्छेद 46 और 47 में उपलब्ध है, जिसमें वित्त उप-समिति की रिपोर्ट के अनुच्छेद 17–20 और 26 में वर्णित रियासतों से संबंधित विशेष वित्तीय समस्याओं पर विचार किया गया है।
संघीय वित्त की एक आदर्श व्यवस्था वह होगी, जिसके अंतर्गत सभी संघीय इकाइयाँ समान आधार पर संघीय संसाधनों में योगदान दें। समिति का कार्य संक्षेप में यह निर्धारित करना है कि वर्तमान परिस्थितियों में निम्नलिखित दो विशिष्ट तत्व इस आदर्श की प्राप्ति को किस सीमा तक और किन रूपों में प्रभावित करते हैं—
(क) कुछ रियासतों के विद्यमान और मान्य अधिकार; तथा
(ख) विशेष प्रकृति के वे योगदान, जो अनेक रियासतें वर्तमान में कर रही हैं या अतीत में भारत सरकार के संसाधनों में कर चुकी हैं।”
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153. हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि जिन नए प्रांतों का प्रश्न हमारे समक्ष संदर्भित किया गया था, उनमें से किसी का भी गठन वर्तमान समय में नहीं किया जाना चाहिए; और इस निष्कर्ष के मद्देनज़र, हमारे समक्ष रखे गए अन्य प्रश्न स्वतः ही अप्रासंगिक हो जाते हैं तथा उनके उत्तर देने की आवश्यकता नहीं रहती।
154. हमारे सह-सदस्यों (Associate Members) ने गवाहों के चयन में, गवाहों की जाँच के दौरान पक्ष और विपक्ष के तर्कों को स्पष्ट करने में तथा उन विषयों पर, जिनसे वे भली-भाँति परिचित थे और जो हमारे लिए नए थे, सामान्य रूप से परामर्श देने में हमें अमूल्य सहायता प्रदान की है। हम उनके द्वारा दी गई इस सहायता के लिए हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं।
155. इसके पश्चात्, हम अपने सचिव श्री बी. सी. बनर्जी, एम.ए., आई.ए. एवं ए.एस., के प्रति अपना विशेष आभार व्यक्त करना चाहते हैं, जिन्होंने प्रस्तावित नए प्रांतों की वित्तीय स्थिति की जाँच में विशेष परिश्रम किया, जिसका विवरण उन्होंने अध्याय III में प्रस्तुत किया है। वरिष्ठ महालेखाकार के रूप में उनके अनुभव ने आयोग के लिए अत्यंत मूल्यवान और सहायक भूमिका निभाई है।
156. अंत में, हम संविधान सभा के सचिवालय के प्रति भी अपना धन्यवाद दर्ज करते हैं, जिन्होंने हमारे लिए अपने द्वारा संकलित विशाल सामग्री उपलब्ध कराई, उत्कृष्ट स्टाफ हमारे उपयोग हेतु प्रदान किया तथा संपूर्ण जाँच के दौरान हमें पूर्ण सहयोग दिया।
एस. के. धर
अध्यक्ष
पन्ना लाल जगतनारायण लाल
सदस्य
बी. सी. बनर्जी
सचिव
नई दिल्ली,
10 दिसंबर, 1948
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(i) प्रारूप समिति (Drafting Committee) की सिफारिश :-
“समिति ने इस प्रश्न पर गंभीरतापूर्वक विचार किया है कि क्या आंध्र को इस अनुसूची में विशेष रूप से एक पृथक राज्य के रूप में उल्लेखित किया जाना चाहिए। हाल ही में इस विषय पर सरकार की ओर से एक वक्तव्य दिया गया था, जिसमें कहा गया था कि आंध्र को संविधान में प्रांतों के अंतर्गत उसी प्रकार सम्मिलित किया जा सकता है, जैसा कि भारत शासन अधिनियम, 1935 के अंतर्गत उड़ीसा और सिंध के मामले में किया गया था। तदनुसार, एक चरण पर समिति आंध्र को इस अनुसूची में एक पृथक राज्य के रूप में उल्लेखित करने के पक्ष में थी। किंतु विस्तृत विचार के पश्चात् समिति का मत है कि केवल अनुसूची में राज्य का नाम अंकित कर देने मात्र से नया संविधान लागू होते ही वह राज्य अस्तित्व में नहीं आ जाएगा।
नए राज्य को संविधान के प्रारंभ से ही समस्त शासकीय तंत्र सहित अस्तित्व में लाने के लिए वर्तमान संविधान के अंतर्गत तत्काल तैयारी के कदम उठाने होंगे। यही प्रक्रिया भारत शासन अधिनियम, 1935 के अंतर्गत उड़ीसा और सिंध के मामले में अपनाई गई थी; उन्हें 1 अप्रैल, 1936 से पृथक प्रांत बनाया गया था, जबकि अधिनियम 1 अप्रैल, 1937 से लागू हुआ। अतः समिति यह अनुशंसा करती है कि न केवल आंध्र के संबंध में बल्कि अन्य भाषायी क्षेत्रों के संबंध में भी सभी प्रासंगिक विषयों की जाँच एवं अध्ययन के लिए एक आयोग नियुक्त किया जाना चाहिए, जिसे यह निर्देश दिया जाए कि वह समय रहते अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करे, ताकि जिन नए राज्यों के गठन की वह सिफारिश करे, उन्हें भारत शासन अधिनियम, 1935 की धारा 290 के अंतर्गत गठित किया जा सके और संविधान के अंतिम रूप से अंगीकार किए जाने से पूर्व इस अनुसूची में उनका उल्लेख किया जा सके।”
