मारवाड़ का राठौड़ वंश एवं इस वंश के प्रतापी शासक
मारवाड़ की उत्पत्ति
मारवाड़ शब्द 'मरु' और 'माड' इन दो शब्दों के संयोग से बना है। मरु और माड ये दो देश भिन्न-भिन्न नाम से प्रसिद्ध हैं। जैसलमेर का देश माड और उससे पूर्व का प्रदेश मरु, जिसमें मालानी आदि प्रदेश हैं। मरु और माड इन दोनों देशों की सीमाएँ परस्पर मिली हुई होने से 'मरुमाड' शब्द बना। उसी मरुमाड शब्द का अपभ्रंश रूप 'मारवाड़' है। जैसे 'मेदपाट' शब्द का अपभ्रंश 'मेवाड़' हो गया, वैसे 'मरुपाट' का 'मारवाड़' शब्द बन गया। पाट शब्द का अर्थ विस्तार है। मरुपाट अर्थात् मरु देश का विस्तार ।
संस्कृत भाषा में मारवाड़ देश का नाम मरु मिलता है और इसका अर्थ यह है कि वह देश जिसमें प्राणी जल के अभाव में मर जाय।
जिस प्रकार दक्षिणी-पश्चिमी राजस्थान के गुहिलों का शासन मेवाड़ और वागड़ प्रांत में स्थापित हुआ, उसी प्रकार राजस्थान के उत्तरी तथा पश्चिमी भागों में राठौड़ों के राज्य भी स्थापित हुए।
मारवाड़ को 'मुरधर' देश भी कहते हैं। 'मुरधर' शब्द मरुधरा का अपभ्रंश है। मरुधरा अर्थात् मारवाड़ की भूमि ।
वर्तमान में जोधपुर का राज्य मारवाड़ नाम से प्रसिद्ध है परन्तु इसमें मरु के अलावा धन्व देश भी शामिल है, जो मरु देश के दक्षिण और पूर्व दिशा में है। जालोर, जसवंतपुरा, भीनमाल, गोडवाड़, पाली, सोजत, जैतारण, बिलाड़ा, परबतसर, डीडवाणा आदि का प्रदेश धन्व देश और शेखावाटी, बीकानेर, नागौर, फलौदी, मालानी आदि बालूमय प्रदेश मरु कहलाता था।
राठौड़ की उत्पत्ति का विषय विवादास्पद है। विभिन्न ताम्रपत्रों, शिलालेखों और प्राचीन पुस्तकों में राठौड़ वंश की उत्पत्ति को लेकर भिन्न-भिन्न मत प्रतिपादित किये गये हैं। कुछ विद्वानों की मान्यता है कि राठौड़ हिरण्यकश्यप की सन्तान हैं। जोधपुर राज्य की ख्यात में इन्हें राजा विश्वुतमान के पुत्र राजा वृहद्दल से पैदा होना लिखा है। दयालदास ने इन्हें सूर्यवंशीय माना है और इन्हें ब्राह्मण भल्लराव की सन्तान बताया है। नैणसी ने मारवाड़ के राठौड़ो को कन्नौज से आने वाली शाखा बताया है। कर्नल टॉड ने राठौड़ों की वंशावलियों के आधार पर इन्हें सूर्यवंशी माना है।
इस प्रकार राठौड़ों की उत्पत्ति सम्बन्धी मत पर एक राय नहीं है, किंतु सभी विद्वान इन्हें दक्षिण भारत के राष्ट्रकूटों से अवश्य संबंधित मानते हैं। इनमें जोधपुर और बीकानेर के राठौड़ अधिक प्रसिद्ध है। जोधपुर के राठौड़ों का मूलपुरुष (आदि पुरुष) सीहा था, जिसे कन्नौज के गहड़वाल जयचन्द का वंशज माना जाता है। सीहा केवल मारवाड़ के एक छोटे से भाग पाली के उत्तर-पश्चिम में अपना राज्य स्थापित कर पाया। सीहा ने मारवाड़ में राठौड़ राज्य की स्थापना तो कर दी, मगर उसे व्यवस्थित नहीं कर पाया।
राव चूण्डा (1394-1423 ई.):-
