🖊🖊राज्य सभा एक परिचय🖊
अनुच्छेद 79. संसद् का गठन – संघ के लिए एक संसद् होगी जो राष्ट्रपति और दो सदनों से मिलकर बनेगी जिनके नाम राज्य सभा और लोक सभा होंगे ।
पृष्ठभूमि
काउंसिल ऑफ स्टेट्स का गठन 3 अप्रैल 1952 को हुआ। इसकी पहली बैठक 13 मई 1952 को हुई। काउंसिल ऑफ स्टेट्स, जिसे राज्य सभा भी कहा जाता है, एक ऐसा नाम है जिसकी(हिन्दी नाम) घोषणा सभापीठ(सभापति) द्वारा सभा में 23 अगस्त, 1954 को की गई थी। इसकी अपनी खास विशेषताएं हैं। भारत में द्वितीय सदन का प्रारम्भ 1918 के मोन्टेग-चेम्सफोर्ड प्रतिवेदन से हुआ। भारत सरकार अधिनियम, 1919 में तत्कालीन विधानमंडल के द्वितीय सदन के तौर पर काउंसिल ऑफ स्टेट्स का सृजन करने का उपबंध किया गया जिसका विशेषाधिकार सीमित था और जो वस्तुतः 1921 में अस्तित्व में आया। गवर्नर जनरल तत्कालीन काउंसिल ऑफ स्टेट्स का पदेन अध्यक्ष होता था। भारत सरकार अधिनियम, 1935 के माध्यम से इसके गठन में शायद ही कोई परिवर्तन किए गए।
संविधान सभा, जिसकी पहली बैठक 9 दिसम्बर 1946 को हुई थी, ने भी 1950 तक केन्द्रीय विधानमंडल के रूप में कार्य किया, फिर इसे 'अनंतिम संसद' के रूप में परिवर्तित कर दिया गया। इस अवधि के दौरान, केन्द्रीय विधानमंडल जिसे 'संविधान सभा' (विधायी) और आगे चलकर 'अनंतिम संसद' कहा गया, 1952 में पहले चुनाव कराए जाने तक, एक सदनी रहा।
स्वतंत्र भारत में द्वितीय सदन की उपयोगिता अथवा अनुपयोगिता के संबंध में संविधान सभा में विस्तृत बहस हुई और अन्ततः स्वतंत्र भारत के लिए एक द्विसदनी विधानमंडल बनाने का निर्णय मुख्य रूप से इसलिए किया गया क्योंकि परिसंघीय प्रणाली को अपार विविधताओं वाले इतने विशाल देश के लिए सर्वाधिक सहज स्वरूप की सरकार माना गया। वस्तुतः, एक प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित एकल सभा को स्वतंत्र भारत के समक्ष आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए अपर्याप्त समझा गया। अतः, 'काउंसिल ऑफ स्टेट्स' के रूप में ज्ञात एक ऐसे द्वितीय सदन का सृजन किया गया जिसकी संरचना और निर्वाचन पद्धति प्रत्यक्षतः निर्वाचित लोक सभा से पूर्णतः भिन्न थी। इसे एक ऐसा अन्य सदन समझा गया, जिसकी सदस्य संख्या लोक सभा (हाउस ऑफ पीपुल) से कम है। इसका आशय परिसंघीय सदन अर्थात् एक ऐसी सभा से था जिसका निर्वाचन राज्यों और दो संघ राज्य क्षेत्रों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया गया, जिनमें राज्यों को समान प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया। निर्वाचित सदस्यों के अलावा, राष्ट्रपति द्वारा सभा के लिए 12 सदस्यों के नामनिर्देशन का भी उपबंध किया गया। इसकी सदस्यता हेतु न्यूनतम आयु 30 वर्ष नियत की गई जबकि निचले सदन के लिए यह 25 वर्ष है। काउंसिल ऑफ स्टेट्स की सभा में गरिमा और प्रतिष्ठा के अवयव संयोजित किए गए। ऐसा भारत के उपराष्ट्रपति को राज्य सभा का पदेन सभापति बनाकर किया गया, जो इसकी बैठकों का सभापतित्व करते हैं।
राज्य सभा से संबंधित संवैधानिक उपबंध संरचना/संख्या
संविधान के अनुच्छेद 80 में राज्य सभा की सरंचना बताई गई है। राज्य सभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 250 निर्धारित की गई है, जिनमें से 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्देशित[अनुच्छेद 80(1)(क)] किए जाते हैं और 238 सदस्य राज्यों के और संघ राज्य क्षेत्रों के प्रतिनिधि[अनुच्छेद 80(1)(ख)] होते हैं। तथापि, राज्य सभा के सदस्यों की वर्तमान संख्या 245 है, जिनमें से 233 सदस्य राज्यों(225) और संघ राज्यक्षेत्र जम्मू कश्मीर(4), दिल्ली(3) तथा पुडुचेरी(1) के प्रतिनिधि हैं और 12 राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्देशित हैं। राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्देशित किए जाने वाले सदस्य ऐसे व्यक्ति होंगे जिन्हें साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा जैसे विषयों के संबंध में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव है।[अनुच्छेद 80(3)]
स्थानों का आवंटन
संविधान की चौथी अनुसूची में राज्य सभा में राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों(7 वां संविधान संसोधन 1956) को स्थानों के आवंटन का उपबंध है[अनुच्छेद 80(2)]। स्थानों का आवंटन प्रत्येक राज्य की जनसंख्या के आधार पर किया जाता है। राज्यों के पुनर्गठन तथा नए राज्यों के गठन के परिणामस्वरूप, राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों को आवंटित राज्य सभा में निर्वाचित स्थानों की संख्या वर्ष 1952 से लेकर अब तक समय-समय पर बदलती रही है।
अर्हताएं
संविधान का अनुच्छेद 84 संसद की सदस्यता के लिए अर्हता(Qualification) निर्धारित करता है। राज्य सभा की सदस्यता के लिए अर्हता प्राप्त करने वाले व्यक्ति के पास निम्नलिखित योग्यताएं होनी चाहिए:-
(क) वह भारत का नागरिक होना चाहिए, और संविधान की तीसरी अनुसूची में इस उद्देश्य के लिए निर्धारित प्रपत्र के अनुसार चुनाव आयोग द्वारा अधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष शपथ या प्रतिज्ञान करता है और उस पर अपना हस्ताक्षर करता है।[87 वां संविधान संसोधन अधिनियम 2003]
(ख) उसकी आयु 30 वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए;
(ग) उसके पास ऐसी अन्य योग्यताएं होनी चाहिए जो इस संबंध में संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून द्वारा या उसके तहत निर्धारित की जा सकती हैं।
निरर्हताएँ
अनुच्छेद 102(2) संविधान की दसवीं अनुसूची दलबदल के आधार पर सदस्यों की अयोग्यता का प्रावधान करती है।
दसवीं अनुसूची के प्रावधान:-