(ii) भारत की संविधान सभा :-
भारत की संविधान सभा के सचिवालय ने निम्नलिखित प्रेस विज्ञप्ति जारी की है—
नए प्रांतों के गठन का प्रश्न कुछ समय से जनसाधारण का ध्यान आकर्षित करता रहा है। भारत की संविधान सभा द्वारा नियुक्त प्रारूप समिति ने यह अनुशंसा की कि ऐसे प्रांतों के गठन से संबंधित सभी प्रासंगिक विषयों की जाँच और अध्ययन के लिए एक आयोग नियुक्त किया जाना चाहिए तथा उसे यह निर्देश दिया जाना चाहिए कि वह समय पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करे, ताकि जिन नए राज्यों के गठन की सिफारिश यह आयोग करे, उन्हें (यथासंशोधित) भारत शासन अधिनियम, 1935 की धारा 290 के अंतर्गत गठित किया जा सके और उसके पश्चात् संविधान के अंतिम रूप से अंगीकार किए जाने से पूर्व प्रारूप संविधान की प्रथम अनुसूची में उनका उल्लेख किया जा सके।
2. तदनुसार, संविधान सभा के अध्यक्ष महोदय ने आंध्र, कर्नाटक, केरल और महाराष्ट्र के नए प्रांतों के गठन तथा ऐसे नए प्रांतों के सृजन से उत्पन्न होने वाले प्रशासनिक, वित्तीय और अन्य परिणामों की जाँच कर उस पर प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के लिए निम्नलिखित आयोग की नियुक्ति की है। आयोग के साथ निम्नलिखित सह-सदस्य (Associate Members) संबद्ध होंगे, जो आयोग की कार्यवाही में, जहाँ तक उनका संबंध हो, स्वतंत्र रूप से भाग लेंगे, किंतु रिपोर्ट के प्रारूपण या उस पर हस्ताक्षर करने में भाग नहीं लेंगे—
3. श्री एस. के. दार (सेवानिवृत्त न्यायाधीश, इलाहाबाद उच्च न्यायालय) — अध्यक्ष
4. डॉ. पन्ना लाल, सी.एस.आई., सी.आई.ई. (भारतीय सिविल सेवा के सेवानिवृत्त सदस्य) — सदस्य
5. श्री जगत नारायण लाल (भारत की संविधान सभा के सदस्य)
6. श्री बी. सी. बनर्जी (महालेखाकार, बिहार) — सचिव
सह-सदस्य (Associate Members)
मद्रास से
प्रतिनिधित्व किया गया भाषायी क्षेत्र
1. माननीय श्री रामकृष्ण राजू
(अध्यक्ष, मद्रास विधान परिषद) — आंध्र
2. श्री टी. ए. रामलिंगम चेट्टियार
(भारत की संविधान सभा के सदस्य) — तमिलनाडु
3. श्री नारायण मेनन, पालघाट
(सदस्य, मद्रास विधान परिषद) — केरल
4. श्री टोकुरी सुब्रह्मण्यम, बेल्लारी — कर्नाटक
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बंबई से
1. श्री के. एम. मुंशी
(भारत की संविधान सभा के सदस्य) — गुजरात
2. श्री आर. आर. दिवाकर
(भारत की संविधान सभा के सदस्य)— कर्नाटक
3. श्री एच. वी. पाटसकर
(भारत की संविधान सभा के सदस्य) — महाराष्ट्र
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केंद्रीय प्रांत एवं बरार से
1. श्री टी. एल. शेओड़े
(सेवानिवृत्त न्यायाधीश, नागपुर उच्च न्यायालय) — महाराष्ट्र
2. श्री गोपीलाल श्रीवास्तव
(अधिवक्ता, सागर) — महाकोशल (हिंदी-भाषी क्षेत्र)
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आयोग के कार्यादेश (Terms of Reference)
3. आयोग के कार्यादेश निम्नलिखित हैं—
(1) ऊपर अनुच्छेद 2 में उल्लिखित क्षेत्रों में से, यदि कोई, तो कौन-कौन से नए प्रांत बनाए जाने चाहिए और उनकी सीमाएँ व्यापक रूप से क्या हों, यह समझते हुए कि सीमाओं का सटीक निर्धारण बाद में एक सीमा-निर्धारण आयोग द्वारा किया जाएगा?
(2) इस प्रकार गठित किए जाने वाले प्रत्येक प्रांत में
प्रशासनिक, आर्थिक, वित्तीय तथा अन्य परिणाम क्या होंगे?
(3) भारत के निकटवर्ती (आस-पास के) क्षेत्रों में प्रशासनिक, आर्थिक, वित्तीय तथा अन्य क्या प्रभाव पड़ेंगे?

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