राव चूंडा वीरमजी का पाँचवाँ तथा सबसे छोटा पुत्र था। संवत् 1451 (ईस्वी 1395) में मंडोवर पर मुसलमानों का कब्जा था। वे राजपूतों के साथ बड़ी सख्ती करते थे। एक समय मुसलमानों को घास की आवश्यकता हुई तब उन्होंने ईंदा, भायल, आसायच आदि राजपूतों को बेगार में घास लाने को कहा। इन्होंने अपने समीपवर्ती राठौड़ चूंडाजी (रावल मल्लिनाथ की ओर से सालोड़ी गाँव के थानेदार थे, जिनके पास घोड़ों व राजपूतों का अच्छा संग्रह था) को कहलाया कि हम मुसलमानों से मंडोवर लेना चाहते हैं, आप हमारा साथ दे तो मंडोवर हमारे कब्जे में आ जायेगा। चूंडाजी ने स्वीकार किया और कुछ राठौड़ों को भेज दिया। फिर ईंदा और राठौड़ मिल कर घास के गाड़ों में बैठकर किले में घुस गए। उन्होंने मुसलमानों को मार कर मंडोवर पर अपना कब्जा कर लिया। परन्तु ईंदों को इस बात का भ्रम रहा कि यदि मुसलमानों ने पुनः आक्रमण किया तो अपना निर्वाह होना कठिन हो जायेगा। इस बात का विचार करके ईंदों के मुखिया उगमसी के पुत्र रायधवल ने अपने सभी भाइयों से परामर्श करके उनकी संपत्ति लेकर अपनी कन्या का विवाह चूंडाजी के साथ कर दिया और दहेज में मंडोवर किला भी दे दिया। संवत् 1452 (ईस्वी 1396) में मंडोवर चूंडाजी के हाथों में चला गया।
अपने साहस और कूटनीति से राव चूण्डा ने मण्डोर पर अधिकार कर लिया। इसने मण्डोर को राठौड़ों की राजधानी बनाया। मण्डोर पर अधिकार के बाद इसने आस-पास के क्षेत्रों खाटू, डीडवाना, सांभर, अजमेर, नाडोल आदि पर भी अधिकार कर लिया। पूंगल के भाटियों द्वारा वह धोखे से 1423 ई. में मारा गया। उसकी पत्नी चाँद कँवर ने 'चाँद बावड़ी' (जोधपुर) का निर्माण करवाया था। चूंडाजी के सभी 14 पुत्र राव कहलाये उनसे 12 शाखाएँ हुई। चूंडा नाद्दौर में एक हजार राजपूतों के साथ मारा गया। उसकी मृत्यु के बाद उसका बड़ा पुत्र रिड़मल मण्डोर के सिंहासन पर बैठा। चूंडा की मृत्यु हो जाने के बाद नागौर राठौड़ों के अधिकार से निकल गया।
राव रणमल (1427-1438 ई.):-
रणमल अपने छोटे भाई कान्हा को मारवाड़ का शासक बनाये जाने से नाराज होकर मेवाड़ चला गया। इसने अपनी बहन हंसा बाई का विवाह राणा लाखा से कर दिया। यह विवाह रणमल ने इसी शर्त पर किया था, कि हंसा बाई का पुत्र ही लाखा का उत्तराधिकारी होगा। अपने भान्जे मोकल के मेवाड़ महाराणा बनने पर मेवाड़ प्रशासन में रणमल का प्रभाव बढ़ गया। रणमल की 1438 ई. में उसकी प्रेमिका भारमली के सहयोग से मेवाड़ी सामन्तों द्वारा हत्या कर दी गई। रिड़मल के 24 पुत्र थे, इनके ज्येष्ठ पुत्र का नाम जोधा था।
राव जोधा (1438-1489 ई.):-
राव जोधा मारवाड़ के राव रणमल का पुत्र था। 1438 ई. में चित्तौड़ में रणमल की हत्या होने के बाद उसने जंगलों में रहकर अपनी शक्ति को संगठित किया। 