राज्य सभा एक स्थायी सदन है और भंग नहीं होती है। हालांकि, राज्य सभा के एक तिहाई सदस्य हर दूसरे वर्ष के बाद सेवानिवृत्त हो जाते हैं [अनुच्छेद 83(1)]। एक सदस्य जो पूर्ण कार्यकाल के लिए चुना जाता है, 6 साल की अवधि के लिए कार्य करता है और इस कार्यकाल की समाप्ति पर राज्य सभा की सदस्यता से सेवानिवृत्त हो जाता है। किसी सदस्य की सेवानिवृत्ति के अलावा अन्य किसी रिक्ति को भरने के लिए किए गए चुनाव को 'उप-चुनाव' कहा जाता है। उप-निर्वाचन में निर्वाचित सदस्य केवल उस सदस्य के शेष कार्यकाल के लिए सदस्य रहता है जिसका त्यागपत्र या मृत्यु या दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता के कारण रिक्ति हुई।
पीठासीन अधिकारी
सभापति और उपसभापति
राज्य सभा के पीठासीन अधिकारियों पर सदन की कार्यवाही के संचालन की जिम्मेदारी होती है। भारत का उपराष्ट्रपति राज्य सभा का पदेन सभापति(अनुच्छेद 64) होता है[अनुच्छेद 89(1)]। राज्य सभा भी अपने सदस्यों में से एक उपसभापति चुनती है[अनुच्छेद 89(2)]। राज्य सभा में उपसभाध्यक्षों का एक पैनल भी होता है, जिसे राज्य सभा के सभापति द्वारा राज्य सभा के सदस्यों में से मनोनीत किया जाता है। सभापति और उपसभापति की अनुपस्थिति में, उपसभाध्यक्षों के पैनल से एक सदस्य सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता करता है।
सभापति
अनुच्छेद 90 के अनुसार उपसभापति का पद रिक्त होना, पदत्याग और पद से हटाया जाना -
राज्यसभा के उपसभापति के रूप में पद धारण करने वाला सदस्य-
(क) यदि राज्य सभा का सदस्य नहीं रहता है तो अपना पद रिक्त कर देगा;
(ख) किसी भी समय सभापति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा; और
(ग) राज्य सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा अपने पद से हटाया जा सकेगाः
परन्तु खंड (ग) के प्रयोजन के लिए कोई संकल्प तब तक प्रस्तावित नहीं किया जाएगा जब तक कि उस संकल्प को प्रस्तावित करने के आशय की कम से कम चौदह दिन की सूचना न दे दी गई हो ।
अनुच्छेद 92 के अनुसार जब सभापति या उपसभापति को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना:-
(1) राज्य सभा की किसी बैठक में, जब उपराष्ट्रपति को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब सभापति, या जब उपसभापति को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उपसभापति, उपस्थित रहने पर भी, पीठासीन नहीं होगा और अनुच्छेद 91 के खंड (2) के उपबंध ऐसी प्रत्येक बैठक के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे उस बैठक के संबंध में लागू होते हैं जिससे, यथास्थिति, सभापति या उपसभापति अनुपस्थित है ।
(2) जब उपराष्ट्रपति को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प राज्य सभा में विचाराधीन है तब सभापति को राज्य सभा में बोलने और उसकी कार्यवाहियों में अन्यथा भाग लेने का अधिकार होगा, किन्तु वह अनुच्छेद 100 में किसी बात के होते हुए भी ऐसे संकल्प पर या ऐसी कार्यवाहियों के दौरान किसी अन्य विषय पर, मत देने का बिल्कुल हकदार नहीं होगा ।
उप-सभापति
महासचिव की नियुक्ति राज्य सभा के सभापति द्वारा की जाती है और उनका पद संघ के सर्वोच्च सिविल सेवक के समतुल्य होता है। महासचिव अप्रकट रूप से कार्य करते हैं और संसदीय मामलों पर सलाह देने के लिए तत्परता से पीठासीन अधिकारियों को उपलब्ध रहते हैं। महासचिव राज्य सभा सचिवालय के प्रशासनिक प्रमुख और सभा के अभिलेखों के संरक्षक भी हैं। वह राज्य सभा के सभापति के निदेश व नियंत्रणाधीन कार्य करते हैं।
| No. | Name | Term of office | ||
|---|---|---|---|---|
| Took office | Left office | Time in office | ||
| 1 | S. N. Mukherjee | 13 May 1952 | 8 October 1963 | 11 years, 148 days |
| 2 | B. N. Banerjee | 9 October 1963 | 31 March 1976 | 12 years, 174 days |
| 3 | S. S. Bhalerao | 1 April 1976 | 30 April 1981 | 5 years, 29 days |
| 4 | Sudarshan Agarwal | 1 May 1981 | 30 June 1993 | 12 years, 60 days |
| 5 | V. S. Ramadevi | 1 July 1993 | 25 July 1997 | 4 years, 24 days |
| 6 | S. S. Sohoni | 25 July 1997 | 2 October 1997 | 69 days |
| 7 | Ramesh Chandra Tripathi | 3 October 1997 | 31 August 2002 | 4 years, 332 days |
| 8 | Yogendra Narain | 1 September 2002 | 14 September 2007 | 5 years, 13 days |
| 9 | V. K. Agnihotri | 29 October 2007 | 30 September 2012 | 4 years, 337 days |
| 10 | Shumsher K. Sheriff | 1 October 2012 | 31 August 2017 | 4 years, 334 days |
| 11 | Desh Deepak Verma | 1 September 2017 | 31 August 2021 | 3 years, 364 days |
| 12 | P. P. K. Ramacharyulu | 1 September 2021 | 11 November 2021 | 71 days |
| 13 | Pramod Chandra Mody | 12 November 2021 | Incumbent | 4 years, 7 days |
दोनों सभाओं के बीच संबंध
संविधान के अनुच्छेद 75(3) के तहत्, मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोक सभा (लोक सभा) के प्रति उत्तरदायी होती है, जिसका अर्थ है कि राज्य सभा सरकार नहीं बना सकती और न ही गिरा सकती है। हालाँकि, यह सरकार पर नियंत्रण रख सकता है और यह कार्य काफी प्रमुख हो जाता है, खासकर जब सरकार को राज्य सभा में बहुमत प्राप्त नहीं होता है।
दोनों सदनों के बीच गतिरोध को हल करने के लिए, एक सामान्य कानून के मामले में, संविधान दोनों सदनों की संयुक्त बैठक का प्रावधान(अनुच्छेद 108) करता है। वास्तव में, अतीत में तीन बार(दहेज निषेध विधेयक 1960, बैंकिंग सेवा आयोग (निरसन) विधेयक 1977, आतंकवाद निवारण विधेयक 2002) ऐसे अवसर आए हैं जब संसद के सदनों के बीच मतभेदों को सुलझाने के लिए संयुक्त बैठक में बैठक हुई थी। संयुक्त बैठक में मुद्दों का निर्णय दोनों सदनों के उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों की कुल संख्या के बहुमत से किया जाता है।