1453 ई. में वह मण्डोर जीतने में सफल रहा। जोधा ने सिसोदिया अक्का और अहाड़ा हिंगोला को मारकर मण्डोर पर फिर से अधिकार कर लिया। मारवाड़ के प्रसिद्ध लोक देवता वीर हड़बू साँखला भी इसी लड़ाई में काम आये। उसने मेवाड़ से सुलह करने के लिए अपनी पुत्री का विवाह मेवाड़ी राजकुमार रायमल से कर दिया। उसने 1459 ई. में जोधपुर नगर बसाया और उसे अपनी राजधानी बनाया। राव जोधा ने नयी राजधानी को सुरक्षित रखने के लिए चिड़ियाटूक पहाड़ी पर एक दुर्ग बनाया जिसे मेहरानगढ़ कहते हैं। मण्डोर से 6 मील दूर दक्षिण में चिड़ियानाथ की ट्रंक नामक पहाड़ी पर संवत् 1516 की ज्येष्ठ सुदि 11, शनिवार (12 मई, 1459) को एक नया दुर्ग बनवाना आरंभ किया। इस किले का नाम 'मोरध्वज' रखा गया था इस किले का जहाँ द्वार था, उस स्थान को इस समय 'जोधाजी का फलसा' कहते हैं। संवत् 1511 में जोधा ने मण्डोर के पास जोधेलाव तालाब बनवाया और संवत् 1516 में अपने नये दुर्ग में मण्डोर से लाकर चामुण्डा देवी की मूर्ति स्थापित की। राव जोधा ने दिल्ली के सुल्तान बहलोल लोदी की एक सेना को परास्त करके प्रतिष्ठा प्राप्त की थी। डॉ. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा राव जोधा को जोधपुर का प्रथम प्रतापी शासक मानते हैं। रानी जसमादे हाड़ी ने संवत् 1515 में दुर्ग के नीचे रानीसर नामक तालाब बनवाया, जो लगभग 500 वर्ष तक जोधपुर नगर के लिए प्रमुख पेयजल स्त्रोत रहा। चूण्डा की सोनगरी रानी चांदकंवर ने चांदबावड़ी बनवाई।
संत शिरोमणी मीरा बाई राव जोधाजी की सगी प्रपौत्री थी। जोधाजी से 11 शाखाएँ हुई।
राव सातल :-
राव जोधा का पुत्र जोगा अयोग्य होने के कारण सातलजी उत्तराधिकारी हुए. इनका जन्म संवत् 1492 (ईस्वी 1436) में हुआ था। इनके शासन काल में संवत् 1547 (ईस्वी 1491) में मारवाड़ में भयानक अकाल पड़ा तथा हजारों मनुष्य भूखे मरने लगे तब सातल के छोटे भाई दूदा तथा वरसिंह ने मेड़ता से सांभर पर चढ़ाई की और सांभर नगर को लूट लिया। सांभर दिल्ली के अधीन था तथा उस समय अजमेर का सूबेदार वहाँ का शासक था। अतः सूबेदार मल्लू खां ने मेड़ता पर चढ़ाई की। उस दिन चैत्र शुक्ला तृतीया थी तथा वहाँ की बहुत सी कन्याएँ गाँव से बाहर के तालाब पर गौरी पूजन के लिए आई हुई थीं। मल्लू खां 140 हिन्दू कन्याओं को पकड़ कर ले गया।
राव सातल पहले ही अपने भाई की सहायता के लिए मेड़ता पहुँच चुका था। उसने मुस्लिम सेना पर आक्रमण कर हिन्दू कन्याओं को छुड़ा लिया और कई मुस्लिम स्त्रियाँ भी छीन लीं जिनमें मल्लू खां के सेनापति घुड़ला खां की कन्या भी थी। घुड़ला खां तो युद्ध क्षेत्र में ही मारा गया और सातल अपने डेरे में लौट कर रात को मर गया। सातल के खींची सरदार ने घुडला खां का सिर काटकर उन 140 कन्याओं को सौंप दिया। कन्याएँ घुड़ला खां का सिर लेकर पूरे गाँव में घूमीं। तब से आज तक इस घटना की याद में हर वर्ष चैत्र शुक्ला तृतीया को घुड़ला घुमाया जाता है। कन्याएँ सिर पर खाली मटकी में छेद करके उसमें दीपक रखती हैं और उसे घुडले के प्रतीक के रूप में पूरे गाँव में घुमाती हैं। मटकी के छेद घुड़ले के सिर के घाव माने जाते हैं।
इस प्रकार राव सातल लगभग तीन वर्ष ही जोधपुर पर राज्य कर सका। उसकी रानी फूलां भटियाणी ने संवत् 1547 (ईस्वी 1491) में जोधपुर शहर में फुलेलाव नामक तालाब बनवाया। राव सातल निःसंतान था, अतः उसने अपने भाई सूजा का पुत्र 'नरा' को गोद लिया था। सातल की मृत्यु के बाद सूजा जोधपुर की गद्दी पर बैठा तथा नरा को फलौदी की स्वतंत्र जागीर दे दी गई, जो पहले सातलजी के पास थी।