संयुक्त बैठक लोक सभा अध्यक्ष की अध्यक्षता में संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में आयोजित की जाती है। हालाँकि, धन विधेयक के मामले में, दोनों सदनों की संयुक्त बैठक के लिए संविधान में कोई प्रावधान नहीं है क्योंकि लोक सभा को वित्तीय मामलों में राज्य सभा पर स्पष्ट रूप से प्रमुखता प्राप्त है। जहां तक संविधान संशोधन विधेयक का संबंध है, संविधान में यह प्रावधान किया गया है कि ऐसे विधेयक को दोनों सदनों द्वारा संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत निर्धारित विशिष्ट बहुमत से पारित किया जाना है। इसलिए, संविधान संशोधन विधेयक के संबंध में दोनों सदनों के बीच गतिरोध को दूर करने का कोई प्रावधान नहीं है।
मंत्री संसद के किसी भी सदन से संबंधित हो सकते हैं। संविधान इस संबंध में दोनों सदनों के बीच कोई भेद नहीं करता है। मंत्रियों को किसी भी सदन की कार्यवाही में बोलने और भाग लेने का अधिकार है(अनुच्छेद 88), लेकिन वे केवल उसी सदन में मतदान करने के हकदार हैं, जिसके वे सदस्य हैं।
संसद के सदनों, उनके सदस्यों और समितियों की शक्तियों, विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों के संबंध में, दोनों सदनों को संविधान द्वारा बिल्कुल समान स्तर पर रखा गया है।
अन्य महत्वपूर्ण मामले जिनके संबंध में दोनों सदनों को समान शक्तियां प्राप्त हैं, वे हैं राष्ट्रपति का चुनाव और महाभियोग, उपराष्ट्रपति का चुनाव, आपातकाल की घोषणा का अनुमोदन, राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता और वित्तीय आपातकाल की घोषणा। विभिन्न वैधानिक प्राधिकरणों आदि से रिपोर्ट और कागजात प्राप्त करने के संबंध में, दोनों सदनों को समान अधिकार हैं।
मंत्रिपरिषद की सामूहिक जिम्मेदारी और कुछ वित्तीय मामलों को छोड़कर, जो केवल लोक सभा के क्षेत्र में आते हैं, दोनों सदनों को समान शक्तियां प्राप्त हैं।
राज्य सभा की विशेष शक्तिया
एक परिसंघीय सदन होने के नाते राज्य सभा को संविधान के अधीन कुछ विशेष शक्तियां प्राप्त हैं। विधान से संबंधित सभी विषयों/क्षेत्रों को तीन सूचियों में विभाजित किया गया है- संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची। संघ और राज्य सूचियां परस्पर अपवर्जित हैं अर्थात् कोई भी दूसरे के क्षेत्र में रखे गए विषय पर कानून नहीं बना सकता।
तथापि, यदि राज्य सभा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों के बहुमत द्वारा यह कहते हुए एक संकल्प पारित करती है कि यह "राष्ट्रीय हित में आवश्यक या समीचीन" है कि संसद, राज्य सूची में प्रमाणित किसी विषय पर विधि बनाए, तो संसद भारत के संपूर्ण राज्य-क्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए उस संकल्प में विनिर्दिष्ट विषय पर विधि बनाने हेतु अधिकार-संपन्न हो जाती है।[अनुच्छेद 249(1)] ऐसा संकल्प अधिकतम एक वर्ष की अवधि के लिए प्रवृत्त रहेगा परन्तु यह अवधि इसी प्रकार के संकल्प को पारित करके बार-बार एक वर्ष के लिए पुनः बढ़ायी जा सकती है[अनुच्छेद 249(2)]।
यदि राज्य सभा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों के बहुमत द्वारा यह घोषित करते हुए एक संकल्प पारित करती है कि संघ और राज्यों के लिए सम्मिलित एक या अधिक अखिल भारतीय सेवाओं का सृजन किया जाना राष्ट्रीय हित में आवश्यक या समीचीन है, तो संसद विधि द्वारा ऐसी सेवाओं का सृजन करने के लिए अधिकार-संपन्न हो जाती है।[अनुच्छेद 312(1)]
संविधान के अधीन, राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपात की स्थिति में, किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र के विफल हो जाने की स्थिति में अथवा वित्तीय आपात की स्थिति में उद्घोषणा जारी करने का अधिकार है। ऐसी प्रत्येक उद्घोषणा को संसद की दोनों सभाओं द्वारा नियत अवधि के भीतर अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है। तथापि, कतिपय परिस्थितियों में राज्य सभा के पास इस संबंध में विशेष शक्तियाँ हैं। यदि कोई उद्घोषणा उस समय की जाती है जब लोक सभा का विघटन हो गया है अथवा लोक सभा का विघटन इसके अनुमोदन के लिए अनुज्ञात अवधि के भीतर हो जाता है और यदि इसे अनुमोदित करने वाला संकल्प राज्य सभा द्वारा अनुच्छेद 352, 356 और 360 के अधीन संविधान में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर पारित कर दिया जाता है, तब वह उद्घोषणा प्रभावी रहेगी।
वित्तीय मामलों में राज्य सभा
धन विधेयक राज्य सभा में पुरः स्थापित नहीं किया जा सकता है[अनुच्छेद 109(1)]। इसके उस सभा द्वारा पारित किए जाने के उपरान्त इसे राज्य सभा को उसकी सहमति अथवा सिफारिश के लिए पारेषित किया जाता है। ऐसे विधेयक के संबंध में राज्य सभा की शक्ति सीमित है। राज्य सभा को ऐसे विधेयक की प्राप्ति से चौदह दिन के भीतर उसे लोक सभा को लौटाना पड़ता है[अनुच्छेद 109(2)]। यदि यह उस अवधि के भीतर लोक सभा को नहीं लौटाया जाता है तो विधेयक को उक्त अवधि की समाप्ति पर दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित किया गया समझा जाएगा जिसमें इसे लोक सभा द्वारा पारित किया गया था[अनुच्छेद 109(5)]। राज्य सभा धन विधेयक में संशोधन भी नहीं कर सकती; यह केवल संशोधनों की सिफारिश कर सकती है और लोक सभा, राज्य सभा की सभी या किन्हीं सिफारिशों को स्वीकार अथवा अस्वीकार कर सकेगी।
धन विधेयक के अलावा, वित्त विधेयकों की कतिपय अन्य श्रेणियों को भी राज्य सभा में पुरः स्थापित नहीं किया जा सकता। तथापि, कुछ अन्य प्रकार के वित्त विधेयक हैं जिनके संबंध में राज्य सभा की शक्तियों पर कोई निर्बंधन नहीं है। ये विधेयक किसी भी सभा में प्रस्तुत किए जा सकते हैं और राज्य सभा को ऐसे वित्त विधेयकों को किसी अन्य विधेयक की तरह ही अस्वीकृत या संशोधित करने का अधिकार है। वस्तुतः ऐसे विधेयक संसद की किसी भी सभा द्वारा तब तक पारित नहीं किए जा सकते, जब तक राष्ट्रपति ने उस पर विचार करने के लिए उस सभा से सिफारिश नहीं की हो।