राव सूजा :-
राव बीका, राव जोधा के पुत्रों में से एक था और उसने जोधा की आज्ञा से बीकानेर राज्य का निर्माण किया था। राव सूजा भी जोधा का पुत्र था अतः बीका एवं सूजा भाई-भाई थे। बीका, सूजा से बड़ा था, इसलिए वह स्वयं को जोधपुर राज्य का वास्तविक अधिकारी मानता था। चूँकि वह बीकानेर नामक नए राज्य का निर्माण कर चुका था इसलिए जोधपुर सूजा को दे दिया गया। बीका को यह बात पसंद नहीं आई और उसने जोधपुर का राज्य प्राप्त करने के लिए जोधपुर राज्य पर आक्रमण कर दिया। राजमाता हाड़ीजी ने बीका को भंवर ढोल, भुजाई की देग, लक्ष्मीनारायण की मूर्ति, नगणेची की मूर्ति, तख्त, राव जोधा की तलवार आदि 14 राजकीय वस्तुएँ देकर संतुष्ट किया। बीका राजमाता की आज्ञा मानकर बीकानेर चला गया। राव सूजा का ज्येष्ठ पुत्र वाघाजी था। इसका देहान्त राव सूजा के जीवन काल में ही हो गया। अतः सूजा की मृत्यु के बाद वाघाजी के ज्येष्ठ पुत्र वीरम को गद्दी पर बैठाया जाना तय हुआ। सूजाजी के राज्य में 5 परगने जोधपुर, जैतारण, फलौदी, पोकरण और सोजत थे।
राव गांगा :-
वीरमजी गांगा से बड़े थे इसलिए सूजाजी के अनंतर वीरमजी को गद्दी पर बैठाने के लिए पंचायण अखैराजोत आदि सरदार किले पर एकत्रित हुए, जिनके साथ उनके बालक भी थे। बालकों ने भूख लगने पर खाना मांगा। वीरम की माता (वाघाजी की बड़ी रानी) ने बालकों का यह कहते हुए तिरस्कार कर दिया कि मैं भोजन देने की नौकरी पर नहीं हूँ। सरदार इस बात से नाराज हो गये। जब गोगाजी की माता (वाघाजी की दूसरी रानी) को यह बात पता लगी तो उसने सरदारों के बालकों को भोजन खिला दिया तथा सरदारों के लिए भी भोजन भेजा। सरदार गांगाजी की माता से प्रसन्न हो गए और उन्होंने वीरम के स्थान पर गांगा को राजा बनाना तय किया। उन्होंने उस समय तो राजा का चुनाव टाल दिया तथा बाद में गांगा को मेवाड़ से बुलाकर उसका तिलक कर दिया।
जिस समय गांगा जोधपुर लौटा, उस समय सरदारों के पास कुमकुम नहीं थी। अतः बगड़ी के ठाकुर ने तलवार से अपने अंगूठे में चीरा लगाकर रक्त से ही टीका कर दिया और अपनी तलवार गांगाजी की कमर में बाँध दी। इस प्रकार गांगा मारवाड़ का राजा बन गया और वीरम को सोजत का परगना दिया गया।
राव गांगा और वीरम में राज्याधिकार को लेकर झगड़ा चलता रहा तथा छुट-पुट अनेक लड़ाइयाँ भी हुईं। हालांकि वीरम को सोजत की जागीर दे दी गई किन्तु वह सन्तुष्ट नहीं हुआ। गांगा के पुत्र मालदेव ने इन युद्धों में अपने पिता की बड़ी सहायता की। राव गांगा ने मुसलमानों के विरुद्ध अनेक लड़ाइयाँ लड़ीं तथा मेवाड़ के राणा सांगा को भी मुसलमानों के विरुद्ध युद्धों में सहायता दी। उसने जोधपुर में गांगेलाव का तालाब, गांगा की बावड़ी और गंगश्यामजी का मन्दिर बनवाया।
राव मालदेव (1531-1562 ई.):-