तथापि, इन सारी बातों से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि राज्य सभा का वित्त संबंधी मामलों से कुछ भी लेना-देना नहीं है। भारत सरकार के बजट को प्रतिवर्ष राज्य सभा के समक्ष भी रखा जाता है और इसके सदस्यगण उस पर चर्चा करते हैं। यद्यपि राज्य सभा विभिन्न मंत्रालयों की अनुदान मांगों पर मतदान नहीं करती यह मामला अनन्य रूप से लोक सभा के लिए सुरक्षित है फिर भी, भारत की संचित निधि से किसी धन की निकासी तब तक नहीं की जा सकती, जब तक दोनों सभाओं द्वारा विनियोग विधेयक को पारित नहीं कर दिया जाता। इसी प्रकार, वित्त विधेयक को भी राज्य सभा के समक्ष लाया जाता है। इसके अलावा, विभाग संबंधित संसदीय स्थायी समितियां, जो मंत्रालयों/विभागों की वार्षिक अनुदान मांगों की जांच करती हैं, संयुक्त समितियां हैं जिनमें दस सदस्य राज्य सभा से होते हैं।
सभा के नेता
सभापति और उपसभापति के अलावा, सदन का नेता एक महत्वपूर्ण संसदीय पदाधिकारी होता है जो सदन में कार्य के कुशल और सुचारू संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। राज्य सभा में सदन का नेता आम तौर पर प्रधान मंत्री होता है, यदि वह इसका सदस्य होता है अथवा मंत्री होता है जो सदन का सदस्य होता है और प्रधान मंत्री द्वारा सदन के नेता के रूप में कार्य करने के लिए नामित किया जाता है।
सदन के नेता का प्राथमिक उत्तरदायित्व सदन में एक सामंजस्यपूर्ण और सार्थक बहस के लिए सदन के सभी वर्गों के बीच समन्वय बनाए रखना है। इस प्रयोजन के लिए वह न केवल सरकार बल्कि विपक्ष, व्यक्तिगत मंत्रियों और पीठासीन अधिकारी के भी निकट संपर्क में रहता है। वह पीठासीन अधिकारी के लिए परामर्श के लिए आसानी से उपलब्ध होने के लिए कक्ष में सभापति के दायीं ओर पहली सीट (पहली पंक्ति) पर बैठता है।
राज्य सभा के प्रक्रिया और कार्य-संचालन नियमों के अनुसार, सभापति सदन में सरकारी कार्य की व्यवस्था, राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के लिए दिनों के आवंटन या समय के आवंटन के संबंध में सदन के नेता से परामर्श करता है। शुक्रवार के अलावा किसी भी दिन गैर-सरकारी सदस्यों के कार्य पर चर्चा, अनियत दिन वाले प्रस्तावों पर चर्चा, अल्पकालिक चर्चा और धन विधेयक पर विचार और वापस किए जाने के संबंध में सदन के नेता से पारामर्श किया जाता है। किसी उत्कृष्ट व्यक्तित्व, राष्ट्रीय नेता या अंतर्राष्ट्रीय गणमान्य व्यक्ति की मृत्यु के मामले में सदन के स्थगित होने या अन्यथा के मामले में भी सभापति द्वारा उनसे परामर्श किया जाता है।
गठबंधन सरकारों के दौर में सदन के नेता का कार्य और भी चुनौतीपूर्ण हो गया है। वह यह सुनिश्चित करता है कि सदन के सामने लाए गए किसी भी मामले पर सार्थक चर्चा के लिए सदन को सभी संभव और उचित सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। वह सदन की भावना व्यक्त करने में सदन के प्रवक्ता के रूप में कार्य करता है और औपचारिक या औपचारिक अवसरों पर इसका प्रतिनिधित्व करता है।
निम्नलिखित सदस्य राज्य सभा में सदन के नेता रहे हैं:-
नाम से तक
1. श्री एन. गोपालस्वामी अयंगर:- मई 1952 फरवरी 1953
2. श्री चारु चंद्र विश्वास:- फरवरी 1953 नवंबर 1954
3. श्री लाल बहादुर शास्त्री:- नवम्बर 1954 मार्च 1955
4. श्री गोविंद बल्लभ पंत:- मार्च 1955 फरवरी 1961
5. हाफिज मोहम्मद इब्राहिम:- फरवरी 1961 अगस्त 1963
6. श्री यशवंतराव बलवंतराव चव्हाण:- अगस्त 1963 दिसंबर 1963
7. श्री जय सुख लाल हाथी फरवरी:- 1964 मार्च 1964
8. श्री एम.सी. छागला:- मार्च 1964 नवंबर 1967
9. श्री जय सुख लाल हाथी:- नवम्बर 1967 नवम्बर 1969
10. श्री कोडरादास कालिदास शाह:- नवंबर 1969 मई 1971
11. श्री उमा शंकर दीक्षित:- मई 1971 दिसम्बर 1975
12. श्री कमलापति त्रिपाठी:- दिसम्बर 1975 मार्च 1977
13. श्री लाल के. आडवाणी:- मार्च 1977 अगस्त 1979
14. श्री के.सी. पंत:- अगस्त 1979 जनवरी 1980
15. श्री प्रणब मुखर्जी:- जनवरी 1980 जुलाई 1981 और अगस्त 1981 दिसम्बर 1984
16. श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह:- दिसम्बर 1984 अप्रैल 1987
17. श्री एन.डी. तिवारी:- अप्रैल 1987 जून 1988
18. श्री पी. शिव शंकर:- जुलाई 1988 दिसम्बर 1989
19. श्री एम.एस. गुरुपादस्वामी:- दिसंबर 1989 नवंबर 1990
20. श्री यशवंत सिन्हा:- दिसंबर 1990 जून 1991
21. श्री एस.बी. चव्हाण:- जुलाई 1991 अप्रैल 1996
22. श्री सिकंदर बख्त:- 20 मई 1996 31 मई 1996
23. श्री इंद्र कुमार गुजराल:- जून 1996 नवंबर 1996
24. श्री एच.डी. देवेगौड़ा:- नवंबर 1996 अप्रैल 1997
25. श्री इंद्र कुमार गुजराल:- अप्रैल 1997 मार्च 1998
26. श्री सिकंदर बख्त:- मार्च 1998 अक्टूबर 1999
27. श्री जसवंत सिंह:- अक्टूबर 1999 मई 2004
28. डॉ. मनमोहन सिंह:- जून 2004 मई, 2009 और मई 2009 मई, 2014
29. श्री अरुण जेटली:- जून, 2014 अप्रैल, 2018 और अप्रैल, 2018 मई, 2019
30 श्री थावरचंद गहलोत:- जून, 2019 जुलाई, 2021
31. श्री पीयूष गोयल:- जुलाई, 2021 से जून 2024 तक
32. जगत प्रकाश नड्डा:- 24 जून 2024 से
विपक्ष के नेता
विधायिका में विपक्ष के नेता का पद अत्यधिक सार्वजनिक महत्व का होता है। इसका महत्व संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष को दी गई केंद्रीय भूमिका से निकलता है। विपक्ष के नेता की भूमिका वास्तव में बहुत चुनौतीपूर्ण होती है क्योंकि उसे विधायिका और जनता के प्रति सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करनी होती है और सरकार के प्रस्तावों/नीतियों के विकल्प पेश करने होते हैं। संसद और राष्ट्र के प्रति इस विशेष जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए उन्हें एक बहुत ही कुशल सांसद बनना होगा।
वर्ष 1969 तक राज्य सभा में वास्तविक अर्थों में विपक्ष का कोई नेता नहीं था। उस समय तक,बिना किसी औपचारिक मान्यता, स्थिति या विशेषाधिकार के सबसे अधिक सदस्यों वाले विपक्ष के नेता को विपक्ष के नेता के रूप में बुलाने की प्रथा थी। विपक्ष के नेता के कार्यालय को संसद में विपक्ष के नेताओं के वेतन और भत्ते अधिनियम, 1977 के माध्यम से आधिकारिक मान्यता दी गई थी। उक्त अधिनियम के अनुसार, विपक्ष के नेता को 3 शर्तों को पूरा करना चाहिए, अर्थात्,
(i) उसे सदन का सदस्य होना
(ii) सबसे बड़ी संख्या वाली सरकार के विरोध में पार्टी के राज्य सभा में नेता होना और