राव मालदेव ने खानवा के युद्ध में राणा सांगा की ओर से भाग लिया। यद्यपि खानवा के युद्ध के समय मारवाड़ का शासक इसका पिता राव गांगा था। इसने 1532 ई. में बहादुरशाह के मेवाड़ पर आक्रमण के दौरान राणा विक्रमादित्य की सहायता की। 1536 ई. में राव मालदेव ने जैसलमेर के राव लूणकरण की पुत्री उमादे से विवाह किया, जो इतिहास में 'रूठी रानी' के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस घटना का कारण यह था, कि मालदेव का श्वसुर व उमादे का पिता राव लूणकरण मालदेव की हत्या करवाना चाहता था। इसकी सूचना मालदेव की सास ने मालदेव को भिजवा दी, इस घटना के बाद मालदेव व उमादे के संबंध बिगड़ गये। वह रूठकर अजमेर के तारागढ़ में रही व इतिहास में 'रूठी रानी' नाम से प्रसिद्ध हुई। एक अन्य कहानी के अनुसार संवत् 1596 (ईस्वी 1540) में जैसलमेर के महारावल लूणकर्ण ने अपनी कन्या उमादेवी का ब्याह राव मालदेव के साथ करके अपनी मित्रता जाहिर की। महारावल लूणकर्ण ने अपनी कन्या को विदा करते समय बहुत दास-दासियों दी थीं। उन में भारमली नाम की दासी अत्यंत रूपवती थी। मालदेवजी उस के रूप में मोहित हो गए। उमादेवी ने अपने पति को अन्यासक्त देखकर उसी समय आजन्म ब्रह्मचारिणी रहने की प्रतिज्ञा की और वह रूठी रानी कहलाई।
मालदेव ने मेड़ता के वीरमदेव और बीकानेर के राव जैतसी पर आक्रमण कर (1542 ई.) उनके राज्यों पर अधिकार कर लिया। वीरमदेव व राव जैतसी शेरशाह की शरण में चले गये। 1539 व 1540 ई. में शेरशाह के हाथों पराजित होकर हूमायूँ दर-बदर भटक रहा था, तो मालदेव ने हुमायूँ को सहायता का संदेश भेजा, क्योंकि मालदेव जानता था, कि हुमायूँ की पूर्ण पराजय के पश्चात् शेरशाह का अगला शिकार स्वयं मालदेव ही होगा।
1543-44 ई. में मालदेव को शेरशाह सूरी के आक्रमण का सामना करना पड़ा। शेरशाह की धूर्तता ने मालदेव और उसके सेनापतियों के बीच अविश्वास उत्पन्न कर दिया जिससे मालदेव ने मैदान छोड़ दिया। मगर उसके सेनापतियों जैता और कुप्पा ने जनवरी, 1544 में गिरि सुमेल में शेरशाह से युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी वीरता से प्रभावित होकर शेरशाह को कहना पड़ा "एक मुठ्ठी बाजरे के लिए मैं हिन्दुस्तान की बादशाहत खो देता।" जोधपुर पर शेरशाह का अधिकार हो गया। उसने फलौदी, पोकरण, सोजत, पाली, जालोर तथा नागौर में अपने थाने बैठा दिये। वीरम को मेड़ता और कल्याणमल को बीकानेर सौंपकर वह अपनी राजधानी लौट गया। उसने जोधपुर के किले का मन्दिर तोड़कर उसी स्थान पर मस्जिद बनवाई तथा किले में पूर्व की तरफ एक रास्ता निकाला, जो अब गोल घाटी कहलाता है।
लगभग दो वर्ष तक मालदेव छप्पन के पहाड़ों में छिपा रहा। संवत् 1602 (ईस्वी 1546) में शेरशाह की मृत्यु हो गई
शेरशाह की मृत्यु (1545 ई.) के बाद मालदेव ने जोधपुर, पोकरण, फलौदी, बाड़मेर, कोटड़ा, जालौर और मेड़ता पर पुनः अधिकार कर लिया।
1562 ई. में मालदेव की मृत्यु हो गई।
राव चन्द्रसेन (1562-1581 ई.):-
राव मालदेव ने अपने सबसे बड़े पुत्र राम से अप्रसन्न होकर उसे राज्य से निर्वासित कर दिया। अपने दूसरे पुत्र उदयसिंह से भी मालदेव खुश न था, अतः उसे भी अपना उत्तराधिकारी नहीं बनाया। अंततः चंद्रसेन मालदेव का उत्तराधिकारी बना, जो उसका तीसरा पुत्र था। चन्द्रसेन को अपने दो बड़े भाइयों राम और उदयसिंह के विरोध का सामना करना पड़ा। 1564 ई. में राम सहायता लेने अकबर की शरण में चला गया। अकबर ने हुसैन कुली खाँ के नेतृत्व में एक सेना भेजकर जोधपुर पर अधिकार (1564 ई.) कर लिया।
1570 ई. में अकबर के नागौर दरबार के दौरान चन्द्रसेन भी जोधपुर प्राप्ति की आशा से नागौर पहुँचा। मगर अकबर का उसके भाइयों राम और उदयसिंह की ओर झुकाव देखकर उसने नागौर छोड़ दिया और संघर्ष का रास्ता चुना। अकबर ने बीकानेर के रायसिंह को जोधपुर का अधिकारी नियुक्त कर चंद्रसेन को मारवाड़ से सहायता मिलने या इस मार्ग से गुजरात में हानि पहुँचाने की सम्भावना समाप्त कर दी।
1564 ई. में जोधपुर को छोड़ने के बाद चन्द्रसेन ने कुछ समय तो भाद्राजूण में रहकर मुगलों की फौजों का मुकाबला किया, परन्तु जब मुगल सेना ने उसे चारों ओर से घेर लिया तो वहाँ से हटकर उसने सिवाना में अपना मोर्चा बनाया। सिवाना का गढ़ और पहाड़ी भाग दुर्गम थे। वहाँ जब चन्द्रसेन का पता न लगा तो मुगल अधिकारियों ने उसके समर्थकों को समाप्त करने का प्रयत्न किया। रावल सुखराज, सूजा तथा देवीदास चन्द्रसेन के साथी थे। मुगल सेनाओं ने इन्हें भी जगह-जगह खूब खदेड़ा। इसके बाद चन्द्रसेन के विरुद्ध सिवाना में मुगल शक्ति लगा दी गयी जिससे तंग आकर वह रामपुरा के पहाड़ों में चला गया। यह जानकर कि मुगलों की छोटी सेना के लिए इतने विस्तृत पहाड़ी प्रदेश को घेरना कठिन था, बादशाह ने सेना में वृद्धि कर दी। फिर भी चन्द्रसेन हाथ न आ सका। सिवाना से निकलकर चन्द्रसेन पीपलोद और वहाँ से काणूजा के पहाड़ों में चला गया और आस-पास लूट-खसोट आरम्भ कर दी। इस नीति से मारवाड़ में लोग अप्रसन्न हो गये। ऐसी स्थिति में उसने मारवाड़ छोड़कर सिरोही और फिर डूंगरपुर और बाँसवाड़ा में शरण लेनी पड़ी। फिर भी मुगल सेना ने उसका पीछा न छोड़ा। इस प्रकार निरन्तर मुगलों से चंद्रसेन संघर्ष करता रहा और 1581 ई. में अपनी मृत्यु तक इसे जारी रखा। विश्वेश्वरनाथ रेऊ ने चन्द्रसेन की तुलना महाराणा प्रताप से की है, जिसे उसी के समान मुगल शक्ति का सामना करना पड़ा और पहाड़ों में भटकने के बाद भी मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की। इसी कारण चंद्रसेन को मारवाड़ का प्रताप भी कहा जाता है।
मोटा राजा उदयसिंह (1583-1595 ई.):-
1581 से 1583 ई. के मध्य मारवाड़ खालसा (सीधे केन्द्र के अधीन) क्षेत्र था। 1583 ई. में अकबर ने उदयसिंह को मुगल अधीनता में जोधपुर का शासक नियुक्त किया। यह चन्द्रसेन का भाई था। अकबर ने उदयसिंह को राज्याभिषेक के तुरन्त बाद गुजरात अभियान पर भेजा। तत्पश्चात् वह सिरोही के शासक का दमन करने के लिए भेजा गया। उदयसिंह ने 1587 ई. में अपनी पुत्री जोधा बाई (जगत गुसाई) का विवाह जहाँगीर के साथ किया। खुर्रम जहाँगीर की इसी पत्नी से उत्पन्न पुत्र था। इस विवाह के अवसर पर उदयसिंह को 1000 का मनसबदार बनाया गया था।