(iii) राज्य सभा के सभापति द्वारा इस रूप में मान्यता प्राप्त होना।
निम्नलिखित सदस्य राज्यसभा में विपक्ष के नेता रहे हैं:-
नाम से तक
1 श्री श्याम नंदन मिश्र:- दिसम्बर 1969 मार्च 1971
2 श्री एम.एस. गुरुपादस्वामी:- मार्च 1971 अप्रैल 1972
3 श्री कमलापति त्रिपाठी:- 30.3.1977 15.2.1978
4 श्री भोला पासवान शास्त्री:- 24.2.1978 23.3.1978
5 श्री कमलापति त्रिपाठी:- 23.3.1978 2.4.1978 और 18.4.1978 8.1.1980
6 श्री लाल के. आडवाणी:- 21.1.1980 7.4.1980
7 श्री पी. शिव शंकर:- 18.12.1989 2.1.1991
8 श्री एम.एस. गुरुपादस्वामी:- 28.6.1991 21.7.1991
9 श्री एस जयपाल रेड्डी 22.7.1991 29.6.1992
10 श्री सिकंदर बख्त:- 7.7.1992 10.4.1996 और 10.4.1996 23.5.1996
11 श्री एस.बी. चव्हाण:- 23.5.1996 1.6.1996
12 श्री सिकंदर बख्त:- 1.6.1996 19.3.1998
13 डॉ मनमोहन सिंह:- 21.3.1998 21.5.2004
14 श्री जसवंत सिंह:- 3.6.2004 4.7.2004 और 5.7.2004 16.5.2009
15 श्री अरुण जेटली:- 3.6.2009 26.5.2014
16 श्री गुलाम नबी आजाद:- 8.6.2014 10.02.2015 और 16.2.2015 15.2.2021
17. श्री मल्लिकार्जुन खड़गे:- 16.2.2021 से आज तक
राज्य सभा हमारी राजनीति में एक बहुत ही रचनात्मक और प्रभावी भूमिका निभाती है। विधायी क्षेत्र में और सरकार की नीतियों को प्रभावित करने में इसका प्रदर्शन काफी महत्वपूर्ण रहा है। वास्तव में, राज्य सभा ने संवैधानिक जनादेश के अनुसार लोक सभा के साथ सहयोग की भावना से काम किया है। राज्य सभा ने जल्दबाजी में कानून बनाने से रोका है और संघीय सिद्धांत का प्रतिनिधित्व करने वाले एक प्रतिष्ठित कक्ष के रूप में कार्य किया है। एक संघीय सदन के रूप में, इसने देश की एकता और अखंडता के लिए काम किया है और संसदीय लोकतंत्र में लोगों के विश्वास को मजबूत किया है।
संसदीय समितियां
संसदीय समितियां संसदीय प्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वे संसद, कार्यपालिका और आम जनता के बीच एक जीवंत कड़ी हैं। समितियों की आवश्यकता दो कारकों से उत्पन्न होती है:-
- पहला कार्यपालिका के कार्यों पर विधायिका की ओर से सतर्कता की आवश्यकता है।
- दूसरा यह है कि आधुनिक विधायिका इन दिनों भारी मात्रा में बोझ से दबी है। अतः अपने निपटान में सीमित समय के साथ काम करें।
इस प्रकार यह असंभव हो जाता है कि प्रत्येक मामले की पूरी तरह से और व्यवस्थित रूप से जांच की जाए और सदन के पटल पर विचार किया जाए। यदि कार्य युक्तियुक्त सावधानी से करना है तो स्वाभाविक रूप से कुछ संसदीय उत्तरदायित्व एक ऐसी एजेंसी को सौंपनी होगी जिस पर पूरे सदन का विश्वास हो। इसलिए, सभा के कुछ कार्यों को समितियों को सौंपना एक सामान्य प्रथा बन गई है। यह और अधिक आवश्यक हो गया है क्योंकि एक समिति उस मामले पर विशेषज्ञता प्रदान करती है जो इसे संदर्भित किया जाता है। एक समिति में, मामले पर विस्तार से विचार-विमर्श किया जाता है, विचार स्वतंत्र रूप से व्यक्त किए जाते हैं, मामले पर गहराई से, व्यवसायिक तरीके से और शांत वातावरण में विचार किया जाता है। अधिकांश समितियों में, जनता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी होती है जब सुझाव वाले ज्ञापन प्राप्त होते हैं, मौके पर अध्ययन किया जाता है और मौखिक साक्ष्य लिया जाता है जो समितियों को निष्कर्ष पर पहुंचने में मदद करता है।
समितियां विधायिका को अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने और अपने कार्यों को प्रभावी ढंग से, तेजी से और कुशलता से विनियमित करने में सहायता करती हैं। समितियों के माध्यम से, संसद प्रशासन पर अपने नियंत्रण और प्रभाव का प्रयोग करती है। संसदीय समितियों का कार्यपालिका पर लाभकारी प्रभाव पड़ता है। समितियाँ प्रशासन को कमजोर करने के लिए नहीं हैं, बल्कि वे कार्यपालिका द्वारा प्रयोग की जाने वाली शक्ति के दुरुपयोग को रोकती हैं। तथापि, यह याद रखना चाहिए कि समितियों के कार्यकरण के संदर्भ में संसदीय नियंत्रण का अर्थ प्रभाव हो सकता है, प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं; सलाह, आदेश नहीं; आलोचना, बाधा नहीं; जांच, पहल नहीं; और जवाबदेही, पूर्व स्वीकृति नहीं। यह, संक्षेप में, समिति प्रणाली का औचित्य है। समितियों ने गैर-पक्षपातपूर्ण तरीके से कार्य किया है और उनके विचार-विमर्श और निष्कर्ष वस्तुनिष्ठ रहे हैं। यह काफी हद तक संसदीय समितियों की सिफारिशों के सम्मान के लिए जिम्मेदार है।
समितियों के प्रकार:-
राज्य सभा में समितियों की एक संगठित प्रणाली है। इन समितियों में नियुक्तियाँ, पदावधि, कार्य और कार्य संचालन की प्रक्रिया नियमों के प्रावधानों और अध्यक्ष द्वारा समय-समय पर दिए गए निर्देशों के तहत् विनियमित होती है। समितियों को तदर्थ समितियों और स्थायी समितियों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।
विभागों से संबद्ध स्थायी समितियाँ:-
दोनों सदनों की 24 विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समितियों में से, निम्नलिखित 8 समितियाँ राज्य सभा के सभापति के निर्देशन और नियंत्रण में कार्य करती हैं:-
- वाणिज्य समिति
- गृह मामलों की समिति
- मानव संसाधन विकास समिति
- उद्योग समिति
- विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण और वन समिति
- परिवहन, पर्यटन और संस्कृति पर समिति
- स्वास्थ्य और परिवार कल्याण समिति
- कार्मिक, सार्वजनिक समिति शिकायत, कानून और न्याय
अन्य 16 समितियां लोकसभा अध्यक्ष के निर्देशन और नियंत्रण में कार्य करती हैं।
संयुक्त संसदीय समितियां (JPC)
विधेयकों पर प्रवर/संयुक्त समितियां, विधेयक के प्रभारी मंत्री या किसी सदस्य द्वारा पेश किए गए विशिष्ट प्रस्ताव पर सदन द्वारा गठित की जाती हैं और समय-समय पर उन्हें भेजे गए विधेयकों पर विचार करने और उन पर रिपोर्ट करने के लिए सदन द्वारा स्वीकृत किया जाता है। इन समितियों को अन्य तदर्थ समितियों से अलग किया जाता है, क्योंकि वे विधेयकों से संबंधित हैं और उनके द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया प्रक्रिया के नियमों में निर्धारित की गई है। वे अध्यक्ष के निर्देशन और नियंत्रण में कार्य करते हैं।