सूरसिंह:-
जोधपुर नगर की तलहटी के महल, सूरजकुण्ड, सूरसागर तालाब तथा सूरसागर स्थित महल सूरसिंह ने बनवाये थे।
महाराजा गजसिंह :-
ये अपने पिता सूरसिंह की मृत्यु के पश्चात् राज्य के उत्तराधिकारी हुये। गजसिंहजी अपने जीवन के आरम्भ से ही होनहार और सुयोग्य थे। दक्षिण की सूबेदारी पाने के बाद इन्होंने अपनी योग्यता और गम्भीरता का परिचय दिया और कितने ही नगरों को जीतकर अपने अधिकार में कर लिया। खिड़कीगढ़, गोलकुण्डा, केलिया, परनाला, कंचनगढ़, आमेर और सितारा पर उसने विजय पायी और ये सभी नगर मुगल राज्य में मिला लिए गये। इनको विजय करने में इन्होंने अपने जिस रणकौशल का परिचय दिया था, उससे प्रसन्न होकर बादशाह ने उसको 'दलथम्भन' की उपाधि दी थी।
बादशाह जहाँगीर के साथ खुर्रम का विद्रोह बढ़ गया इसीलिए उसने बादशाह को सिंहासन से उतार कर स्वयं बैठने का प्रयास किया । जहाँगीर ने राजपूत नरेशों से सहायता लेने का निर्णय लिया। गजसिंहजी की सहायता से विद्रोही सेना की पराजय हुई।
महाराजा जसवंतसिंह प्रथम (1638-1678 ई.):-
जसवंत सिंह का जन्म 1626 ई. में बुरहानपुर में हुआ था। अपने पिता गजसिंह के स्वर्गवास के समय, जसवंत सिंह अपने विवाह हेतु बूंदी में था। गजसिंह की मृत्यु का समाचार प्राप्त होते ही बादशाह शाहजहाँ के द्वारा उसे आगरा पहुँचने का निमन्त्रण भी मिला। वहाँ पहुँचने पर शाही तौर से उसे टीका दिया गया और खिलअत, जड़ाऊ जमधर आदि वस्तुओं से सम्मानित किया गया। इसी अवसर पर उसे राजा का खिताब तथा 4000 जात व सवार का मनसब प्रदान किया गया। चूंकि उसकी आयु उस समय 11 वर्ष की थी, बादशाह ने आसोप ठाकुर राजसिंह कूंपावत को एक हजार जात और चार सौ सवार का मनसब देकर जोधपुर राज्य का मंत्री नियुक्त किया।
1645 ई. में इसे आगरा का प्रबंध सौंपा गया एवं 1648 ई. में कंधार अभियान पर भेजा गया। उत्तराधिकार युद्ध (1657-58 ई.) में उसने औरंगजेब के विरुद्ध धरमत के युद्ध में दारा का साथ दिया, लेकिन कासिम खाँ के विश्वासघात के कारण दारा की पराजय हुई और जसवंत सिंह को जोधपुर लौटना पड़ा।
जसवंत सिंह के जोधपुर पहुँचने पर उसकी 'उदयपुरी रानी' ने किले के द्वार खोलने से इनकार कर दिया और कहलवा भेजा कि राजपूत या तो युद्ध से विजयी लौटते हैं या वहाँ मर मिटते हैं। महाराजा पराजय के बाद नहीं लौट सकते। यह कहकर वह सती होने की तैयारी करने लगी। अंत में रानी की माँ के समझाने एवं जसवंत सिंह द्वारा पराजय का बदला लेने का वचन देने पर दुर्ग के द्वार खोले गए। इस कथा की सत्यता पर संदेह किया जाता है, किंतु इस कथा को श्यामलदास ने मान्यता दी है। 5 जनवरी, 1659 को खजुवा के मैदान में औरंगजेब और जसवंत सिंह के आपसी अविश्वास के कारण वह शाही डेरे को लूटकर जोधपुर रवाना हो गया। बाद में जयसिंह की मध्यस्थता से जसवंत सिंह और मुगल सम्राट औरंगजेब के बीच मनमुटाव कम हो गया। फलतः उसका मनसब पुनः बहाल कर 1659 ई. में उसे गुजरात का सूबेदार बना दिया गया। 1662 ई. में जसवंतसिंह को मराठों के विरुद्ध शाइस्ता खाँ की सहायता करने के लिए दक्षिण भेजा गया। परंतु वहाँ शिवाजी के विरुद्ध कोई खास सफलता इसे नहीं मिली। 1673 ई. में जसवंत सिंह को काबुल भेजा गया। बाद में उसे जमरूद में रहने का आदेश दिया गया और वहीं 28 नवम्बर, 1678 को उसकी मृत्यु हो गई।
जसवंत सिंह विद्वानों का आश्रयदाता था। उसके समय के विद्वानों में सूरत मिश्र, नरहरिदास, नवीन कवि, बनारसीदास आदि प्रसिद्ध हैं। मुँहणोत नैणसी उसका मंत्री था। नैणसी ने नैणसी री ख्यात व मारवाड़ रा परगना री विगत नामक ग्रंथों की रचना की थी।
महाराजा अजीतसिंह :-
जसवंतसिंह के मरते ही उसकी रानी, जो उसके साथ थी, सती होने के लिए तैयार होने लगी। उसने चिता बनवाने का आदेश दिया। लेकिन वह गर्भवती थी, सात महीने का शिशु उसके पेट में था इसलिए उसका सती होना सरदार ऊदा ने उचित नहीं समझा। उसने रानी से प्रार्थना की और उसे समझाया कि इस दशा में आपको सती नहीं होना चाहिए। उससे जो पुत्र पैदा हुए थे, उनकी अकाल मृत्यु हो गयी थी। अब जसवंतसिंह के कोई बालक न था इसलिए साथ के सरदारों ने मिलकर गर्भवती रानी को सती होने से रोका। इस दशा में जसवंतसिंह की रानी सती नहीं हो सकी। जसवंतसिंह के साथ काबुल में जो उप पत्नियाँ थीं, वे सती हो गयीं। उसकी दूसरी रानी मण्डोर नगर में रहती थी। उसको जब जसवंतसिंह की मृत्यु का समाचार मिला तो उसने सती होने की तैयारी की और अपने पति की पगड़ी साथ में लेकर चिता में बैठी और सती हो गयी।
जसवंतसिह की विधवा रानी अभी तक काबुल में थी। उसके साथ बहुत से राठौड़ सैनिक और शूरवीर सरदार थे। समय पर उससे एक पुत्र पैदा हुआ, जिसका नाम अजीत रखा गया। कुछ समय के बाद जब रानी वहाँ से आने के योग्य हो सकी तो राठौड़ सरदार अपने साथ के सभी लोगों को लेकर काबुल से मारवाड़ की तरफ रवाना हुए। उन सबके दिल्ली में पहुँचते ही औरंगजेब ने राठौड़ सरदारों को आगे नहीं जाने दिया और उसने उनको दिल्ली में ही रोक लिया। उसने शिशु अजीत को सरदारों से लेने का प्रयत्न किया। राठौड़ सरदारों के दिल्ली आते ही औरंगजेब ने उनको आदेश दिया कि वे जसवंतसिंह के शिशु अजीत को उसके हवाले कर दें।
राजकुमार अजीत अभी तक आबू पर्वत के किसी एक गुप्त स्थान में था। इन दिनों में दुर्गादास ने उसके संरक्षण और पालन-पोषण का भार अत्यन्त विश्वासी राठौड़ सरदारों को दे रखा था।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
ब्लॉग पढ़ने के लिए धन्यवाद। यदि कोई उत्तम सुझाव अथवा शिक्षा से संबंधित कोई अन्य टॉपिक जिसको आप जानने के लिए उत्सुक है तो नीचे कमेंट करके बताएं। यदि आपको कोई गलती नजर आ रही है या कोई संदेह है तो भी आप कृपया कमेंट करके अवश्य बताएं।। धन्यवाद।।