स्थायी समितियाँ
समितियों की दूसरी श्रेणी, अर्थात् स्थायी समितियों को उनके कार्यों के अनुसार 4 व्यापक शीर्षों के तहत विभाजित किया जा सकता है:-
1. जांच करने के लिए समितियां-
(ए) याचिका समिति:-
राज्य सभा की याचिका समिति में 10 सदस्य होते हैं। याचिका समिति संसद की सबसे पुरानी समितियों में से एक है। गणपूर्ति 5 होती है। इस समिति का गठन 1952 में राज्य सभा के गठन के बाद हुआ था। समिति के अध्यक्ष को समिति के सदस्यों में से चयनित द्वारा नियुक्त किया जाता है। मान्यता है कि यदि उपाध्यक्ष समिति का सदस्य है तो उसे समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया जाएगा।समिति को सौंपी गई प्रत्येक याचिका की जांच करना, और यदि याचिका में नियमों का पालन किया गया हो, यह र्निदेश देना कि याचिका को विस्तृत रूप में अथवा संक्षिप्त रूप में परिचालित किया जाए, जैसे भी मामला हो, और याचिका में की गई विशिष्ट शिकायतों को वह,
ऐसा साक्ष्य प्राप्त करने के बाद जिसे वह ठीक समझे, सभा को प्रतिवेदित करना और विचाराधीन मामलेसे संबंधित, ठोस रूप में या भविष्य में ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति रोकने के लिएउपचारी उपायों का सुझाव देना। समिति का प्रतिवेदन समिति के अध्यक्ष द्वारा अथवा उसकी अनुपस्थिति में समिति के किसी सदस्य द्वारा समय समय पर सभा के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।समिति के प्रतिवेदन समय-समय पर समिति के सभापति या उनकी अनुपस्थिति में समिति के किसी सदस्य द्वारा सदन में प्रस्तुत किए जाते हैं।
(बी) विशेषाधिकार समिति:-
समिति में 10 सदस्य होते हैं। समिति सदन या सभापति द्वारा उसे भेजे गए प्रत्येक विशेषाधिकार संबंधी प्रश्न की जाँच करती है और प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर यह निर्धारित करती है कि क्या विशेषाधिकार का उल्लंघन हुआ है, यदि हाँ, तो उल्लंघन की प्रकृति और उसके कारण उत्पन्न परिस्थितियाँ क्या हैं, और ऐसी सिफ़ारिशें करती है जो वह उचित समझे। समिति सदन को उस प्रक्रिया की भी सूचना दे सकती है जिसका पालन समिति द्वारा की गई सिफ़ारिशों को लागू करने के लिए सदन द्वारा किया जा सकता है। समिति के प्रतिवेदन समय-समय पर समिति के सभापति या उनकी अनुपस्थिति में समिति के किसी सदस्य द्वारा सदन में प्रस्तुत किए जाते हैं। प्रतिवेदन प्रस्तुत होने के बाद, समिति के सभापति या समिति के किसी अन्य सदस्य द्वारा प्रतिवेदन पर विचार हेतु प्रस्ताव प्रस्तुत किया जा सकता है। कोई भी सदस्य प्रतिवेदन पर विचार हेतु प्रस्ताव में संशोधन की सूचना ऐसे प्रारूप में दे सकता है जिसे सभापति उचित समझे। प्रतिवेदन पर विचार हेतु प्रस्ताव स्वीकृत होने के बाद, यथास्थिति, सभापति या समिति का कोई सदस्य या कोई अन्य सदस्य यह प्रस्ताव रख सकता है कि सदन प्रतिवेदन में निहित सिफ़ारिशों से सहमत है या असहमत है या संशोधनों से सहमत है।
(सी) आचार समिति:-
राज्य सभा के सभापति द्वारा 4 मार्च, 1997 को राज्य सभा की आचार समिति का गठन किया गया था। इसमें 10 सदस्य होते हैं। इस समिति का अधिदेश सदस्यों के नैतिक आचरण पर नजर रखना तथा सदस्यों के नैतिक और अन्य कदाचारों के संबंध में समिति को भेजे गए मामलों की पड़ताल करना है। प्रकिया और अन्य मामलों के सन्दर्भ में, विशेषाधिकार समिति पर लागू होने वाले नियम राज्य सभा के सभापति द्वारा समय-समय पर किए गए परिवर्तनों और संशोधनों के साथ आचार समिति पर भी लागू होते हैं। राज्य सभा में राजनैतिक दलों/समूहों के नेताओं को आचार समिति के सदस्यों के रूप में नामित किया जाता है। राज्य सभा के सभापति द्वारा राज्य सभा के सदस्यों के बीच से ही इस समिति का अध्यक्ष नामित किया जाता है।
2. समितियां जांच और नियंत्रण के लिए-
(ए) सरकारी आश्वासनों पर समिति:-
समिति में 10 सदस्य होंगे जो सभापति द्वारा नाम-निर्देशित किए जायेंगे।समिति का अध्यक्ष समिति के सदस्यों में से सभापति द्वारा नियुक्त किया जाएगा परंतु यदि उपसभापति समिति का सदस्य हो तो उसे समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया जाएगा। यदि समिति का अध्यक्ष किसी कारण से कार्य करने में असमर्थ हो तो सभापति उसी प्रकार से उसके स्थान पर समिति का एक अन्य अध्यक्ष नियुक्त कर सकेगा। यदि समिति का अध्यक्ष किसी बैठक से अनुपस्थित रहते हैं तो समिति किसी अन्य सदस्य को उस बैठक में समिति एक अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिए चुनेगी। समिति की बैठक के लिए गणपूर्ति 5 से होगी। समिति का अध्यक्ष प्रथमत: मत नहीं देगा परंतु किसी विषय पर मतों की संख्या समान होने की अवस्था में उसका मत निर्णायक होगा और वह उसका प्रयोग करेगा। समिति का प्रतिवेदन राज्य सभा में समिति के अध्यक्ष द्वारा या उनकी अनुपस्थिति में समिति के किसी सदस्य द्वारा प्रस्तुत किया जाएगा।
समिति के कार्य हैं:-
(क) सभा में प्रश्न काल के दौरान तथा विधेयको, संकल्पों, प्रस्तावों, ध्यानार्कण सूचनाओं आदि से संबंधित चर्चा केदौरान मंत्री द्वारा समय-समय पर दिए गए आश्वासनों, प्रतिज्ञाओं, वचनों आदि की संवीक्षा करना; और
(ख) सभा को यह जानकारी देना कि ऐसे आश्वासन, वायदे, वचन आदि का किस सीमा तक पूर्णरूपेण यासंतोषजनक तीरके से क्रियान्वयन हुआ है, और यदि क्रियान्वयन हुआ है, तो क्या इस तरह का क्रियान्वयन ऐसे प्रयोजन के लिए निर्धारित आवश्यक न्यूनतम समयसीमा के भीतर हुआ है अथवा क्या आश्वासनों के क्रियान्वयन में अत्यधिक विलंब हुआ है और यदि हां, तो इसके क्या कारण हैं। समिति अपने दिए गए आश्वासनों, वायदों, वचनों आदि से संबंधित किसी मुद्दे पर विचारकरने के लिए इससे संबंधित सभी मामलों के संबंध में स्वयं अपनी प्रक्रिया निर्धारित करती है। समिति के किसी अन्य सदस्य द्वारा सभा में समय-समय पर प्रस्तुत किए जाते हैं।
(बी) अधीनस्थ विधान पर समिति:-
समिति का कार्य यह जांच करना और राज्य सभा को रिपोर्ट करना है कि क्या संविधान द्वारा प्रदत्त या संसद द्वारा प्रत्यायोजन के माध्यम से नियम, विनियम, उप-नियम, योजना या अन्य वैधानिक साधन बनाने के लिए प्रदान की गई शक्तियों का, इस तरह के प्रदानन या प्रत्यायोजन, जैसा भी मामला हो, के भीतर ठीक से प्रयोग किया जा रहा है। समिति संविधान या संसद द्वारा अधीनस्थ प्राधिकारी को सौंपे गए विधायी कार्यों के अनुसरण में बनाए गए ऐसे नियम, विनियम, उप-नियम, योजना या अन्य वैधानिक साधनों की जांच करती है, भले ही इसे सदन के पटल पर रखना आवश्यक हो या नहीं और, यह विशेष रूप से निम्न विषयों पर विचार करती है :-
(क) क्या यह संविधान या उस अधिनियम, जिसके अनुसरण में इसे बनाया गया है, के सामान्य उद्देश्यों के अनुरूप है;
(ख) क्या इसमें ऐसा मामला शामिल है जिसे समिति की राय में संसद के किसी अधिनियम के तहत अधिक उचित तरीके से निपटाया जाना चाहिए;
(ग) क्या इसमें कोई कर लगाया जाना शामिल है;
(घ) क्या यह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र का वारण करता है;
(ड.) क्या यह किसी ऐसे उपबंध को भूतलक्षी प्रभाव देता है जिसके संबंध में संविधान या वह अधिनियम जिसके अनुसरण में इसे बनाया गया है, स्पष्ट रूप से ऐसी कोई शक्ति नहीं देता है;
(च) क्या इसमें भारत की संचित निधि या सार्वजनिक राजस्व से व्यय शामिल है;
(छ) क्या इसमें संविधान या वह अधिनियम, जिसके अनुसरण में इसे बनाया गया है, द्वारा प्रदत्त शक्तियों का कुछ असामान्य या अप्रत्याशित प्रयोग प्रतीत होता है;
(ज) क्या इसके प्रकाशन में या इसे संसद के सभा पटल रखने में अनुचित विलंब प्रतीत होता है; तथा
(झ) क्या किसी कारण से इसकी संरचना रूप या तात्पर्य में स्पष्टीकरण की आवश्यकता है।
समिति उन विधेयकों की जांच करती है जिनके द्वारा नियम, विनियम, उप-नियम आदि बनाने के लिए शक्तियाँ प्रत्यायोजित की जाती हैं या जो ऐसी शक्तियों को प्रत्यायोजित करने वाले पहले के अधिनियमों में संशोधन करते हैं। ऐसा यह देखने के लिए किया जाता है कि क्या उनमें नियमों, विनियमों आदि को संसद के समक्ष रखने के लिए उपयुक्त प्रावधान किये गए हैं। समिति अधिनियम के तहत बनाए गए या बनाए जाने के लिए आवश्यक नियमों, विनियमों, उप-नियमों आदि के संबंध में इसके समक्ष किए गए अभ्यावेदनों की भी जांच करती है। समिति के प्रतिवेदन समय-समय पर समिति के अध्यक्ष द्वारा या उनकी अनुपस्थिति में समिति के किसी सदस्य द्वारा सदन में प्रस्तुत किए जाते हैं।
(ग) पटल पर रखे गए कागजात संबंधी समिति:-
समिति में 10 सदस्य होते हैं जो सभापति द्वारा नाम-निर्देशित किए जाते हैं।समिति का अध्यक्ष समिति के सदस्यों में से सभापति द्वारा नियुक्त किया जाएगा परंतु यदि उप सभापति समिति का सदस्य हो तो उसे समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया जाएगा। समिति की बैठक के लिए गणपूर्ति पांच से होगी। समिति का अध्यक्ष प्रथमत: मत नहीं देगा परंतु किसी विषय पर मतों की संख्या समान होने की अवस्था में उसका मत निर्णायक होगा और वह उसका प्रयोग करेगा। समिति का प्रतिवेदन राज्य सभा में समिति के अध्यक्ष द्वारा या उसकी अनुपस्थिति में समिति के किसी सदस्य द्वारा प्रस्तुत किया जाएगा।किसी मंत्री द्वारा राज्य सभा के समक्ष पत्र रखने के पश्चात समिति का कार्य इन बातों पर विचार करना है; क्या
(क) संविधान के उन उपबंधों या संसद के किसी अधिनियम अथवा किसी अन्य विधि, नियम या विनियम का अनुपालन हुआ है जिसके अनुसरण में पत्र को इस प्रकार रखा गया है;(ख) पत्र को राज्य सभा के समक्ष रखने में कोई अनुचित विलंब हुआ है, और यदि हां,तो क्या इस प्रकार के विलंब के कारणों को स्पष्ट करने वाला एक विवरण भी पत्र के साथ-साथ राज्य सभा के समक्ष रखा गया है, और क्या वे कारण संतोषजनक हैं; और(ग) पत्र को राज्य सभा के समक्ष अंग्रेजी और हिंदी दोनों में रखा गया है; और यदि नहीं, तो क्या पत्र को हिंदी में न रखने के कारणों को स्पष्ट करने वाला एक विवरण भी पत्र के साथ-साथ राज्य सभा के समक्ष रखा गया है, और क्या वे कारण संतोषजनक हैं। समिति सभा पटल पर रखे गये पत्रों के संबंध में ऐसे अन्य कार्य भी करती है जिन्हें इसे सभापति द्वारा समय-समय पर सौंपा जाता है। समिति के अध्यक्ष या उनकी अनुपस्थिति में समिति का कोई अन्य सदस्य सभा में समय-समय पर समिति के प्रतिवेदनों को प्रस्तुत करता है।
3. सदन के दिन-प्रतिदिन के कार्य से संबंधित समितियां-
(क) कार्य मंत्रणा समिति:-
यह समिति ऐसे सरकारी विधेयकों और अन्य कार्यों के चरण या चरणों पर चर्चा के लिए आवंटित समय की सिफारिश करती है, जिन्हें सभापति सदन के नेता के परामर्श से समिति को भेजे जाने के लिए निर्देशित कर सकते हैं। इसमें 10 सदस्य होते हैं। यदि समिति का अध्यक्ष किसी बैठक में अनुपस्थित रहे तो समिति किसी अन्य सदस्य को उस बैठक में समिति के अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिए चुनेगी। समिति की बैठक के लिए गणपूर्ति पाँच होगी।समिति गैर-सरकारी सदस्यों के विधेयकों और प्रस्तावों के चरण या चरणों पर चर्चा के लिए आवंटित समय की भी सिफारिश करती है। इसे प्रस्तावित समय-सारिणी में विभिन्न चरणों या विधेयकों या अन्य कार्यों को पूरा करने के लिए अलग-अलग समय को इंगित करने की शक्ति है। समिति ऐसे अन्य कार्य भी करती है, जो सभापति द्वारा समय-समय पर उसे सौंपे जा सकते हैं। समिति द्वारा तय की गई राज्य सभा के व्यवसाय के संबंध में समय-सारिणी, सभापति द्वारा सदन को सूचित की जाती है, जिसे बाद में राज्य सभा संसदीय बुलेटिन भाग-II में अधिसूचित किया जाता है।प्रत्येक सदस्य को संविधान के अनुच्छेद 99 के अनुसार शपथ लेने अथवा प्रतिज्ञान करने के 90 दिन के भीतर अपने तथा अपने नजदीकी परिवारजन अर्थात पति/पत्नी, आश्रित पुत्रियों तथा आश्रित पुत्रों की "आस्तियों और देयताओं" के संबंध में सूचना उपलब्ध करानी होगी जैसा कि लोक प्रतिनिधित्व (तीसरासंशोधन) अधिनियम, 2002 की धारा 75क केअधीन बनाए गए नियमों में उपबंधित है।आचार समिति का प्रतिवेदन समिति के अध्यक्ष या उसकी अनुपस्थिति में किसी भी सदस्य द्वारा सभा में प्रस्तुत किया जाएगा।
समिति के निम्नलिखित कृत्य होंगे, नामत:-(क) सदस्यों के सदाचार और नैतिकआचारण पर ध्यान रखना।(ख) सदस्यों के लिए आचार संहिता तैयार करना और राज्य सभा को प्रतिवेदन के रूप में आचार संहिता में समय-समय परसंशोधन या परिवर्धन करने के लिए सुझाव देना।(ग) सदस्यों के कथित आचरण औरअन्य दुराचरण से संबंधित मामलों अथवा सदस्यों द्वारा आचार संहिता का उल्लंघन किएजाने के आरोपों संबंधी अन्य मामलों की जांच करना।(घ) स्वप्रेरणा से अथवा विशिष्टअनुरोध प्राप्त होने पर समय-समय पर आचार विषयक मानदण्डों से संबंधित प्रश्नों परसदस्यों को सलाह देना।
(बी) नियम समिति:-
समिति राज्य सभा में प्रक्रिया और कार्य संचालन के मामलों पर विचार करती है और नियमों में ऐसे संशोधनों या परिवर्धन की सिफारिश करती है, जिन्हें आवश्यक समझा जा सकता है। समिति के प्रतिवेदन समय-समय पर उपसभापति द्वारा या उनकी अनुपस्थिति में समिति के किसी सदस्य द्वारा सदन में प्रस्तुत किए जाते हैं। प्रतिवेदन प्रस्तुत किए जाने के बाद, प्रतिवेदन पर विचार करने के लिए प्रस्ताव उपसभापति द्वारा या उनकी अनुपस्थिति में सभापति द्वारा नामित समिति के किसी सदस्य द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है। सदस्य पूर्व सूचना देकर प्रतिवेदन पर विचार करने के प्रस्ताव में संशोधन प्रस्तुत कर सकते हैं। प्रतिवेदन पर विचार करने के प्रस्ताव के पारित हो जाने के बाद, उपसभापति या उनकी अनुपस्थिति में सभापति द्वारा नामित समिति का कोई सदस्य प्रस्ताव कर सकता है कि सदन प्रतिवेदन में निहित सिफारिशों से सहमत है या संशोधनों से सहमत है।
4. हाउस कीपिंग कमेटी-
(ए) हाउस कमेटी:-
राज्य सभा की आवास समिति का गठन पहली बार दिनांक 22 मई, 1952 को किया गया था और समिति को शासित करने वाले नियम वर्ष 1986 के दौरान बनाए गए I समिति में 10 सदस्य होते हैं जो सभापति द्वारा नाम-निर्देशित किये जायेंगे। समिति का अध्यक्ष समिति के सदस्यों में से सभापति द्वारा नियुक्त किया जायेगा। समिति की बैठक के लिए गणपूर्ति 3 से होगी। समिति का अध्यक्ष प्रथमतः मत नहीं देगा परन्तु किसी विषय पर मतों की संख्या समान होने की अवस्था में उसका मत निर्णायक होगा और वह उसका प्रयोग करेगा।समिति का प्रतिवेदन राज्य सभा में समिति के अध्यक्ष द्वारा या उसकी अनुपस्थितिमें समिति के किसी सदस्य द्वारा प्रस्तुत किया जायेगा। राज्य सभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन विषयक नियमों के नियम 212प के अनुसार समिति के कृत्य हैं:-
(क) सदस्यों के निवास स्थानों से संबंधित सभी मामलों को निपटाना;(ख) सदस्यों को दी गई आवास, टेलीफोन, खाद्य पदार्थ तथा चिकित्सीय सहायता जैसी अन्य सुविधाओं की देख-रेख करना; और(ग) सदस्यों को ऐसी सुविधाएं देने के बारे मेंविचार करना और प्रदान करना, जिन्हें समय-समयपर आवश्यक समझा जाए।
(बी) सामान्य प्रयोजन समिति:-
सामान्य प्रयोजन समिति में सभापति, उप सभापति, उपसभाध्यक्षों की तालिका के सदस्य, राज्यसभा की सभी संसदीय स्थायी समितियों के अध्यक्ष, राज्य सभा में मान्यता प्राप्त दलों और समूहों के नेता और ऐसे अन्य सदस्य जो सभापति द्वारा नाम-निर्देशित किए जाएं होते हैं। राज्य सभा के सभापति समिति के पदेन अध्यक्ष होते हैं। समिति का कार्य सभा के मामलों से संबंधित ऐसे विषयों पर जो इसे सभापति द्वारा समय-समय पर निर्दिष्ट किए जाएं, विचार करना और सलाह देना है।समिति की बैठक होने के लिए गणपूर्ति समिति के सदस्यों की कुल संख्या के लगभगएक-तिहाई होगी। समिति का प्रतिवेदन उपसभापति द्वारा अथवा उसकी अनुपस्थिति में समिति के किसीसदस्य द्वारा राज्य सभा में प्रस्तुत किया जायेगा।इसमें 25 सदस्य होते हैं।(सी) राज्य सभा के सदस्यों को कंप्यूटर के प्रावधान पर समिति:-
राज्य सभा की सामान्य प्रयोजन समिति (जीपीसी) ने सर्वप्रथम 14 फरवरी, 1995 को आयोजित अपनी बैठक में राज्य सभा के सदस्यों के संसदीय कार्य को सुविधाजनक बनाने के लिए उन्हें कंप्यूटर उपलब्ध कराने संबंधी मुद्दे पर विचार किया था। इसके बाद, उसी वर्ष वापस किए जाने के आधार पर सदस्यों को देने के लिए नोटबुक/लैपटॉप कंप्यूटर खरीदे गए थे। इस उद्देश्यार्थ, संसद सदस्यों के लिए कम्प्यूटर का उपबंध- नियम और प्रक्रिया, 1995 (जिन्हें इसमें आगे "1995 के नियम" कहा जाएगा) बनाए गये।इस समिति का गठन राज्य सभा के सभापति द्वारा सर्वप्रथम 18 मार्च, 1997 में किया गया था और तब से यह समिति कार्य कर रही है जिसमें रिक्तियों को समय-समय पर भरा जाता है अथवा आवश्यकतानुसार इसका पुनर्गठन किया जाता है। राज्य सभा के उप-सभापति इस समिति के अध्यक्ष हैं। यह समिति राज्य सभा के सदस्यों को कम्प्यूटर प्रदान किए जाने संबंधी सभी पहलुओं पर ध्यान देती है। यह समिति सदस्यों की हार्डवेयर और साफ्टवेयर संबंधी आवश्यकताओं की भी समीक्षा करती है।राज्य सभा के सदस्यों को सूचना प्रौद्योगिकी के विभिन्न उपकरण उपलब्ध कराने के लिए इस समिति ने 1995 के नियमों में संशोधन किया और राज्य सभा के सभापति केअनुमोदन से "कम्प्यूटर उपकरणों का प्रावधान (सदस्यों और अधिकारियों) नियम, 2008" तैयार किया, जो 1 अप्रैल 2008 से लागू हुए। इन संशोधित नियमों में वित्तीय हकदारी की योजनाहै, जिसका उपयोग करके सदस्य अपने संसदीय कार्य में सहायता के लिए अपनी पसंद के कंप्यूटर उपकरण खरीद सकते हैं।
राज्य सभा के सदस्यों के लिए कंप्यूटर उपकरण के प्रावधान संबंधी समिति और एमपीलैड्स संबंधी समिति को छोड़कर सभी स्थायी समितियों के कामकाज राज्यों की परिषद में प्रक्रिया और कार्य संचालन के नियमों द्वारा शासित होते हैं।
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